Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मई 11, 2015

हाइकु में सामाजिक समस्याओं पर चिंतन और चेतना के प्रतिबिम्ब


डॉ. उमेश महादोषी

हाइकु पूर्ण कविता है और उसमें किसी भी विषय पर रचना की जा सकती है, तदपि एक सामान्य धारणा के तहत हाइकु सृजन जीवन -दृश्यों, विशेषतः प्रकृति संबन्धी, पर अधिक केन्द्रित रहा है। हिन्दी में हाइकु जीवन की अंतरंग संवेदनात्मक अनुभूति के साथ भी जुड़ा है लेकिन सामाजिक चिंतन और चेतना की अभिव्यक्ति को उतनी तेजी से आत्मसात नहीं कर पाया है। हाइकु के अच्छे उदाहरणों की बात की जाए, तो सामाजिक चिंतन और चेतना की अभिव्यक्ति से जुड़े उदाहरण सापेक्षिक रूप से काफी कम दिखाई देते हैं। इसका एक कारण हाइकु के बारे में प्रकृति को लेकर बन चुकी बद्धमूल धारणा के प्रभाव से न उबरना हो सकता है। दूसरी बात जीवन- दृश्यों की अनुभूतियों के शब्दचित्र बहुत बार अभिधात्मक रूप में भी ठीक-ठाक प्रभाव छोड़ने में सफल हो जाते हैं, जबकि सामाजिक सरोकारों से जुड़ी अभिव्यक्ति में सामान्यतः यह बेहद मुश्किल काम होता है। इस कारण से एक ओर सामाजिक सरोकारों पर हाइकु लेखन कम होता है, दूसरे सामाजिक सरोकारों से जुड़े लेखन में अभिधात्मक शब्द चित्रों का अंधानुकरण अच्छे उदाहरण सामने नहीं आने देता। प्रतिभा को निखारने की बजाय हाइकु जैसी लघुकाय रचना में अभिधात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम को कवि बनने का शार्टकट मान लेने की प्रवृत्ति भी इसके लिए जिम्मेवार है। जो भी है, हाइकु में सामाजिक चिंतन और चेतना की अभिव्यक्ति के सफल उदाहरण अभी कम ही हैं और अधिकांशतः हाइकु जीवन- दृश्यों और संवेदनात्मक अनुभूतियों के साथ ही सफल रहा है। यहाँ पर हाइकुकारों को दो बातों पर ध्यान देना चाहिए; पहली बात- हिन्दी कविता का समकालीन परिदृश्य सामाजिक चिंतन और चेतना पर केन्द्रित हो चुका है और इसके लम्बे समय तक बदलने की उम्मीद नहीं है। दूसरी बात- हाइकु जिस कठिन साधनावृत्ति का परिणाम है, उसी साधनावृत्ति से उसने दृश्य की मूर्तानुभूति के साथ अमूर्त सूक्ष्मताओं को भी ग्रहण करना सीखा है। इसीलिए उसके शिल्प में सौंदर्य की उपासना की क्षमता है और सूक्ष्मता और सांकेतिकता के संप्रेषण की भी। निसंदेह सूक्ष्मता और सांकेतिकता हाइकु को दर्शन की ओर ले जाती है, लेकिन दर्शन सिर्फ जीवन-रहस्यों की ओर ही संकेत नहीं करता, अपितु सामाजिक चिंतन और चेतना का बोध भी कराता है। जीवन को उसकी सम्पूर्णता में समझने के लिए उसमें विद्यमान समस्याओं और विसंगतियों से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। ऐसे में सामाजिक चिंतन और चेतना को भी हाइकु के मूल का विस्तार ही मानना चाहिए, कोई अलग से जोड़ी गई चीज नहीं। मैं विश्वासपूर्वक मानता हूँ कि सामाजिक सरोकारों में भी हाइकु की सूक्ष्मता और सांकेतिकता की वृत्ति स्वाभाविक, सहज और सफल सृजन का कारण बन सकती है। क्षमतावान हाइकुकार इस सन्दर्भ में जिम्मेवारी का प्रदर्शन करेंगे ,तो सामाजिक सरोकारों पर हाइकु के अच्छे उदाहरण भी आएँगे और अगंभीर लेखन कर रहे रचनाकार भी आत्मसमीक्षा के लिए प्रेरित होंगे।
