Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 16, 2015

मेरी पसंद


शशि पुरवार

काम्बोज जी का हाइकु संग्रह ‘माटी की नाव’ कई खण्डों में अनुपम रंग की आभा बिखेरता हुआ मन को प्रफुल्लित करता है, प्रकृति और संवेदना के विविध रंग इस संग्रह में हद्रय को रोमांचित करतें है, प्रकृति खंड से अपने दो पसंदीदा हाइकु आपसे साझा करना चाहती हूँ –

घास है सोई/ भीगे है ओर- छोर/इतना रोई ।

हाइकुकार की कलम से निकला हुआ बेहद मार्मिक हाइकु, जिसमें पीड़ा के अनेक रंग अपनी संवेदना बाँचते नजर आते है। यहाँ पीड़ा भी अलग – अलग भाव में पाठक के सम्मुख नजर आती है। एक छोटे शिशु के रुदन के बाद आँसू के भीगे हुए कोर हो या एक नारी की पीड़ा, जिसकी वेदना तन्हाई में अचानक फूट पड़ती है । इस हाइकु को पढ़कर अनेक दृश्य उभरते है। प्रकृति का सानिध्य लिये यह समसामयिक हाइकु बेजोड़ है। मेरे नयनों में एक दृश्य आकर जैसे ठहर-सा गया है । परिस्थितियों से विवश होकर एकांत पलों में नारी की पीड़ा जैसे सारे बाँध तोड़ देती है। धैर्य का यह टूटा हुआ बाँध आँखों के कोरों के जरिये तकिये में समा जाता है। रोते- रोते सो गई कोमल नारी- मुख पर आँसू के सूखे हुए निशान साफ़ बयां कर रहें है कि वह रोते -रोते सो गयी है। प्रकृति के विविध रंगों में हमें जीवन के कई रंग देखने को मिलते है। इस हाइकु को देखने का नजरिया हर हाइकुकार का अलग हो सकता है। इस प्रकार एक और हाइकु जो प्रकृति की अनुपम छटा बिखेरता हुआ नजर आता है ।

ठिठुरी धूप / मुँडेर पर बैठी / बच्ची- सी ऐंठी।

सर्दी के दिनों में कोमल धूप की लुका- छुपी सदैव चलती रहती है। कोमल धूप न तो तन को गर्म करती है, न ही आँगन को। कभी वह दीवारों पर रेखाचित्र उकेरती है, कभी खिड़की से झाँककर चली जाती है , कहीं पेड़ों से छनकर आती है ,तो कभी छिटकती हुई मुँडेर पर बैठी मिलती है । काम्बोज जी ने प्रकृति की इस अनुपम छटा के एक दृश्य का मोहक वर्णन किया है, बेहद सुन्दर हाइकु है। यह हाइकु ह्रदय की गहराइयों में जाकर रस बस गया है। बेहद सुन्दर और कलात्मक हाइकु पढ़ते ही नटखट बच्चे की किलकारी जैसे जहन में गूँजने लगती है। प्रकृति के सौन्दर्य में काम्बोज जी ने बालसुलभ क्रीडा के सुन्दर दर्शन कराएँ हैं। इस हाइकु को पढ़कर मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे नन्हा- सा बालक अपनी भोली भाली जिद पूरी करने के लिए बाल क्रीडा कर रहा हो। नन्हे बच्चे अक्सर अपनी कोई जिद पकड़कर बैठ जातें है व अपनी जिद को पूरा करने के लिए बाल हठ का प्रयोग करतें है। प्यारी सी रूठने की मुख मुद्रा बनाते हैं। भोले- भाले मुख पर मासूम -सी जिद लिये अक्सर घर के कोने में या पलंग के कोने में जाकर हाथ बाँधकर कोमल शरीर की ऐसी गठरी बनाते है ,जैसे शरीर ऐंठ गया हो। प्रकृति और मानव का आपस में गहरा सम्बन्ध है। प्रकृति के सानिध्य में जहाँ असीम सुख की प्राप्ति होती है ,वहीं हमें सामयिकता के दर्शन भी होतें है।
काम्बोज जी के इस हाइकु में मुझे वहीँ बाल लीला का आनंद प्रदान किया है। संवेदना और प्रकृति एक दूसरे के पूरक है। काम्बोज जी के इस हाइकु संग्रह में कवि ह्रदय से निकले हुए सभी हाइकु, इन्द्रधनुषी आभा बिखेरते हुए मन को असीम सुख प्रदान करतें है ।प्रकृति का यह मानवीकरण  हाइकु की  काव्य क्षमता  भी दर्शाता है

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Responses

  1. Reblogged this on oshriradhekrishnabole.

  2. बहुत सुन्दर समीक्षा!
    धन्यवाद शशि जी!
    जल्दी ही काम्बोज साहब का ये संग्रह पढ़ूँगा!

  3. आपके हाइकु संग्रह पर शशि जी की हार्दिक समीक्षा पढकर अच्छा लगा । कई दशकों पहले मैं ने अपने हाइकु संग्रह को छपवाने की असफल इच्छा की थी ; पर हिमांशु जी को बधाई देता हूँ ।

  4. सुन्दर ,कोमल बिम्ब उकेरते दोनों ही हाइकु बहुत अच्छे हैं और उनपर शशि जी ने अपनी भावनाओं को बहुत ही प्रभावी रूप में व्यक्त किया है | उत्कृष्ट चयन और प्रस्तुति हेतु शशि पुरवार जी को बहुत-बहुत बधाई ! शुभकामनाएँ !!

  5. बहुत सुन्‍दर समीक्षा । शशि जी और हिमांशु जी दोनों को हार्दिक बधाई।

  6. Sach bahut achha sangraha hai samiksha be char chand laga diye bahut bahut badhai…

  7. सुन्दर संग्रह की सुन्दर समीक्षा….हार्दिक बधाई आप दोनों को!

  8. ‘ मेरी पसंद’ के अंतर्गत शशि जी ने बहुत ही प्यारे हाइकु चुने हैं। सचमुच! प्रकृति की सुंदर, कोमल, भावपूर्ण छटा बिखेरते हाइकु हैं दोनों, जिनकी समीक्षा शशि जी ने बहुत मन से, सुंदर ढंग से की है।
    हार्दिक बधाई आपको शशि जी !

    ~शुभकामनाओं सहित
    अनिता ललित

  9. aap sabhi mitron ka hardik dhnyavad, adarniy kamboj ji ko hardik badhai.–

  10. कम शब्दों में ही बहुत सरलता और गहनता से अपनी बात कह दी है आपने…| यह संग्रह तो निःसंदेह अप्रतिम है ही…| शुभकामनाएँ और बधाई…|


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