Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 17, 2015

छेड़ें हवाएँ


गुंजन अग्रवाल

1

वो बीती बात

पल-पल दिलाती

तुम्हारी याद ।

2

सर्वदा हारी

आ जाती दबे पाँव

याद तुम्हारी ।

3

नर्म लताएँ

कैसे लाज बचाएँ

छेड़ें हवाएँ ।

4

सूना अँगना

बैठी गैर मुँडेर

नन्हीं गौरैया ।

5

उजाड़ बैठा

आधुनिक समाज

धरा के ख्वाब ।

6

भोर -तमाचा

पड़ी है औंधे मुँह

रात्रि- कालिमा ।

7

मेघ-टुकड़ा

ओजस्वी सूर्य ढक

शिशु- सा हँसा ।

8

स्वेद की बूंद

मोती बन बिखरे

किस्मत पृष्ठ ।

9

अबोध स्वप्न

कुपित धरा संग

बिखरे पड़े ।

10

काल का पाश

ग्रास क्रुद्ध धरा के

अति को त्रास ।

11

चीखे धरती

जाग जा तू मानव

बचा ले सृष्टि ।

12

उलझे पन्थ

धूल फाँक रहे है

ज्ञान के ग्रन्थ ।

13

श्रेष्ठ सौगात-

पुस्तक -उपहार

साँझा विचार ।

14

सम्पूर्ण सृष्टि

कुटुंब की परिधि

माँ ही तो होती

15

बना दु:स्वप्न

दरिद्र के सामने

रोटी का प्रश्न

16

फेंका कंकड़

शांत झील जल में

सिहरा चन्द्र ।

-0-

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Responses

  1. सभी सुन्दर हाइकु गुंजन जी….बहुत बधाई!

  2. sundr bhaavpurn prastuti

  3. bahut sundar haiku hain sabhi !
    haardik badhaii Gunjan ji !!

  4. सुन्दर हाइकु…बहुत बधाई…|


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