कविता में सामाजिक चिंतन और चेतना हमें उन सरोकारों की ओर ले जाती है, जो पारस्परिक निर्भरता के आधार पर समाज के विभिन्न समूहों को एक दूसरे से जोड़ने और एक-दूसरे को उनकी परिस्थितियों के सन्दर्भ में समझने के प्रयासों से जुड़े होकर मनुष्यता के संरक्षण का सोपान प्रस्तुत करते हैं। ये सरोकार मनुष्य को मनुष्य और मनुष्यता के साथ जीवन को उसकी सम्पूर्णता में जीने का रास्ता दिखाते हैं, स्वीकार्य अनुशासन के साथ सामान्य जीवन मूल्यों की प्रतिबद्धता जगाते हैं। उसकी समस्याओं का नोटिस लेते हैं और उनके समाधान के पक्ष में आवेग पैदा करते हैं। इनके बिना जीवन की सम्पूर्णता का अहसास संभव नहीं। यद्यपि साहित्य की हर विधा में सामाजिक सरोकारों से जुड़ा सृजन हो रहा है, पर अभिव्यक्ति के लिए कविता अधिक प्रभावशाली माध्यम है। आधुनिक हिन्दी कविता सामाजिकता को प्रेरित और निरन्तरता प्रदान करने वाले सूत्र, सामाजिक विभेद, विघटन और भय को रोकने सहित सामाजिक समरसता व सद्भाव को उत्साहित करने वाले तन्तु, सामाजिक विद्रूपताओं का विरोध, समाज के विभिन्न समूहों के पृथक् व सामूहिक उत्थान के प्रयासों सहित सामाजिक न्याय और सामाजिक मर्यादाओं व मूल्यों के संरक्षण आदि को अपने प्रमुख लक्ष्यों में शामिल कर चुकी है। तमाम नकारात्मकताओं सहित विद्रूपताओं और विषमताओं का चित्रण, व्यंग्य, सकारात्मक चीजों का रेखांकन, संवेदना को उकेरना, नए तथ्यों व मूल्यों का अन्वेषण व रेखांकन जैसी चीजें कविता की पहचान बन चुकी हैं। हाइकु भी पूर्ण कविता है और उसकी सांकेतिकता व सूक्ष्मता को वहन करने की अपरिमित शक्ति सौंदर्य बोध और प्रकृति के बिम्बों जैसे कौशल के ही साथ सामाजिक सरोकारों की अभिव्यक्ति के संप्रेषण को त्वरित करने में सक्षम है। हाँ, अति लघुकाय होने के कारण रचना- प्रक्रिया में धैर्य और चिंतन की, लिखे गए को जाँचने-परखने की आवश्यकता अवश्य होती है। विषय व कथ्य के अनुरूप उपयुक्त शब्द संयोजन, व्यंजना व लक्षणा के उपयोग, बिम्ब निर्माण में कौशल से सामाजिक विषयों पर अच्छे हाइकु दिए जा सकते हैं। एक उदाहरण से मेरी बात थोड़ा सरल हो जाएगी। हाइकु फार्मेट में लिखी गई एक रचना देखें- रोज दिखाता/नंगापन अपना/देश का राजा। कहने को यह रचना हाइकु के फार्मेट में है और सामान्यतः इसे हाइकु में स्वीकार भी कर लिया जाता, लेकिन रचनाकार ने इस पर अपना मनन जारी रखा और इसे एक अलग तरह से पुनः लिखा- आँखें मूँद लो/निकलने वाला है/राजा यहाँ से। सामाजिक सरोकारों पर केन्द्रित हाइकु लेखन अभिधात्मक सपाटबयानी के साथ उक्त हाइकु के पहले वाले रूप के इर्द-गिर्द ही अधिकांशतः हुआ है। हाँ, यह लेखन हाइकु को हिन्दी कविता के केन्द्रीय परिदृश्य से जोड़ता अवश्य है, इसलिए असंतुष्टि के बावजूद इस तरह के लेखन के साथ चलते हुए अच्छे उदाहरणों की प्रतीक्षा की जा सकती है। अच्छे उदाहरणों से परिदृश्य का कोहरा छँट सकता है, थोड़ी गर्माहट भी आएगी। फिलहाल कुछ चुनिंदा सामाजिक सरोकारों को लक्ष्य करते हुए उपलब्ध कोष में से दृष्टिगत हुए हाइकुओं में से यथोचित उदाहरण रखने का प्रयास करूँगा।
हाइकु की विख्यात कवयित्री डॉ.सुधा गुप्ता मूलतः प्रकृति के बिम्बों की शिल्पी हैं, तो भी उनके सृजन में कुछेक उदाहरण सामाजिक चिंतन पर भी देखने को मिले हैं। आतंक और हिंसा से जनित भय को वसन्त में प्रतिबिम्बित करके भय की सघनता को बढ़ाते इस हाइकु को देखें-
हिंसा ताण्डव/सड़कों बहे खून/डरा वसन्त।

