Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जून 1, 2015

समाज और प्रकृति से नाते-रिश्ते


डा. सुरेन्द्र वर्मा

“चाँदनी की सीपियाँ’’ अनिता ललित का प्रथम हाइकु-संग्रह है।इसमें उनके ३०० Chadni ki Cepiyanसे अधिक हाइकु संगृहीत हैं।अनिता जी ने हाइकु-विधा में कविता लिखना ३-४ वर्ष से ही आरम्भ किया है; लेकिन उनके हाइकु इस बात की चुगली करते हैं कि वह नौसिखिया नहीं हैं।उनकी रचनाओं का फॉर्म और कंटेंट, दोनों ही पूरी तरह हाइकु कलेवर के अनुरूप हैं। न केवल ५-७-५ का अक्षर-क्रम उन्होंने सख्ती से निभाया है; बल्कि हर हाइकु अपने में एक ‘काव्य कृति’ है।रचनाओं में समय का संकेत तो है ही, अपने समय का अक्स भी उनमें देखा जा सकता है.

     भारतीय संस्कृति में किसी भी कार्य को आरंभ करने से पहले अपने आराध्य को स्मरण किया जाता है।संग्रह के प्रथम ‘भाव-कलश’ खंड में अनिता जी माँ सरस्वती के आशीर्वाद की याचना करती हैं –

        माँ सरस्वती! / रखो सर पर हाथ / दो आशीर्वाद!

          उनकी कामना है कि भाव कलश / प्रेम, संवेदना से / भरे, छलके.’ और इसमें संदेह नहीं कि उनकी सभी रचनाएँ न केवल प्रेम का सन्देश देती हैं ; बल्कि बेशक संवेदनशील भी हैं.उनकी संवेदनशीलता इसी बात से स्पष्ट है कि ‘प्रतिबिम्ब’ शीर्षक के अंतर्गत नारी और उसके अपने निकट संबंधों को उन्होंने एक बहुत ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति प्रदान की है –

          नारी है नदी / समा लेती,दिखाती / सबका अक्स

उनका प्यार बेटी, बहन, परिवार की बहू, पत्नी और सर्वाधिक माँ पर उमड़ता है।बहन के रूप में वह स्नेह धागे में सजकर भाई की कलाई में अपना प्यार बाँधती है तो पेड़ों की डालियों पर पड़े झूले में उसका दिल बसता है।बेटी तो ‘नूर’ है और उसी से ‘घर रौशन’ है।जब वह बिदा होती है ,घर आँगन रोता है, मन कचोटता है-

          प्यारी बहना / स्नेह धागों में सजी / भाई की कलाई

           पेड़ों के झूले / बचपन की पेंगें / बहना दिल

          ‘प्यारा सा फूल / वो माथे का गुरूर / बेटी है नूर

           बेटी पराई / ससुराल में खोजे /  माँ की रजाई

          बिदा हो बेटी / रोए घर आँगन / कचोटे मन

पत्नी के रूप में नारी कुम्कुमी आस लिए प्यार और विश्वास से सजी पूजा की थाली सजाती है।उसके माथे पर सिंदूर की लपट, दिए की लौ को लजा देती है-

       पूजा की थाली / सजे प्यार विश्वास / कुंकुमी आस

          माथे पे मेरे / उगे सिंदूरी चाँद / दिया लजाए

       लेकिन माँ की तो बात ही क्या है! अनिता ललित की संवेदना सर्वाधिक मां के लिए ही है –

       माँ तेरी कोख / कितनी महफूज़ / दुखों से दूर

          माँ तेरी गोद / जैसे शीतल छाया / भरी धूप में

          माँ तेरी हंसी / घर की खुशियों की / प्यारी सी चाभी

          बच्चों की राहें / बुहारा करती माँ / बीनती काँटे

       अनिता ललित स्वयं को केवल पारिवारिक संबंधों तक ही सीमित नहीं रखतीं।वह उन लोगों को भी याद करती हैं जो भले ही ‘अपनो’ की कोटि में न आते हों लेकिन जो समय समय पर मददगार हुए हैं –

       कैसे भूलेंगे /परायों ने प्रेम से /राहें बुहारी

‘जीवन तरंग’ खंड में जहां एक ओर वह समय पड़ने पर पराए लोगो की आत्मीयता का उल्लेख किए बिना नहीं रही हैं, वहीं वह अपनों द्वारा दी गई तकलीफ़ और बेवफाई के प्रति भी आँख नही फेरतीं-

       आँखों में आँसू / अपनों ने दी भेंट / कहें किससे?

