Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 12, 2015

हिन्दी हाइकु में ग्रीष्म ॠतु वर्णन:


डॉ.अर्पिता अग्रवाल

  भारत देश प्राकृतिक सुषमा की अनूठी चित्र-पटी है। ‘यहाँ पल-पल परिवर्तित प्रकृति वेश के अनुसार ॠतु-परिवर्तन के साथ धरती भी नित नूतन सज्जा में प्रकट होती है। जैसा ॠतु-वैभव भारत में है,वैसा अन्यत्र उपलब्ध नहीं है।वैदिक काल से आज तक, भारतीय कवि इन ॠतु रूपी ॠचाओं का ‘उद्गाता’ रहा है, यही कारण रहा है कि भारतीय साहित्य में विशेषतः हिन्दी साहित्य में ‘षड्ॠतु वर्णन और ‘बारहमासा’ की परम्परा अक्षुण्ण रूप से प्रवाहित होती रही । आज भी है, यहाँ प्रतिमाह की कुछ न कुछ विशेषता पर्व-त्योहार,फल-फूल और वनस्पति में स्पष्टतः रेखांकित होती रहती है। समर्थ लेखनी पाकर ‘पद्मावत’ का बारहमासा अमर साहित्य की श्रेणी में स्थान पा गया। अस्तु।

मौटे तौर पर देखें तो भारत की मुख्य ॠतुएँ तीन हैं-ग्रीष्म, शीत और वर्षा। भारत गर्म देश है, यहाँ का निवासी अधिक सहनशील है- वह जाड़ा-गर्मी-बरसात की उपेक्षा करता, शीत से काँपता,ग्रीष्म में जलता-भुनता, पसीना बहाता और वर्षा में भीगता रहकर कृषि-कर्म में जुटा रहता है और देश के लिए अन्न जुटाता है। वर्ष के आठ मास उसे गर्मी के ताप से लोहा लेना पड़ता है। देखते-देखते चैत की मस्ती -भरी हवा। वैशाख की धूल-धक्कड़- भरी आँधी में बदल जाती है- धरती का रस सूखने लगता है-

       आया है द्वार / धूल भरी झोली ले /जोगी वैसाख। डॉ.सुधा गुप्ता

          तन है रूखा /ओठों -जमी पपड़ी /वैशाखी धरा। डॉ.सुधा गुप्ता

तेज धूप से डरकर वैशाख खिलते अमलतास की पीली छतरी खोलकर अपना बचाव करता प्रतीत होता है-

       धूप से डर /पीली छतरी खोले /खड़ा  वैशाख। डॉ.सुधा गुप्ता

          गर्मी के गीत /धूल नाचती फिरे /चौराहों  पर । कमला निर्खुपा

          बैरागी दिन /धूल लपेटे बैठे /धूनी  रमाए। डॉ.ललित मावर

          चट्टानें तपीं /लोहे की भट्टी -जैसी /पिघली धूप। रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

          धूप- दरोगा / गश्त पर निकला / आग-बबूला।डॉ.सुधा गुप्ता

          तपा सूरज /जले दिल पेड़ों के / बिलखी धरा। डॉ.सुधा गुप्ता

          माथे भभूत /कमण्डल में धूल  / शिव वैशाख। डॉ.सुधा गुप्ता

          रूखी पछवा /फूलों को जला धरा / सौतेली माता। डॉ.सुधा गुप्ता

          फूलों के तन /काले पड़ने लगे / ग्रीष्म के संग। डॉ.भावना कुँअर

          प्रखरकरा/ॠतु गर्मी की आई / है तप्त धरा । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

          गीत न फूटे /अब सूखे कण्ठ से / मौसम रूठे। रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

          बिखरी धूप / धरा के मुख पर / ढीठ लटों-सी। अनिता ललित

यह जो आरम्भ है-आगे-आगे तो सूर्य का क्रोध् बढ़ेगा,पृथ्वी उस दाहक कोप का सामना करने को लाचार है,जेठ मास की गर्मी,ताप,सूर्य की दाहकता, हवा की ज्वलनशीलता,धरती का तत्ते तवे -सा तपना-सब कुछ हिन्दी हाइकु में विस्तार से चित्रित हुआ है-

