Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 4, 2015

स्मृतियाँ-हमारे जीवन की अनमोल निधि


अनिता ललित 

 स्मृति मंजरीस्मृतियाँ-हमारे जीवन की अनमोल निधि, जो कभी भी हमें अकेला नहीं होने देतीं!भले दुनिया वाले हमारा साथ छोड़ दें, यहाँ तक कि जब हमारे अपने भी हमें अकेला छोड़ देते हैं, स्मृतियाँ हमारे संग रहतीं हैं, उनकी कमी को पूरा करतीं हैं। समय चाहे जैसा भी हो, हम सुखी हों या दुःखी हों स्मृतियाँ हमारा दामन सदैव ही थामे रहतीं हैं। जीवन हर पल बदलता रहता है मगर स्मृतियों के रूप में अपने निशान पीछे छोड़ता जाता है। जब कभी भी हम स्मृतियों के घेरे में आते हैं, हम कुछ देर को अपना हर दुःख भूल जाते हैं और बरबस ही मुस्कुरा उठते हैं। यहाँ तक कि यदि कोई दुःखद स्मृति भी होती है ,तो वह हमारे आज में आकर एक विजयी सुक़ून का एहसास दिलाती है कि हम उस दुःख से जीतकर, उससे उबरकर आगे बढ़ पाये। जीवन के हर पड़ाव में स्मृतियाँ हमारे क़दम से क़दम मिलाकर खड़ी होती हैं। जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, बीते हुए पल-छिन हमारी स्मृतियों में मुस्कुराते हुए हमारा हाथ थाम लेते हैं-वे कभी हमें गुदगुदाते हैं, वापस बुलाते हैं, कभी कोई सीख देते हैं और कभी-कभी तो जब उन पलों के बिछड़ने की पीड़ा जब हमारी आँखें नम कर देती है, तब उन्हीं स्मृतियों में हम उन्हें दोबारा जी लेते हैं!

       कुमुद रामानंद बंसल जी का हाइकु-संग्रह ‘स्मृति-मंजरी’ जब मेरे सामने आया तो उसके शीर्षक ने अनायास ही मुझे आकर्षित किया। यह संग्रह दिखने में इतना आकर्षक है कि देखते ही उसे हाथ में उठाने का दिल करता है। जीवन के उपवन में स्मृति-मंजरी की सुगंध का आनंद उठाते हुए मैं उसे पूरा पढ़ गई और सराबोर हो गई।

  कवयित्री ने इस संग्रह को दो भागों में बाँटा है- प्रथम खण्ड-स्मृति उर्मियाँ-जिसमें कवयित्री  के बचपन की स्मृतियों का वर्णन करते हुए हाइकु हैं। द्वितीय खण्ड-सचराचर-जिसमें कवयित्री एवं चर-अचर के अटूट सम्बन्ध व उनसे एकाकार के अनुभव को अभिव्यक्त करते हुए हाइकु हैं। पुस्तक के हर पृष्ठ पर गाँव का दृश्य बना हुआ है, जो इस संग्रह की पृष्ठभूमि को निश्चित करता है। यूँ लगता है कि कवयित्री  का बचपन गाँव में बीता, जिसकी मधुर स्मृतियाँ आज भी उनके मन को तरंगित करती हैं !

            पहले खण्ड का पहला हाइकु ही मानों हम सभी के दिलों पर दस्तक देता है-

        खोली जो मैंने/ बचपन की पेटी /मिली दौलतें।

बचपन की इस दौलत में पिता का धैर्य,स्नेहभरी डाँट/सीख और माँ के प्यार-दुलार की गिन्नियाँ न हों, ऐसा कैसे संभव हो सकता है-