          अपने लूटें / कर जाएँ खोखला / ये तन मन

       करते ज़ख्मी / बातों के अग्नि वाण / दिल के रिश्ते

उन्हें बड़ा अफसोस है कि आज के माहौल में रिश्तों को निभाने में इस कदर तंग-दिली आखिर क्यों बरती जा रही है? –

       कैसी ये हवा / जो उड़ा दे, सुखाए / रिश्तों की नमी

     कवयित्री अनिता ललित का मानना है कि रिश्तों में जो चीज़ वस्तुत: ज़हर घोलती है वह है, शक।वह स्पष्ट कहती हैं – ‘रिश्तों में शक / आत्मीयता सुखाए / विष घोल दे’।दोस्ती भी एक आत्मीय  रिश्ता है और इसे भी बड़ी सावधानी से निभाना पड़ता है।मित्रता को परिभाषित करते हुए वह कहती हैं,  

       दोस्ती है प्यार / कोमल अहसास / दोस्ती शफ्फाक

          प्यार उजास / उमंग उल्लास में / दोस्ती का वास

          दुश्मनी ख़ार / दोस्ती की हो फुहार / खिले बहार  

दोस्ती तो हर हाल में कायम रखनी ही है।प्रिय/पति, यहाँ तक की परमात्मा भी, तो अपना मित्र ही होता है।अनिता जी अपने दिल की हर धड़कन में उसी का नाम सुनती हैं – ‘छिपा दिल की / हर धड़कन में / नाम तेरा है’।प्रिय के प्रति उनका पूर्ण समर्पण भाव देखते ही बनता है-

       हों द्वारे तेरे / नित नए सवेरे / सुखों के डेरे

          दीप जलाऊँ / तेरी राह सँवाँरूँ / तारे सजाऊँ

          कष्ट के काँटे / चुन चुन के सारे / फूल बिछा दूँ

     हाइकु कविताओं का मुख्य विषय प्रेम और प्रकृति है।अनिता ललित ने अपनी रचनाओं में प्रकृति के वैभव को ‘चाँदनी की सीपियाँ’ खंड में उजागर किया है।‘चाँदनी की सीपियाँ’ एक ऐसा पद-बंध है जिसका केवल कोई प्रतीकात्मक अर्थ ही हो सकता है और ऐसा प्रतीत होता है कि अनिता जी ने इसे कई प्रतीकों के रूप में इस्तेमाल किया है।पुस्तक के आवरण में पानी की छोटी लहरों में चाँदनी फिसलती हुई दिखाई गई है जिसमें ये नन्ही- नन्ही तरंगें उजली सीपियों सी दिखाई देती हैं।अनिता जी ने अपनी कई रचनाओं में ‘चाँदनी की सीपियों’ को लहरों के प्रतीक के रूप में ही प्रयोग किया है.-

       चाँदनी ढली / सीपियों पर चली / हौले से हँसी

          कहें कहानी / चाँदी की सीपियाँ / जीवन फानी

          चाँद उतरा / सीपियों के अंगना / सिन्धु मचला

कई जगह चाँदी की सीपिया आँसुओं का प्रतीक भी बनीं हैं, जैसे, ‘आँखों में घुले / चाँदनी के सपने / मोती में ढले’, इत्यादि।  बहरहाल चाँदनी और सीपियों के बहाने कवयित्री अपनी बात को काव्यात्मक रूप से रख पाने में खूब सफल रही है. चाँदनी की सीपियाँ कहीं लहर है ,तो कहीं आँख और उसका आँसू है. वैसे भी ‘चाँदनी’ और ‘सीपियाँ’ दोनों ही हमारी खूबसूरत प्रकृति की सम्वृत्तियाँ तो हैं ही, साथ ही मानव- मन के कोमल संवेगों से जुडी हुईं भावनाएँ भी हैं।

    अनिता ललित को बदलती हुई तीनों ही ऋतुएँ खूब उद्वेलित करती हैं।शीत ऋतु के कुछ जीवन्त चित्र देखिए।इनमें मानवीय भावों का भी सुन्दर आरोपण हुआ है

       सर्दी की धूप / शरमाती झाँकती / छिप छिप के

          सूर्य देवता / बादलों की ओट में / क्यों तुम छिपे

          सर्द लहर / ठिठुरती है काया / कहाँ है धूप?

