Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 17, 2015

गूँगा है मंच


डॉ राम निवास मानव

1

बहरे पंच,

अंधा है सरपंच,

गूँगा है मंच।

2

हिंसक दौर,

शहरों में बसते

आदमख़ोर।

3

कैसी दलील !

जज तो हैं बहरे,

अंधे वकील।

4

ओरछोर,

विकलांग श्रद्धा का

है कैसा दौर !

5

रोटी की खोज,

गाँवके गाँव यहाँ

मरते रोज़।

6

किस्त चुकाते

चुक गया जीवन,

चुके न खाते।

7

खेत न खाता,

बँधे सब रिश्तों में,

स्वार्थ का नाता।

8

अग्निपरीक्षा,

फिर भूमिसमाधि;

नारीसमीक्षा।

9

मुरली बजे,

मन में कहीं प्रीति

राधासी सजे।

10

बनी राधिका,

सचमुच थी मीरा

प्रेमसाधिका।

11

चुभते पिन,

बिताये न बीतते

दु:ख के दिन।

12

घिरे हैं सभी

जीवन के व्यूह में,

अभिमन्युसे।

13

जीवन बीता;

वनवन भटके,

मिली न सीता।

14

था अभिनेता,

बना दिया भाग्य ने

मात्र दर्शक।

– 0-

706, सैक्टर13, हिसार125005 (हरियाणा)

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Responses

  1. सभी उम्दा भावपूर्ण हाइकु…..बहुत-बहुत बधाई!

  2. कटु सत्य कहते अच्छे हाइकु के लिए हार्दिक बधाई…|

  3. आपकी संवेदना ने समाज के ‘चुभते पिन’ ढूँढ़ निकाले हैं. बधाई और शुभ कामनाएं – सुरेन्द्र वर्मा.

  4. कैसी दलील !
    जज तो हैं बहरे,
    अंधे वकील।
    Kadva sach or bhi Kai sach ujagar huye hain aapke haikuon men hardki badhai…

  5. sundr prastuti

  6. सुन्दर भावपूर्ण हाइकु !
    बहुत-बहुत बधाई !!

  7. Beautiful haiku

  8. bhaavpurn haiku…badhai Ramnivas ji ko .


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