आतंक के नए-नए रूप सामने आते रहते हैं, समाज के अन्दर से भी और बाहर से भी। इसकी विकरालता ने मनुष्य को इस कदर डरा दिया है कि आतंकी दृष्टियों से वह अपना चेहरा छुपाने में ही कल्याण समझता है। इसका परिणाम मानवीय संवेदना की सिकुड़न, अपितु अन्त में दिखाई देने लगी है। मासूम जिन्दगियाँ समाप्त होती रहती हैं और कोई किसी की मदद को सामने आने का साहस नहीं बटोर पाता। ये रचनाएँ इसी ओर संकेत करती हैं- 

जख्मी मासूम/क्रूरता का तांडव/मौन थे सब । वरिन्दरजीत सिंह बराड़
बढ़ता पंजा/सिहरती गौरैया/खुला आकाश ।- कुसुम गोयनका
आतंक फैलाने वाले अपने कृत्य से क्या कुछ हासिल कर पायेंगे? निसंदेह एक भ्रम की दुनिया में जीने का सुख लेने के अलावा उन्हें कुछ मिलने वाला नहीं-
     हैं नादान ये/रोशनी की खोज में/आग बाँटते ।- के.एल. दिवान
इसी संदर्भ में डॉ.गोपाल बाबू शर्मा एक सार्थक अपील करते हैं- लिखना है तो/मृत्यु के पृष्ठों पर/जिन्दगी लिखो। निश्चित रूप से इस संसार के होने की सार्थकता इसी में है कि हर व्यक्ति को शांत, सहज व खुशहाल जीवन जीने का अवसर मिले, परन्तु तमाम समस्याओं के बीच आतंकवाद, वह चाहे समाज के अन्दर से पैदा हुआ हो या बाहर से, मनुष्यता और सामाजिकता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है। हाइकु अपनी सांकेतिकता और सूक्ष्मता के माध्यम से इसके खिलाफ उठने वाली आवाजों और जागृति की धार पर सान रख सकता है।
सामाजिकता को छिन्न-भिन्न करने वाली दूसरी समस्या साम्प्रदायिकता की है। प्रत्यक्षतः साम्प्रदायिकता भड़काने वाले तो समाज के विघटन के दोषी हैं ही, इसका विरोध करने वाले भी तुष्टीकरण और वोट की राजनीति के लिए आग में घी डालने का काम ही करते हैं। दोनों ही तरह से समाज में गहरी रेखाएँ खिंच जाती हैं। इस परिदृश्य की ओर संकेत करते इन हाइकुओं को देखा जा सकता है-
बाँसों को लड़ा/हवा, हो गई हवा/झुलसा वन ।- आदित्य प्रताप सिंह
आग सुलगी/आँगन में गौरैया/ऊँची फुदकी ।- सुरेश यादव
सुन्दर धरा/कभी अयोध्या सहे/कभी गोधरा ।- पवन कुमार जैन
आँखों में धूल/नफरत की आँधी/बिखेरे शूल ।- रचना श्रीवास्तव
दंगा भड़का/शहर की गलियाँ/हो गई बेवा ।- रमेश चन्द्र श्रीवास्तव
खेल-खेल में/बात इतनी बढ़ी/दुकानें जलीं ।- चक्रधर शुक्ल
आतंक और साम्प्रदायिकता के साथ कानून-व्यवस्था के प्रश्न भी समाज में भय व्याप्त कर रहे हैं। सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. सतीश दुबे जी ने इस हाइकु में समाज में व्याप्त भय की सघनता एक सटीक चित्र खींचा है- डराती रही/रात में द्वार बजा/अज्ञात हवा। डॉ. रामनिवास मानव इसी भय की व्यापकता को इस हाइकु में चित्रित करते हैं- घर में घर/आदमी में आदमी/फिर भी डर।
सामाजिकता पर राजनीति अपना शिकंजा कस रही है। राजनेता एक ओर शासन व्यवस्था को खोखला कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वे सामाजिक व अन्य गैर राजनैतिक संस्थाओं पर नियंत्रण करके उन्हें भी भ्रष्टाचार का अड्डा बना रहे हैं। जनता के हितों के नाम पर उनके कृत्य और आचरण अब विश्वास करने योग्य नहीं रह गये। समाज के हर वर्ग का व्यक्ति अपने-आप को त्रस्त महसूस कर रहा है और इनके प्रति आक्रोश से भरा हुआ है। यह स्थिति समकालीन साहित्य में बहुतायत से प्रतिबिम्बित हो रही है। हाइकु में भी उदाहरणों पर दृष्टि डाली जा सकती है-
कुतर रहे/देश का संविधान/संसदी चूहे ।- डॉ.भगवतशरण अग्रवाल
भूखों की भीड़/सिंहासन पा गई/देश खा गई ।- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
विष की बेल/गुलाबों के शहर/बो दी तुमने ।- देवेन्द्र नारायण दास
खिला गुलाब/माली ने तोड़ डाला/बचा बबूल ।- रवीन्द्र देवधरे ‘शलभ’
एक हाथ में/थाली, चंदन-रोली/एक में गोली ।- चक्रधर शुक्ल
है चिंता भारी/जनहित की ओट/कुर्सी है प्यारी ।- डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