       आग का गोला /फट गया सुबह /बिखरे शोले। डॉ.सुधा गुप्ता

          तंदूर तपा /धरती -रोटी सिंकी /दहक लाल। डॉ.सुधा गुप्ता

          आग की गुफा  /भटक गई हवा / जली निकली। डॉ.सुधा गुप्ता

          धूप से तपा /देह पे फफोले ले / दिन यूँ फिरा। डॉ.सुधा गुप्ता

          भभक उठी /आँवा बनी धरती  / पकते जीव। डॉ.सुधा गुप्ता

          तपता सूर्य /बन कर आतंकी / ढाए कहर। रा. मो. त्रिवेदी

          जेठ महीना / धूप की चिंगारियाँ  / खूब बरसीं। रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

          जेठ महीना / तपती दोपहर  / छूटे पसीना। डॉ.हरदीप सन्धु

          सूर्य उगले / आग का है दरिया  / तन झुलसा। डॉ.जेन्नी शबनम

          आँगन छुप  /जेठ की दुपहरी  / छाँव ढूँढ़ती। । रचना श्रीवास्तव

          धरती दग्ध /सूरज -ज्वालामुखी  / व्याकुल प्राणी। ।रमा द्विवेदी

          जेठ की गर्मी /तपता धरातल  /प्यासी नदिया। । डॉ.अमिता कौण्डल  

          रवि -अंगार /सूख चली नदियाँ / प्यासे तड़ाग । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा 

          जलता सूर्य /भभकतीं दिशाएँ / बेचैन पंछी। डॉ.अमिता कौण्डल

          जलता जेठ /तरसते हैं खेत  /पीने को जल। डॉ.अमिता कौण्डल

          जेठ की आँच  / हवाएँ खौलती हैं / औटते जीव। डॉ.सुधा गुप्ता   

          दहक रहा  /बनके आसमान  /धूप का आँवा। डॉ.उर्मिला अग्रवाल

          आसमाँ- चूल्हा /अंगारे दहकाती  / ग्रीष्म ब्राह्मणी। डॉ.उर्मिला अग्रवाल

          आए हैं जेठ  / कैसे आएँ अँगना / पर्दे में छाया। डॉ. उर्मिला अग्रवाल

          छाया सुकेशा / दिन में ही लापता /जेठ का हाथ। नीलमेन्दु सागर

इस तीव्र ताप भरी दाहकता से पूर्ण दोपहरियों में लू का साम्राज्य स्थापित हो गया-

       लू के थपेड़े / औ धूप के अंगार / जेठ गुस्साया । डॉ.सुधा  गुप्ता

          हर गाल पे / लू ने जड़े थपेड़े / धरती  झुलसी। रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

          लू बनी लावा /दहकता सन्नाटा / झुलसे गाछ। रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

          नदी -सी बहे /लपटें लपेटे लू / छाँव झुलसे । रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

          झुलसा रही / पंछियों का बदन / दुष्ट पवन। डॉ.भावना कुँअर

          दौड़ती जाती  /आग बरसाती  / शैतान धूप। डॉ.भावना कुँअर

          लपटों घिरा /अगिया बैताल- सा / लू का थपेड़ा। डॉ.सुधा गुप्ता

       झोंके हैं लू के /बदहवास भागे  / बदन फूँकें। ललित मावर

          गिरते शोले  / लू के थपेड़ों से /सहमें पेड़। रा. मो. त्रिवेदी

          जान लेवा लू / इश्कपेंचाँ  के फूल  / लोटते धूल । डॉ.सुधा गुप्ता

          लू के थपेड़े / जलाते तन-मन /करें क्रन्दन। सुदर्शन रत्नाकर

सूर्य ने अपने भंयकर कोप से अंगारों की अनवरत वर्षा कर दी,ब्रह्माण्ड ‘त्राहिमाम् त्राहिमाम्’ कर उठा। डॉ.सुधा गुप्ता के हाइकु-