        नेह-साँचे में /ढली पिता की डाँट/ शब्द सपाट।

            जीवन-सार /निभाया धर्माचार /धैर्य-शृंगार।

माँ के अथाह-अपार, निःस्वार्थ स्नेह का इतना सटीक चित्रण भला और क्या होगा –

            तपती देह /माँ की हथेलियों से/टपके नेह।

माँ के बिना किसी बच्चे के जीवन में सिवा दुःख और कुछ नहीं रहता –

            बिना माँ के /जीवन सदा सूना/दुःख दोगुना।

लापरवाह, अपनी ही दुनिया में मगन बचपन! जिसमें  कवयित्री  विचरती हुई विभिन्न प्रकार की खाने-पीने की चीज़ों को याद करतीं हैं, जो बड़े होकर हमारी आँखों से ही नहीं ,वरन् स्वभाव से भी दूर हो जाते हैं और जिनके बारे में पढ़-सुनकर अगर आज भी अनायास हमारे मुँह में पानी आ जाए, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं  –

            नाता पुराना/भीगता हुए रोटी /अचार खाना

            यादों में बसे /आटे के गुलगुले/चाश्नी में डले।

            न भूले मन /धूप में बैठकर /गन्ने चूसना।

 यूँ लगता है कि  कवयित्री का बचपन गाँव में बीता जिसकी मधुर स्मृतियाँ आज भी उनके मन को तरंगित करती हैं !

  इस खंड में  कवयित्री अपने बचपन के दिनों को याद करती हैं, उस परिवेश की, जब वे प्रकृति के निकट थीं, गाँव था, झूला था, चूल्हा था; जब आँगन होता था, मिलजुलकर उठना-बैठना होता था।नीम की छाया के आनंद से कौन अछूता रह सकता है –

            नीम की छाया /करके सम्मोहित/मन लुभाया।

  कवयित्री के हृदय में गाँव की स्मृतियाँ एक विशेष स्थान बनाकर बैठी हुई हैं। नई-नई वस्तुओं व घरेलू उपकरणों के आविष्कार से पहले जब गाँव में झूले पड़ते थे, हँसी, गुनगुनाहट गूँजती थी, पेड़ों से टपके या तोड़े फल खाए जाते थे, तब उसका अपना ही आनंद होता था। दीपक और लालटेन का प्रकाश ही जीने के लिए काफ़ी हुआ करता था। सुराही, घड़ा, सिल -इन सभी की सोंधी महक आज भी उनके दिल में बसी हुई है-

            सुराही घड़े /सिल-पिसी चटनी /कांजी के बड़े।

            दीप-प्रकाश /भरता था उजाला /सौ सूर्य वाला।

आधुनिकीकरण ने जहाँ जीने के नए सोपान दिए, वहीँ आपसी संबंधों का नरम गलीचा भी हमारे पैरों तले से खींच लिया। कवयित्री  के शब्दों में –

            मौसम ठंडा/गर्म होते थे दिल /अब उलटा।

साथ ही आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ का नतीजा ये हुआ है कि हमारे बच्चे अब घरों में बंद होकर रह गए हैं, वे खेल के मैदानों में नहीं दिखाई पड़ते ! गाँव की गलियाँ, चौपालें सब सूनी पड़ी हैं  –

            सूनी गलियाँ /छिपे  हुए बच्चों को /ढूँढें अँखियाँ।

            सूने चौपाल /नहीं  दिखाई देते /ग्वालों के बाल।

नौजवान कबड्डी खेलते और पहलवानी करते दिखते थे, वे भी अब नदारद हैं –

            खोई है टेर /कबड्डी- कबड्डी की /सूने मैदान।

पहले जहाँ घर छोटे और दिल बड़े हुआ करते थे, अपनापन अधिक होता था, हर कोई एक-दूसरे के सुख-दुःख में शरीक़ होता था; आज वहीँ, घर बड़े और दिल छोटे हो गए हैं-इस कड़वी सच्चाई का सामना हम सभी कर रहे हैं! कवयित्री  भी इससे अछूती नहीं रहीं-

            क्या था ज़माना /ख़ुशी लेने- देने का /न था पैमाना।

            गुड़ की भेली / बाँटते थे गाँव में/शिशु जन्म पे !