भय, व्यवस्था और लालच ने हमारे समाज से सामान्य जीवन मूल्यों का अपहरण कर लिया है। धन, बाहुबल और राजनैतिक पहुँच में से कम से कम एक चीज जिसके पास नहीं है, वह मनुष्य आज मनुष्य की तरह जी नहीं सकता। हमारा सामाज एक ऐसे चक्रव्यूह में फँसता जा रहा है, जिसमें कोई किसी के साथ खड़ा होने का, किसी का दर्द समझने का, किसी की मदद करने का साहस नहीं कर सकता। ये हाइकु यही संकेत कर रहे हैं-
कौन जो बूझे/बेकस बेचारों की/गूँगी ये व्यथा ।- डॉ. सुधा गुप्ता
चीर हरण/आँखें ढूँढ़ रहीं हैं/कहाँ हो कृष्ण? ।- रोहित कुमार हैप्पी
संवेदनहीन/शहर की गलियाँ/सुने न पीर ।- अनिता ललित
सामूहिक विरोध और आन्दोलनों के बावजूद ताकत का खेल बढ़ता ही जा रहा है-
कुनबा बढ़ा/रावण फिर हँसा/कितने राम? -डॉ.शैलेष गुप्त ‘वीर’
कभी-कभी तो इन आन्दोलनों का अस्तित्व और उददेश्यपरकता- दोनों ही संदेहास्पद लगते हैं। बेशर्मी और बेहयापन इस कदर बढ़ गया है कि कमजोर का हक ताकतवर खा जाता है, पूरा समाज देखता रहता है। इस सामाजिक विकृति का चित्र देखिए डॉ. सुरेन्द्र वर्मा जी के इस हाइकु में- गाय को मिली/रोटी अनुदान में/खा गया कुत्ता। स्थिति कुछ ऐसी हो गई है कि-
दर्द सुनाए/बैठ मुँडेर पर/काली चिड़िया ।- श्यामसुन्दर अग्रवाल।
हमारी राजनैतिक व्यवस्था ने गरीबी हटाने और आम आदमी की समृद्धि के लिए अनेक नारे दिए, नल का मुँह अपनी ओर करके पैसा पानी की तरह बहाया और अपने-अपने हौज भर लिये। गरीब वहीं का वहीं रहा। जहाँ गरीबी होती है, वहाँ आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह की विषमताएँ होती हैं। परिणामस्वरूप मनुष्य-मनुष्य के बीच अन्तर पैदा होता है। इसलिए साहित्य में इसका नोटिस लिया जाना जरूरी होता है, लिया भी जा रहा है। हाइकु में भी गरीबी से जुड़े कुछ स्वर सुनाई देते हैं।
पूस की पूनो/झुग्गियों के पैबन्द/झलके आह! ।- आदित्य प्रसाद सिंह
फटी कमीज/उधड़े सब धागे/क्या होगा आगे ।- डॉ.रामनिवास मानव
सर्द रात में/फुटपाथ आबाद/जिंदा हैं लाशें ।- संगीता स्वरूप ‘गीत’
जीर्ण झोंपड़ी/ठिठुरन भरतीं/सर्द हवाएँ ।- डॉ. ब्रह्मजीत गौतम
पाए निर्धन/कुछ पल जीवन/सूर्य दर्शन ।- भावना सक्सेना
ठंडक आई/प्लास्टिक से तापते/नहीं रजाई ।- शिवकुमार पाण्डेय
टाट ओढ़के/खुले में सोता छोटू/माँ याद आती ।- रचना श्रीवास्तव
धरा बिछौना/आसमाँ ओढ़कर सोए/ऐसे भी छौना ।- डॉ.रमा द्विवेदी
पड़ा अकाल/पहाड़ जैसा खड़ा/सामने साल ।- हरेराम समीप
निर्धन काँपे/आस की चिता जला/हाथ है तापे ।- नमिता राकेश
गरीबी का परिणाम भूख होती है। हमारे समाज में ऐसे लोगों की संख्या आज भी बहुत बड़ी है जिन्हें एक समय भी भरपेट भोजन नहीं मिलता। कवि-साहित्यकारों के लिए इस पीड़ादायी और शर्मनाक स्थिति पर मौन रहना सम्भव नहीं होता।
छोड़े न साथ/भूख पतिव्रता-सी/निभाती साथ ।- डॉ.रामनिवास ‘मानव’
रोटी का ग्रास/गरीब की आँखों में/जगाए आस ।- डॉ.लाज मेहता
हम भूखो में/रोटी चार निवाले/स्वप्न निराले ।- देवेन्द्र नारायण दास
चूल्हा तो ठण्डा/भूखे बच्चे के पेट/आग जलती ।- प्रियंका गुप्ता
भूखा क्या लिखे/उसे तो ये चाँद भी/रोटी-सा दिखे ।- वंदना सहाय
भूख के मारे/रोटी चर्चा कर/रात गुजारें ।- हरेराम समीप
सामाजिकता का सबसे उत्कृष्ट स्वरूप गाँवों में देखने को मिलता रहा है। अनेक प्रकार की सुविधाओं के अभाव के बावजूद ग्रामीण जीवन के प्रति मनुष्य के आकर्षण का पर्यावरण के बाद दूसरा प्रमुख कारण सामाजिकता ही रहा है। आज की परिस्थितियों में भी, जब सुविधाओं और धन कमाने की लालसा मनुष्य को शहर की ओर खींच रही है, गाँव सामान्य मनुष्य की स्मृतियों में सहज ही उभर आता है। पर वही गाँव और उसकी संस्कृति आज समाप्त होती जा रही है। गाँव का विकास हो, वहाँ सुविधाएँ पहुँचें, यह जरूरी है, परन्तु गाँव की मूल पहचान जिस सामाजिकता और पर्यावरणीय संतुलन से रही है, उसे खरोंचा जाना दुःखद है। साहित्यकारों की पीड़ा के केन्द्र में यही चीज है। कुछ हाइकु द्रष्टव्य हैं-