       उबल रहे /ब्रह्माण्ड के देग में / चर-अचर।

          वन -अरण्य  /जले रुई- मानिंद  / लपटें धुँआँ।

पहले तो पृथ्वी ने नारी सुलभ ‘मान’ का अस्त्र अपनाया-

       कुपिता धरा  /अगन महल में  / आसन-पाटी।

किन्तु उसके प्रभावहीन रहने पर वह आत्मघाती तेवर अपना बैठी-

       अंगारे बिछा  / धरती चली सोने  /लपटें ओढ़।

सहृदय हाइकुकार को धरा का यह ‘वियोगिनी सती’ का रूप कुछ यूँ लगा-

       हत शोभाश्री / निर्जला  उपासी हैं  /जेठ की धरा।

ध्यातव्य है कि ज्येष्ठ मास में ‘निर्जला एकादशी’ आती है।

ग्रीष्म ने ऐसा आंतक मचाया कि मानव तो मानव फूल ,पत्तियों व पंछियों को भी पसीना आ गया-

       निचोड़े साड़ी  /पसीने से भीगी-सी  / ये दुपहरी। डॉ.भावना कुँअर

       थकते नहीं  /पसीना पोंछते ये  / कोमल पात। डॉ.भावना कुँअर

          चिड़िया रानी  /पसीने से नहाए / पंख सुखाए। डॉ.भावना कुँअर

          बन्दगी- दुआ  /सब कुछ भूले हैं  / पसीना चुआ। डॉ.सुधा गुप्ता

          चोटी से एड़ी / बूँद-बूँद टपके  / गर्मी की मार। डॉ.रमा द्विवेदी

विडम्बना यह है कि उस भीषण गर्मी में कुछ दुखियारे तो अपनी व्यथा किसी से कह भी नहीं पाते-

       लू में जलता  / लाचार बचपन  / माँजे बर्तन। / डॉ. अमिता कौण्डल

          बूढ़ा लाचार  / जेठ की दुपहरी / भटके द्वार।/ डॉ.अमिता कौण्डल

ऐसी भयानक ग्रीष्मॠतु का सबसे बुरा प्रभाव जल-स्रोतों पर हुआ । सूर्य की जलती किरणों ने ताल- तलैया, सरोवर-नदिया सब सुखा डाले। मानव जाति ने तो अन्न- जल का भण्डारण करना सीख लिया ; परन्तु प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर रहने वाले पशु-पक्षियों की दुर्दशा हो गई है-

       धूप से जली  / क्षीण  कटि नदिया  / गुम-सुम सी। डॉ.सुधा  गुप्ता

       नदिया सूखी / तपाता है सूरज / प्यासे  हैं पंछी। डॉ.सुधा गुप्ता

          पाखी भटके /न तरु-सरोवर /छाँव न पानी। रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

          तरसे कूप / दो बूँद मिले जल /सूखा हलक। रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

          नदियाँ प्यासी  /झरने माँगे पानी  / जेठ की बेला। रचना श्रीवास्तव

          तालाब सूखे / पंछी पिए, नहाए /कटोरी पानी। रचना श्रीवास्तव

          धूप ने छला  / काला हुआ हिरन  /पानी न मिला। डॉ. सुधा गुप्ता

          पानी  की  धुन /सूखे गले भटके  / राजा मछेरा। डॉ.सुधा गुप्ता

          चुप चिड़िया  /लील गई धरती / दाना व पानी। रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

          सूखे गले से  / कलप रही  हवा / घूँट पानी  को। डॉ.सुधा गुप्ता

          फटा पड़ा है  / हजार टुकड़ों में  / पोखर- दिल। डॉ.सुधा गुप्ता

          गगरा खाली  /सूख गई धरती  / प्यासी तड़पे । डॉ.जेन्नी शबनम

          सह न सके / उड़ चले पखेरू  / बावड़ी सूखी । डॉ.जेन्नी शबनम

          गोल बाँधके / पानी की तलाश में  / उड़ते पंछी। डॉ.सुधा गुप्ता

          ऊबे-ऊबे से  /बेड़ियाँ डाले चले /गर्मी के दिन। अनिता ललित

          रवि निर्मोही /जला गया क्यों हिया / धरा- प्रिया का ! डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

          धरा निहारे  / आँखों में प्यास लिये / नीले  नभ  को। अनिता ललित

          घास जो जली /धरा-गोद में पली / गौरैया रोए । रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

आखिर भीषण गर्मी  सहने की भी एक सीमा होती है!