और ग्रीष्म की तो कतिपय बड़ी ही सुन्दर अभिव्यक्तियाँ हैं –

       धरा निहारे / आँखों में प्यास लिए / नीले नभ को

          ओढ़ा दो तुम / चुनरी पलाश की / भीगा है मन

       बिखरी धूप / धरा के मुख पर / ढीठ लटों -सी

          जीवन धूप / गुलमोहर छाँव / साथ तुम्हारा

          धरती तपे / सिर उठा मुस्कराता / गुलमोहर  

 वर्षा के कुछ चित्र भी उल्लेखनीय हैं –

       बरसा देखो / उदासी का बादल / फूट के रोया

          खेल थक के / ज्यों माँ से लिपटे / मेघ हैं सोए

          कैसी ये झड़ी / बूँदों के संग बही / अश्कों की

          घटा के केश / चाँद से चेहरे को / छेड़े, सजाए

ऋतु कोई भी हो अनिता जी धरती के शृंगार के लिए उपकरण तो जुटा ही लेती हैं।सामान्यत: पतझड़ का मौसम, यदि साथ में उसके बसंत न हो तो बेहाल करने वाला मौसम होता है; लेकिन अनिता जी के यहाँ –

          पहने धरा / सुनहरी झांझर / पतझर में.

          ‘पीली चूनर / ओढ़ धरा हर्षाई / देखो मुस्काई.

     फागुन वसंत के आगमन की सूचना देता है और कौन अपने जीवन में वसंत नहीं चाहता इसीलिए फागुन हरेक को प्रिय है –  

       फागुनी रुत / खिले टेसू के फूल / महके दिल

          बही उमंग / फागुनी बयार में / लहके दिल

    जिन लोगों का बचपन गाँवों में बीता है, उन्हें प्रकृति के न जानें कितने रूप अनायास ही मिले हुए हैं।सुबह के सूर्य की किरणें देखने शहरियों को शहर की हदें छोड़ कर कहीं दूर जाना पड़ता है, किन्तु ग्राम वासियों को तो भोर के दृश्य सहज ही उपलब्ध हैं।सुबह और शाम के दृश्य धीरे धीरे उनके दिल में उतर जाते हैं।ये सारे दृश्य उनकी जीवनचर्या की तरंगों से जुड़े हुए रहते हैं – ‘भोर से जागें / ये गाँव की गलियाँ / संझा को ऊँघे’।शहर में तो ठीक इसका उलट है।यहाँ तो भोर सोती है और देर रात तक साँझ जागती है।सुबह और शाम के कुछ और दृश्य भी काबिले गौर हैं –

       चूल्हे का धुआँ / साँझी रोटी का स्वाद / गाँव की खुश्बू

          भोर गुलाबी / नहा कर निकली / छटा निराली

          सूर्य भरता / जीवन के भोर में / नए उजास

          बाल सूर्य की / सुनहरी बाहों में / नदिया झूमें

आज तो सारा परिवेश ही कलुषित हो चुका है।अनिता जी इस प्रदूषित पर्यावरण से खासी दुखी हैं।पर्यावरण को रेखांकित करती हुईं उनकी कुछ काव्यात्मक अभिव्यक्तियाँ  – 

       सोंधी महक / स्वच्छ वातावरण / कहाँ खो गया?

          धुआँ ही धुआँ / तनाव के घेरे में / विक्षिप्त मन

          धरती कहती / न  रौंदो ! हे  मानव / होगा विध्वंस

          हँसती सुबह/ महकती प्रकृति / अब चीत्कारें.

       फूल ,सब्जी में / छिड़की दवाइयां / कोई क्या खाए?

          लगाओ पौधे / सजाओ हरीतिमा / सहेजो उसे

    कवयित्री अनिता ललित की दृष्टि हर तरफ घूमती है।उनके यहाँ हाइकु रचने के लिए कुछ भी अछूत नहीं है।वे एक समग्र तस्वीर प्रस्तुत करती हैं।यह उनकी हाइकु रचनाओं की शक्ति भी है और दुर्बलता भी।जहाँ तक विषय-वस्तु का सवाल है, हाइकु में स्थान पाने के लिए उनके काव्य -दरबार में सभी का स्वागत है.