गाँव मुझको/मैं खोजता गाँव को/दोनों खो गए ।- डॉ.रमाकान्त श्रीवास्तव
हमारे गाँव/अब नहीं मिलती/शीतल छाँव ।- डॉ.हरिराज सिंह ‘नूर’
दूर है गाँव/बची केवल धूप/कहीं न छाँव ।- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
व्यंग्य चित्र-सा/बना दिया गाँव को/आज भूख ने ।- डॉ.रामनिवास मानव
नीम की छाँव/कुएँ का मीठा पानी/वो मेरा गाँव ।- डॉ.भावना कुँअर
हमारा गाँव/न जहाँ कोई नदी/न कोई नाव ।- डॉ.सतीशराज पुष्करणा
पीपल छाँव/मेरा अपना गाँव/कहाँ से लाऊँ ।- सुदर्शन रत्नाकर
नीम बसेरा/चिड़िया नहीं आती/नीड़ उदास ।- डॉ.विद्याविन्दु सिंह
हमारे समाज में कई विकृतियाँ घर कर गई हैं, जो उसके सामान्य चरित्र और नैतिक बल को आघात पहुँचाती हैं और प्रगति को भी अवरुद्ध करती हैं। बेटे और बेटियों की क्षमताओं के आकलन और उन्हें आगे बढ़ने के अवसर देने के मामले में हमारा समाज अन्तर करता रहा है। स्थिति इतनी ज्यादा खराब है कि जन्म देने तक के मामले में भेद किया जाता है। आज के समय, जब बहुत सारी मान्यताएँ बदल चुकी हैं, में भी स्थिति में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं आया है। इस भेदभाव के कारण अवश्य बदल गए हैं। पहले अंधविश्वास और रूढ़ियाँ अधिक जिम्मेदार थीं, आज सुरक्षा, दहेज जैसे भयाक्रान्त करने वाले कारणों के साथ शिक्षित लड़कियों की अपने जीवन के निर्णय स्वतन्त्र रूप से लेने की प्रतिबद्धता जैसा कारण भी उसमें जुड़ गया प्रतीत होता है। लड़कियों के कई स्वतंत्र निर्णयों को, कई बार अपरिपक्वता के चलते गलत सिद्ध हो जाने और अधिकांशतः समाज की सोच में बसी नकारात्मकताओं का सामना करने का माता-पिता व परिवार के दूसरे प्रमुख सदस्यों में साहस न होने के कारण, सामाजिक अपमान का कारण समझ लिया जाता है। इन कारणों से लोग बेटियों को जन्म देने से बचना चाहते हैं। लेकिन सच यह भी है कि पुत्रमोह का पारम्परिक चिपचिपापन भी अभी सोच से निकल नहीं पा रहा है, भले यह व्यामोह कितने ही कष्टों का कारण बन जाए (घर-बिजूका/पुत्रों का व्यामोह ही/उसे ले डूबा
-चक्रधर शुक्ल। समाज को सामूहिक रूप से इन भय जनित और मानसिक कारणों से उबरने की जरूरत है। समाज की सामूहिक सोच में परिवर्तन और लोगों का बच्चों, विशेषतः बेटियों के निर्णयों को लेकर आत्ममंथन के साथ साहसी होना बहुत जरूरी हो गया है, यद्यपि बेटियों को भी आत्मनिर्णय के अधिकार का सावधानीपूर्वक उपयोग की जरूरत से इन्कार नहीं किया जा सकता। इस संदर्भ में परिवर्तन की पहल के लिए साहित्यकारों की भूमिका महत्वपूर्ण है। कई हाइकुकारों ने इस बात को समझते हुए बेटियों के पक्ष में आवाज को अपना स्वर दिया है-
दवा के साथ/सलाह देती बेटी/लगे माँ जैसी ।- रामनिवास बाँयला
खूब बढूँगी/चंदा-सूरज नहीं/नभ बनूँगी ।- उषा अग्रवाल ‘पारस’
ममता जीती/रूढ़ियों को हराया/बेटी आ गई ।- दिलीप भाटिया
प्राण बेटियाँ/घरोंदे ये बसाएँ/लोभी जलाएँ ।- मुमताज-टीएच खान
पिता के लिए/बेटी की संवेदना/ आँसू पी लेना ।- चक्रधर शुक्ल
बिटिया होती/फूल पंखुरियों पे/ओस के मोती ।- डॉ.हरदीप कौर सन्धु
बेटियों की ही नहीं, समग्रतः महिलाओं की स्थिति भी समाज में बहुत सम्मानजनक नहीं है। कोई न कोई घटना आये दिन तमाम परिवर्तनों और सुधारों के बावजूद परिदृश्य का खोखलापन दिखा जाती है-
रोज ब रोज/खाक होती ज़िन्दगी/औरत बन्दी -डॉ.जेन्नी शबनम