       गर्म , बेचैन । धूपीले ,अनमने / उबाऊ दिन । डॉ.सुधा गुप्ता

       पंखा झलते / हाय-हाय करते । दिन कटते । डॉ.रमा द्विवेदी

गर्मी के ये  पहाड़-से  दिन सरकते ही नहीं ! कटें तो कैसे ? घुमक्कड़ी के शौकीन , हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठते , वे अपने शौक पूरे  करने के लिए अनूठी तरकी़बें खोज निकालते हैं । लाल फूलों से भरे , छतनार गुलमौर वन ,पार्क-बगीचे , सड़क- हर जगह खिल उठे , सो हाइकुकार की कल्पना ने भी उड़ान भरी-

       गुलमोहर /धूप-छतरी  खुली  / आग  रंग  की । डॉ.सुधा  गुप्ता

          लाल छाता ले /घूमती वनकन्या / जेठ मास में। डॉ.सुधा गुप्ता

          तपन झेल / लाल-लाल हो गया / गुलमोहर । ललित मावर

          छतरी बना /गुलमोहर घना /राहगीरों का । डॉ.भावना कुँअर

          स्वर्ग-अप्सरा /गुलमोहर चुन्नी /राहगीरों की ।  ॠता शेखर मधु

          तेज़ धूप में /लाल साफ़ों से सजे  / सैनिक खड़े। ज्योतिर्मयी पन्त

          लाल छत्र ले / जूझ रहा धूप से / सह रहा लू । पुष्पा मेहरा

          लू के थपेड़े /खुश गुलमोहर /और मुस्काए । शैफाली गुपता

          गुलमोहर /तुमसे ही सीखा है / खिले रहना । डॉ.जेन्नी शवनम

          गुलमोहर  / धूप से  हैं जूझते  / तपती जेठ  । हरकीरतहीर

          थोड़ी- सी आस /छाया -संग हँसता /अमलतास । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

          आतप सहे /फिर भी  दमके है /अमलतास । रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

          गर्मी के मारे /हलकान सूरज /बोला-नहा लूँ ! रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

       भारतीय दर्शन में आनन्दवादी धरा का वर्चस्व है। यहाँ हर दुःखद परिस्थिति में भी सुखद पक्ष खोज लेना भारतीय आत्मा की विशेषता है । ग्रीष्म-ॠतु में कुछ कष्ट हैं , तो कुछ आनन्द भी  हैं। ग्रीष्म के आते ही कोकिल की कूक , आम्र- वृक्षों  से भरी अमराई, नए-नए फूल-फल , सब्जी , शीतल पेय और फलों  का राजा आम मुँह से लार टपकाने को मजबूर कर देता है । हिन्दी हाइकुकारों का आनन्द -वर्णन कुछ इस प्रकार है-

       ग्रीष्म-ॠतु में/देखे जो मीठे आम /टपके लार । डॉ.हरदीप सन्धु

          गर्मी की छुट्टी /करें न काम-धम / भाएँ है आम । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

          जेठ-अषाढ़ / हम सबको भाए / नींबू का पानी । डॉ.हरदीप सन्धु

          गर्मी जो  आई । मीठी मलाई लस्सी / माँ ने बनाई । डॉ.हरदीप सन्धु

          गर्मी का स्वाद / पत्ते पे खाएँ अब / मलाई बर्फ ! डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

          गर्मी सताए / घुँघरू लगी पंखी / जान बचाए । डॉ.हरदीप सन्धु

          गर्मी यूँ झेले / पुदीना -जलजीरा बिकता ठेले । डॉ.हरदीप सन्धु

          पिकी है गाती / आम की डालियाँ / झूम ही जातीं। डॉ.भावना कुँअर

          रसीले आम /पिकनिक मनाते / शुक्रिया ग्रीष्म । डॉ.उर्मिला अग्रवाल

          अम्मा बनाए / अमिया की चटनी / मन को भाए । प्रियंका गुप्ता

          लू के प्रहार / पना पी के हम भी / खड़े तैयार ! डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