    अंत में मैं उन कुछ हाइकु रचनाओं का उल्लेख करना चाहूँगा जिनकी गहराई और ऊँचाई नापना मुश्किल है; जो बुद्धि को आंदोलित करती हैं और भावनाओं को स्पर्श करती हैं –

       कहें कहानी / चट्टानों पे लकीरें / बोलती हुईं

          कहे बसंत / आएगा पतझड़ / जी भर जी लो

          जीवन क्या है / आग का दरिया / कश्ती हौसला

          भूले जो तट / लहरों ने सम्भाला / पार उतारा

ज़रूरी नहीं कि सार्थक अनुभव, भाव सम्पदा और कोमल संवेदनाएँ सिर्फ बुजुर्गों के पास ही हों।

-0-

चाँदनी की सीपियाँ, रचयिता अनिता ललित, प्रकाशक:अयन प्रकाशन,1/20 महरौली नई दिल्ली-110030, प्रथम संस्करण: 2015; मूल्य सजिल्द: 200रुपये; पृष्ठ:100

 डा. सुरेन्द्र वर्मा,10, एच आई जी , 1,सर्कुलर रोड, इलाहाबाद-211001

 (मो.)०९६२१२२२७७८

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Responses

  1. मन की कोमल भावनाएँ हों या प्रकृति के सुन्दर ,अनूठे बिम्ब , प्रेम का पावन रूप हो या निकट रिश्तों की हृदय हीनता ,पर्यावरण , सामाजिक विषमता ,परस्पर बढ़ती दूरियां प्रायः सभी विषयों को अनिता ललित जी की लेखनी बड़ी कुशलता से अभिव्यक्त करती है |

    आदरणीय डॉ. वर्मा जी कि तथ्यात्मक प्रस्तुति से स्पष्ट है कि निःसंदेह प्रस्तुत पुस्तक भी उसका एक सुन्दर निदर्शन है ! मन को छू लेने वाले उद्धरणों ने पुस्तक को पढ़ने की जिज्ञासा और बढ़ा दी है !!

    प्रिय सखि अनिता ललित जी को बहुत-बहुत बधाई के साथ निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर हों ऐसी शुभकामनाएँ !!

    आदरणीय डॉ. सुरेन्द्र वर्मा जी को भी सुन्दर ,सशक्त समीक्षा हेतु बहुत बधाई …सादर नमन !!

    ज्योत्स्ना शर्मा

  2. जैसे फूल फूल से माला बनी बढिया

  3. bahut bahut badhai,,,

  4. डॉ सुरेन्द्र वर्मा जी ने अनीता ललित जी के हाइकु संग्रह “चांदनी की सीपियाँ” की बहुत सुन्दर अंदाज़ में समीक्षा की है उन्हें इस कार्य के लिए हार्दिक बधाई |और अनीता ललित जी को उनके इस अदभुत कार्य के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं | सभी हाइकु मनोहारी लगे | भविष्य में उनकी पुस्तके और भी आती रहें और हम पाठकों को पढ़ने का अवसर मिलता रहे |

  5. सुन्दर पुस्तक की सुन्दर समीक्षा!
    अनिता जी और डॉ. सुरेन्द्र वर्मा जी का हार्दिक अभिनन्दन!!

  6. भावपूर्ण रचना की सारगर्भित समीक्षा …रचनाकार और समीक्षक दोनों को बधाई |

  7. जितने मनोहारी प्रभावपूर्ण हाइकु उतनी ही सारर्गर्भित, सटीक समीक्षा। कामना करती हूँ अनीता जी आपके संग्रह की खुशबु दूर-दूर तक फैले।
    उत्कृष्ट समीक्षा के लिए डा० सुरेन्द्र वर्मा जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

  8. निःशब्द हैं हम!
    सच कहा है-ख़ूबसूरती ‘देखने वाले’ की नज़र में होती है ! आदरणीय सुरेन्द्र वर्मा सर जी का हृदयतल से आभार.. कि उन्होंने अपने क़ीमती वक़्त में से कुछ पल निकाले और ‘चाँदनी की सीपियाँ’ की इतनी सुंदर समीक्षा लिखी ! आपकी पारखी नज़र से अपने हाइकु को पढ़ना-समझना अपनेआप में एक अनूठा एवं सुखद अनुभव रहा ।
    यहाँ स्थान देने के लिए हिमांशु भैया जी तथा हरदीप जी का हृदय से आभार ! आप सभी सुधीजनों की शुभकामनाओं का हार्दिक आभार! आपका प्रोत्साहन हमारे लिए अनमोल है! यूँ ही सदा अपना स्नेह बनाये रखियेगा !

    ~ सादर
    अनिता ललित

  9. badhaai saadr nmn utkrisht smaakshaa

  10. बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ…|


रचनाओं से सम्बन्धित आपकी सार्थक टिप्पणियों का स्वागत है । ब्लॉग के विषय में कोई जानकारी या सूचना देने या प्राप्त करने के लिए टिप्पणी के स्थान पर पोस्ट न करके इनमें से किसी भी पते पर मेल कर सकते हैं- hindihaiku@ gmail.com अथवा rdkamboj49@gmail.com.

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