भावी पीढ़ी का मार्गदर्शन बहुत कुछ महिलाओं की शिक्षा और स्वतन्त्र सकारात्मक चिंतन पर निर्भर करता है, इसी से हम भविष्य के बेहतर समाज की स्थापना कर पायेंगे। एक ओर कामकाजी महिलाओं की समस्याओं के साथ पुरुषों और परिवार के दूसरे सदस्यों द्वारा सामंजस्य की अपेक्षा काफी अधिक है, वहीं बदलते परिवेश और जटिल परिस्थितियों के मध्य घरेलू महिलाओं की स्थिति व भूमिका को भी नए सिरे से समझने और निर्धारित करने की जरूरत है। महिलाओं के सन्दर्भ में चारित्रिक और पारिवारिक भूमिका से जुड़ी बातों को नकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है, कई बार महिलाएँ स्वयं भी इन नकारात्मकताओं में उलझ जाती हैं, जिनसे उबरने की जरूरत है। साहित्यकार आवाज उठा सकते हैं, सकारात्मक दिशा दिखा सकते हैं। महिलाओं के पक्ष में उठते चेतना के कुछ स्वर इन हाइकुओं में प्रतिबिम्बित हुए हैं-
तोड़ के धागा/कठपुतली भागी/विद्रोह जागा ।- उषा अग्रवाल ‘पारस’
सीता ही क्यों दे/फिर अग्नि परीक्षा/ राम की बारी ।- डॉ.अनीता कपूर
आँचल कोरा/धूल कहीं से उड़ी/दाग़ी विधवा ।- डॉ.सुधा ओम ढींगरा
चुप न रहो/जब जुल्म हो बेटी/उसे न सहो ।- सुभाष लखेड़ा
माकूल नहीं/पिशाच हर कहीं/ सँभल नारी ।- सविता मिश्रा
नई सदी में/ताल ठोंकती नारी/नहीं बेचारी ।- डॉ.शैलेष गुप्त ‘वीर’
समाज समय के साथ परिवर्तनगामी होता है। नई पीढ़ियाँ आती हैं, पुरानी पीढ़ियों को जाना होता है। यह परिवर्तन संस्थागत स्तर पर ही नहीं वैचारिक स्तर भी होता है। परिवर्तन की बेला में पीढ़ीगत अन्तराल टकराव, उपेक्षा और अपमान का कारण बन जाता है। जबकि थोड़े से सकारात्मक चिंतन और सामंजस्यपूर्ण चेतना से दोनों स्तर की पीढ़ियाँ एक सुन्दर समाज का निर्माण कर सकती हैं और हर पीढ़ी सम्माजनक और गौरवपूर्ण स्थिति के साथ जीवन का आनन्द ले सकती है। वरिष्ठ पीढ़ी नई पीढ़ी को उसके समय और जरूरतों के सन्दर्भ में समझे और नई पीढ़ी वरिष्ठ पीढ़ी के अनुभवों और उनके समय की प्रवृत्तियों का लाभ उठाए। हर पीढ़ी और हर व्यक्ति के लिए यह विचारणीय तथ्य होना चाहिए कि इस संसार में कुछ भी मूल्यहीन या व्यर्थ नहीं होता। नई पीढ़ी वरिष्ठ पीढ़ी को व्यर्थ समझकर फेंक देना चाहती है, और वरिष्ठ पीढ़ी नई पीढ़ी की संभावनाओं को सामान्यतः नकारती है। यही स्थिति समस्यामूलक है। सबसे अधिक कष्ट वरिष्ठ पीढ़ी उठाती है, शायद इसीलिए साहित्यिक संवेदना उसके पक्ष में जाती है। पर यह पूरी तरह समाधानमूलक स्थिति नहीं है। साहित्यकारों को अपनी भूमिका को व्यापक बनाने पर विचार करना चाहिए। इस सन्दर्भ में पीढ़ी अन्तराल पर सार्थक चिंतन से युक्त हाइकु तो मुझे नहीं मिले, किन्तु वरिष्ठ पीढ़ी की पीड़ा की प्रतिध्वनि इन हाइकुओं में अवश्य सुनाई देती है-
माँ-बाप ढूँढ़ें/लाठियाँ बुढ़ापे की/दीखें नहीं ।- डॉ.गोपाल बाबू शर्मा
जगे अलाव/बतियाते ही रहे/पुराने घाव ।- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
दूर देश में/बूढ़ी आँखों का तारा/फोन सहारा ।- डॉ.मिथिलेश दीक्षित
रमई काका!/चार-चार बेटे/फिर भी फाका ।- डॉ.रामनिवास मानव
डॉलर छीने/बेसहारा की लाठी/सूना आँगन ।- रचना श्रीवास्तव
मानवीय जीवन से जुड़ी पर्यावरण के असंतुलन की समस्या सामाजिक समस्या का रूप धारण कर चुकी है। इसके लिए पूरा समाज सामूहिक रूप से जिम्मेवार है। सामाजिक स्तर पर विवेकहीन मानवीय हस्तक्षेप प्रकृति और पर्यावरण को नष्ट कर रहा है। पेड़ों/वनों की अंधाधुंध कटाई, प्राकृतिक संसाधनों का व्यावसायिक और मनोरंजन के माध्यमों के विकास के लिए अंधाधुध दोहन हो रहा है। परिणामस्वरूप वायुमण्डल के गैसीय असंतुलन और ग्रीन हाउस इफेक्ट जैसी समस्याएँ तो पैदा हो ही रही हैं, जल की कमी व प्रदूषण, वायु-प्रदूषण, पहाड़ो का स्खलन, नदियों का प्रवाहहीन होकर लुप्त होते जाना आदि अनेक समस्याएँ पैदा होने लगी हैं। प्रकृति व पृथ्वी की पीड़ा बढ़ रही है । पीर-पर्वत/लादे है छाती पर/माँ बसुन्धरा -जितेन्द्र जौहर और मनुष्य उससे अन्जान-सा अपने ही आनन्द में खोया हुआ है। परिणामस्वरूप अनेक बीमारियों के साथ प्रकृति का प्रकोप सुनामी और किस्म-किस्म के भूचाल आदि के रूप में भी झेलना पड़ रहा है। साहित्यिक उत्तरदायित्व इसके खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित करता है। कुछ विषयवार हाइकुओं पर दृष्टि डालते हैं-