आपसी संवाद में आज के शहरवासियों सी ठंडक न होकर खनक होती थी-

            मुग्ध-विभोर/बातों में थी खनक /पुराना दौर।

 सूर्योदय के साथ उठना, सूर्यास्त होते ही सो जाना-ये गाँव की अपनी विशेषता है, अपनी एक पहचान है ! जबकि शहरों में शाम ढलते, सवेरे सी रौनक होने लगती है और उगते सूर्य के दर्शन शायद बहुत ही कम लोग करते होंगे। यहाँ तक कि, कवयित्री   के अनुसार- स्वयं उषा भी सूर्योदय नहीं देखती-यह विरोधाभास बहुत सुंदर बन पड़ा है –

            बीतती सोते /सो उषा, नहीं देखे /सूर्य उगते।

इन सभी बातों की कमी कवयित्री   को आज के आधुनिक जीवन में महसूस होती है! उनके अनुसार, जीवन की रात्रि में जब अपना साया भी साथ छोड़ देता है, तब स्मृतियाँ ही हैं जो साथ निभाती हैं। इसका ख़ूबसूरत चित्रण देखिए-

            जीवन-रात /संगिनी छाया छूटी /यादों का साथ।

तभी वे कभी नन्हे बालक की मुस्कान में, कभी अपनी स्मृतियों में सुख तलाशती हैं और जीवन में इतना आगे बढ़ आने के बाद, आज जब वे वर्तमान के सुखों को अतीत की स्मृतियों से तौलती हैं, तो निश्चत रूप से स्मृतियों का पलड़ा भारी पाती हैं

            वर्तमान के /सभी सुखों पर हैं /स्मृतियाँ भारी।

            बालक हँसा /चन्द्रमा खिल उठा /बाँकी है छटा।

            भरा अँजुरी /शीतल झोंका हवा /स्मृति-मंजरी।

दूसरे खंड ‘सचराचर’ में कवयित्री ने सभी चर-अचर को अपना ही हिस्सा माना है, उनसे एकाकार किया है-स्वयं को सृष्टि का भाग और सृष्टि को स्वयं के भीतर उतारा है, उसे महसूस किया है जिससे उनकी रचनाओं में कहीं-कहीं जीवन-दर्शन, अध्यात्म भी झलकता है –

            जीवन-मृत्यु /प्रकाश-तिमिर भी/मेरे भीतर।

            काल-अकाल /पल-अनुपल भी /हैं द्वारचार।

उच्च या तुच्छ सब हमारे मन में है-

            मुक्त मन में /समाया सब-कुछ / उच्च या तुच्छ।

इस खंड में कवयित्री ने बहुत ही गहनता से इस सृष्टि की हर कृति का अध्ययन कर उसे प्रस्तुत किया है। इनमें जहाँ भ्रमर, चींटी, मयूर, चिरैया हैं, वहीँ खेतों की मेड़े , धान की बालियाँ , नदिया, तलैया, समंदर, लताएँ , पुष्प इत्यादि सभी का उल्लेख है।    तितली के अस्तित्व से मिली सीख जग ज़ाहिर है एवं झींगुर की परेशान कर देने वाली झन-झन भी कवयित्री  को लुभाती है –

            भेद खोलती /तितली ये बोलती /जीना दो घड़ी।

            झींगुर-बीन /झनक झन-झन /लुभाए  मन।

नन्हे पक्षी भी इतने सजग होते हैं कि अपना रास्ता नहीं भूलते –

            सदा सजग/पथ से न भटके/लघु विहग।

हर प्राणी का दुःख अपनाकर वे उसके कष्ट को हृदय से अनुभव करतीं हैं ! पशु-हत्या को लेकर दुःख प्रकट करके भी एक प्रकार से कवयित्री  ने हम इंसानों से ऐसा न करने की अपील की है-

            मेरा ये मन/पशु -पीड़ा में रोता / मूँद नयन।

            बेबस पशु /जीते जी तन कटे /इंसान हँसे।

प्रकृति से उनका लगाव अदम्य है, जो उनके हाइकु में स्पष्ट दिखता है –

            माँगता विदा /ढलता पीत-भानु /रंगीन छटा।

            ताप भीषण/भूनता भड़भूँजा /बैठ गगन।

            धरा सजती /हैं सोलह शृंगार /मेघो का प्यार।

नीम के पेड़ से कवयित्री के मूक संवाद की संजीदगी हृदयस्पर्शी है –

            नीम का पेड़ /मूक संवाद होता /हम दोनों में। 

बसंत में  कवयित्री  प्रसन्न होती हैं परन्तु पतझर भी उन्हें कदापि निराश नहीं करता, यह भाव उनके सकारात्मक स्वभाव को दर्शाता है –