          अम्मा बनाए /आम  का खट्टा पना / जी ललचाए । प्रियंका गुप्ता

          छिड़क पानी /आँगन-बिछी खाट  / गर्मी की रात । रचना श्रीवास्तव

          गर्मी की रात /करके छिड़काव /बिछाई खाट । डॉ.हरदीप सन्धु

          नीम की छैंया / मूँज की चारपाई / लुढ़के छौने । डॉ.सुधा गुप्ता

‘पना’ और ‘अमरस’ बनाते जलजीरा पीते , छिड़काव कर बाण की खाट पर हाथ की पंखी झुलाते और किस्से -कहानी कहते-सुनते आखिर ये भीषण ताप-भरे रात- दिन भी कट ही जाएँगे ; यही भारतीय जिजीविषा है ।

       हिन्दी हाइकु की यह एक उल्लेखनीय विशेषता है कि उसने स्वयं को जन-मानस से जोड़ा है और आम आदमी की की व्यथा-कथा कहने में दिलचस्पी  दिखाई है-यही उसका ‘वैजयन्ती’  फहराने का रहस्य है । भारतभूमि का हर निवासी मातृभूमि के प्रति श्रद्धानत है। शीत हो या ग्रीष्म  या वर्षा ,उसे हर स्थिति से समझौता करना आता है ; क्योंकि देश की माटी प्राणों से भी प्यारी है-

       छुपे अनन्त /तेरी माटी में सुख /शस्य श्यामला ।

( हाइकु काव्य: शिल्प एवं अनुभूति, संस्करण 2015 , अयन प्रकाशन , नई दिल्ली

-0-

डॉ.अर्पिता अग्रवाल,120 बी / 2, साकेत , मेरठ 250003

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Responses

  1. bahut sundar alekh , sabhi haiku bhi umda hai sargarbhit alkeh hetu hardik badhai

  2. bahut achha aalekh likha aapne meri hardik badhai..

  3. विस्तृत अध्ययन पर आधारित सुन्दर लेख.
    सभी उद्धृत रचनाएँ बहुत खूबसूरत हैं.
    अर्पिता जी को शुभकामनाएं…

  4. sundr aalekh , sbhi ek se ek grishn haaiku .
    sbhi ko badhai

  5. bahut sunder alekh aur mausam ka sateek drishy darshate haiku ko ythochit sthan dene hetu arpita ji apako badhai.
    pushpa mehra.

  6. हिन्दी हाइकु में ग्रीष्म ऋतु की विविध छटाओं को बहुत सुन्दरता से प्रस्तुत किया गया है ।उत्कृष्ट लेखन हेतु अर्पिता जी को हार्दिक बधाई !

  7. सुंदर उदाहरणों से सुसज्जित सारगर्भित लेख। अर्पिता जी ने अपने देश की समस्त ऋतुओं, विशेषकर ग्रीष्म ऋतु की निराली छटा को (उनके उतार -चढ़ाव के संग) व जन मानस के उनसे आत्मिक संबंध को बड़ी ही ख़ूबसूरती से हाइकु के उदाहरणों के साथ अपने शब्दों में पिरोया एवं दर्शाया है !
    इस सुंदर प्रस्तुति हेतु अर्पिता जी को हार्दिक बधाई !

    ~सादर
    अनिता ललित

  8. बहुत सार्थक आलेख…हार्दिक बधाई…|


रचनाओं से सम्बन्धित आपकी सार्थक टिप्पणियों का स्वागत है । ब्लॉग के विषय में कोई जानकारी या सूचना देने या प्राप्त करने के लिए टिप्पणी के स्थान पर पोस्ट न करके इनमें से किसी भी पते पर मेल कर सकते हैं- hindihaiku@ gmail.com अथवा rdkamboj49@gmail.com.

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