वृक्षों/वनों का कटान और उसके परिणाम:
न काटो पेड़/बावुना जो आएगी/कहाँ गाएगी ।- डॉ.सुधा गुप्ता
आरी-कुल्हाड़ी/छीनते हरी साड़ी/भीत पहाड़ी ।- नीलमेन्दु सागर
कटे विरिछ/गाँव की दुपहर/खोजती साया ।- डॉ.रमाकान्त श्रीवास्तव
डालों के संग/काट दिए आरों ने/छाँव के रँग ।- अश्विनी कुमार विष्णु
न होगी वृष्टि/वृक्ष विहीन धरा/न होगी सृष्टि ।- सूर्यदेव पाठक ‘पराग’
कड़ी धूप में/बहुत याद आए/पेड़ों के साए ।- प्रियंका गुप्ता
साँसें विषैली/उगलती हैं विष/वृक्षों के बिन ।- डॉ. रमा द्विवेदी
जंगल कटे/धरा कँपकँपाए/सुनामी लाए ।- सुभाष नीरव
नाचेगा मोर?/बचा ही न जंगल/ये कैसी भोर ।- डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
जल प्रदूषण और उसके परिणाम:
संत्रस्त पछी/दूषित ताल, जल/अस्तित्व मिटा ।- डॉ. आनन्द जोशी
मीन व्याकुल/आपदा पड़ी भारी/जल है म्लान ।- तुहिना रंजन
न घोलो विष/जन जीव व्याकुल/है प्यासी धरा ।- डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
मछली मरी/तालाब के पानी से/दुनिया डरी ।- डॉ. रमा द्विवेदी
वायु प्रदूषण और उसके परिणाम:
खुद के लिए/जहरीली हवा भी/माँगती दवा ।- संतोष कुमार सिंह
आसमान में/काले सर्प-सा धुआँ/फन फैलाए ।- डॉ.भावना कुँअर
बादलों से न/ बरसता है जल/बरसे अम्ल ।- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
धरा के आँसू/बादल की आँख से/तेजाब झरे ।- मंजु मिश्रा
धुआँ विषैला/रोज करे नभ का/आँचल मैला ।- संतोष कुमार सिंह
बादल धुआँ/घुटती-सी साँसे हैं/व्याकुल धरा ।- डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
जल का अभाव :
दें किसे जल/मरें खुद ही प्यासे/बेचारे नल ।- संतोष कुमार सिंह
बिकने लगी/पानी की हर बूँद/प्याऊ गायब ।- डॉ. रमा द्विवेदी
खो गईं सारी/वे कागज की नावें/सूखा है गाँव ।- ज्योत्स्ना प्रदीप
तरसे कूप/दो घूँट मिले जल/सूखा हलक ।- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
गर्मी से डरा/दुबका चट्टानों में/पहाड़ी सोता ।- योगेन्द्र वर्मा
पीर नदी की-/कैसे प्यास बुझाऊँ/तप्त सदी की! ।- डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
महँगाई से सभी त्रस्त हैं, लेकिन बच्चों के बचपन पर उसके असर का मनोज कुमार शर्मा का यह चित्र द्रष्टव्य है- सपने खेलें/महँगाई में बच्चे/खिलौने नहीं।
महिलाओं के साथ दुष्कर्म करने वाले किसी न किसी महिला की कोख से ही पैदा होते हैं। ऐसे बेटों के खिलाफ उनकी माँओं की चेतना को झकझोरती हैं कमलेश चौरसिया इस हाइकु में-
चेत गांधारी/दुःशासन उगे हैं/उघाड़ पट्टी।
प्रगति और समृद्धि की हवा ने हमें सुख-सुविधाएँ चाहे जितनी दी हैं पर सामाजिक खोखलापन भी दिया है। एक प्रतिबिम्ब हाइकु के पुरोधा डॉ.भगवत शरण अग्रवाल जी के इस हाइकु में देखिए-
बातें करतीं/हरियाते लॉन पे/पड़ी कुर्सियाँ।
इसी परिवेश की एक अनुभूति डॉ. महावीर सिंह के इस हाइकु में है-
मन में प्यास/नयन में जल है/कैसा छल है।
समाजिकता के विकास को अवरुद्ध करने वाली और भी अनेक समस्याएँ हैं, जिन्हें आधुनिक हिन्दी कविता के केन्द्र में देखा जा सकता है। हाइकु में भी अधिकतर समस्याओं पर चिंतन और चेतना के प्रतिबिम्ब देखने को मिलते हैं; परन्तु ये तमाम चित्र बिखरे हुए हैं।डॉ सुधा गुप्ता और हरेराम समीप  ने अपने  हाइकु-संग्रहों( पानी माँगता देश, बूढ़ा सूरज) में काव्यात्मकता बनाए रखते हुए सामाजिक चिंतन और चेतना को केन्द्र में रखकर भी हाइकु सृजन किया है।  जिस तरह हाइकु ने हिन्दी में अपने पर फैलाने शुरू किए हैं, इस दिशा में हाइकु की और सार्थक पहल  सामने आ रही है तथा भविष्य में और भी प्रखरता से  सामने आएगी।
-121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए.कॉलोनी, बदायूँ रोड, बरेली-243001(उ.प्र.)
मोबाइल: 09458929004

