Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 8, 2015

बड़े यूँ बनें


कृष्णा वर्मा

1

बोलो सँभाल

सही वाणी से बने

घरसंसार।

2

जिया न जाए

कोरी कल्पनाओं से

गढ़ो इरादे।

3

जुड़ें अपने

दु:ख के पहाड़ भी

लगें ठिगने।

4

स्व पहचानों

शंख भीतर भरा

नाद ज्यों जानों।

5

वक्त के हाथों

परेशान ख़्यालात

मरे जज़्बात।

6

बड़े यूँ बनें

आप हों खड़े कोई

बैठा न रहे।

7

दु:ख आचार्य

नवीन अनुभव

दे बारबार।

8

मन के द्वार

थाती सी अनबोली

बातें हज़ार।

9

फाँससी बातें

उरझी अंतस् में ज्यों

झूठी मुस्कान।

10

रूठे हैं गान

छूटे पनघट के

संगम स्नान।

11

ना हो अधीर

पाएगा अवश्य जो

लिखा लकीर।

12

नित ही छलें

हमदर्दी की बातें

लगके गले।

13

निहारूँ बाट

मिले स्वजन कोई

जग के हाट।

14

ये बरबादी

सच के संदूकों की

खोई जो चाबी।

15

पथराई यूँ

मौन की चादर ज्यों

लुके सन्नाटा।

16

अपने साए

अँधेरे में जकड़ें

छोड़ते साथ।

-0-

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Responses

  1. सुन्दर रचनाएं!
    कृष्णा जी अभिनन्दन!

  2. सभी हाइकु एक से बढ़ कर एक
    फाँस–सी बातें
    उरझी अंतस् में ज्यों
    झूठी मुस्कान।…बहुत खूब !
    बधाई सखी कृष्ण वर्मा !

  3. sabhi haiku bahut sunder hain. krishna ji badhai.
    pushpa mehra.

  4. Bahut sundar ,mohak haiku !
    Bahut-bahut badhaaii !

  5. सभी हाइकु बहुत भावपूर्ण ! विशेषकर-
    दुःख आचार्य
    नवीन अनुभव
    दे बार–बार।

    फाँस–सी बातें
    उरझी अंतस् में ज्यों
    झूठी मुस्कान।
    इस सुंदर सृजन के लिए आपको हार्दिक बधाई कृष्णा दीदी जी।

    ~सादर
    अनिता ललित

  6. फाँस–सी बातें
    उरझी अंतस् में ज्यों
    झूठी मुस्कान। SUNDAR SRAJAN! SABHI HAIKU PYAARE HAI…AADARNIYA KRISHNA JI KO KARBADDH PRANAAM KE SAATH SAATH BADHAI.

  7. krishna ji aap ki rachnaye hmesha mn bhavn rhi hai bdhayi

  8. दु:ख आचार्य
    नवीन अनुभव
    दे बार–बार।
    बिलकुल सही बात…| बेहतरीन हाइकु के लिए हार्दिक बधाई…|


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