            आया बसंत /खिले पुष्प अपार /सुख संचार।

            पत्ते झड़ना /नहीं होता है अंत /आता वसंत। 

जहाँ प्रकृति की सुंदरता कवयित्री की क़लम से निखर कर हम पाठकों के समक्ष आती है, वहीँ प्रकृति को कष्ट पहुँचने से उठे दर्द का अनुभव भी हमारे दिलों तक पहुँचता है-

            असभ्य विश्व/ फैलाता प्रदूषण/ दुष्कर जाल।

हंसिनी के भय से सिमटने का चित्रण मर्मस्पर्शी है –

            भय से स्वतः / हंसिनी  सिमटती /वन डोलती।

अंत में कवयित्री   हम सभी सभ्य कहलाने वाले मानव समुदाय से अपील करतीं हैं कि हमें अपने आचरण से अपनी इस सृष्टि को बचाना चाहिए, उसे सँवारना चाहिए –

            सभ्याचरण/हो मंगलाचरण /वृक्ष-वरण।

कुल मिलाकर ‘स्मृति-मंजरी’ हाइकु-संग्रह पाठकों के ह्रदय तक अवश्य पहुँचेगा, ऐसी मेरी आशा है !

इस संग्रह के लिए  कुमुद रामानंद बंसल जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाओं सहित !

 स्मृति मंजरी  (हाइकु-संग्रह):कुमुद रामानंद बंसल; पृष्ठ:108( पेपर बैक), मूल्य:250 रुपये, संस्करण:2015, प्रकाशक:पराग बुक्स, ई-२८, लाजपतनगर, साहिबाबाद-201705, उत्तर-प्रदेश

 

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Responses

  1. sundar sameeksha!

  2. पुस्तक के मर्म को उद्घाटित करती बेहद सुन्दर ,प्रभावी प्रस्तुति है अनिता जी !

    आदरणीया कुमुद जी एवं अनिता जी को बहुत-बहुत बधाई

    हार्दिक शुभकामनाएँ !!

  3. bahut sunder sameexa hai.anita ji badhai.
    pushpa mehra.

  4. bahut hi khoobsurtee se likhi samiksha hai .prabhavi bhi …….anita ji tatha kumud ji ko bahut bahut badhai ..

  5. मेरी समीक्षा को यहाँ स्थान देने के लिए हरदीप जी एवं हिमांशु भैया जी का हार्दिक आभार!
    समीक्षा सराहने व प्रोत्साहित करने हेतु आप सभी सुधीजनों का हृदय से आभार!
    आ. कुमुद बंसल जी को इस सुंदर हाइकु-संग्रह के लिए एक बार फिर बहुत-बहुत बधाई!

    ~सादर
    अनिता ललित

  6. There is changing difination of man in the meaning of
    Memories
    Kashmiri haikuking

  7. kya baat hai bahut uttam samiksha likhi hai achchhi pustak ki
    badhai aapdono ko
    rachana

  8. खूबसूरत हाइकुओं की बहुत बेहतरीन समीक्षा लिखी अनीता जी।
    आप दोनों को बहुत-बहुत बधाई!

  9. वाह सुन्दर समीक्षा , अनीता जी की समीक्षा ने जिज्ञासा बढ़ा दी है , कुमुद जी बहुत सुन्दर हाइकु लिखती हैं आप दोनों बहनों को बहुत बहुत बधाई

  10. सुन्दर संग्रह की भावपूर्ण सुन्दर समीक्षा। अनीता जी, कुमुद जी बहुत बहुत बधाई।

  11. Bahut bahut badhai…

  12. ऐसे सुन्दर हाइकु की बहुत बेहतरीन समीक्षा लिखी है…| आप दोनों को बधाई और शुभकामनाएँ…|


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