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Responses

  1. bahut sargarbhit lekh badhai aapko
    rachana

  2. ise kahte hain lekh bahut bariki se,bahut sujh bujh ke saath likhe is lekh man jeet liya meri hardik shubhkamnaye aapke saath…

  3. बहुत अच्छा विषय व लेख, उमेश महादोषी जी को बधाई !

  4. विस्तृत गहन अध्ययन पर आधारित अति उत्तम आलेख ! हार्दिक बधाई !

  5. bahut gahan adhyayan…sundar lekh!
    Umesh ji abhinandan!

  6. हिंदी हाइकु के सामाजिक दायित्व निर्वहन पर बहुत ही विचारपूर्ण , सजग एवम् सशक्त लेख ! उत्कृष्ट प्रस्तुति हेतु आदरणीय महादोषी जी को हार्दिक बधाई ! सादर नमन !!

  7. haiku par Umesh ji ka gyanvarddhk , sashakt lekh.haardik badhaai .

  8. sundar sargarbhit alkeh hardik badhai aapko

  9. हाइकु काव्य में सामाजिक चेतना की वकालत बहुत आवश्यक है अन्यथा हाइकु केवल प्रकृति परख बनकर रह जाता. महादोशीजी बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने इस मुद्दे को जोर शोर से उठाया. बहुत अच्छा प्रयत्न. सुरेन्द्र वर्मा.

  10. आप सब हाइकु के पारखी जन हैं। इस आलेख पर आप सबकी समारात्मक प्रतिक्रिया और डॉ. सुरेन्द्र वर्मा साहब जैसे वरिष्ठ और विद्वान साहित्यकार का आशीर्वाद मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण है। मैं इस आलेख की सीमाओं से भी भिज्ञ हूं। विगत दिनों बरेली में एक मुलाकात के दौरान अग्रज हिमांशु जी की प्रेरणा और आदेश से उपलब्ध समय और संसाधनों के चलते जैसा भी बन पड़ा है, कोशिश करूंगा कि भविष्य में हाइकु के लिए कुछ न कुछ करता रहूं। आप सबका हार्दिक धन्यवाद!

  11. हाइकु पर आधारित इस सारगर्भित लेख के लिए उमेश जी को साधुवाद…|
    हार्दिक बधाई…|


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