Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अप्रैल 1, 2015

अकेलापन :मन का दर्पण( हिन्दी हाइकु के सन्दर्भ में)


ज्योत्स्ना प्रदीप

 कोख  के आलोक से दीप्त नवजात शिशु इस सृष्टि में आने से पूर्व नितान्त अकेला होता है। जन्म के बाद उसकी पीठ थपथपाकर संकेत दिया जाता है कि उसे अपनी श्वासें स्वयं ही लेनी होंगी ,जो अभी तक उसे अपनी माँ की सहायता से मिल रही थी । कदाचित् यहीं  से आरंभ हो जाता है  एक भाव-एकाकी भाव-तुम्हे जीवन के हर क्षेत्र में अकेले ही कार्य करने है। ईश-सा मन लिये अनंत नभ के इंद्रधनुषी सपनों में विचरता शिशु शायद समझ जाता है  कि-

       आँखों में बंद/ इंद्रधनुषी सपनें/ खोलूँ तो छलें।- डॉ भगवतशरण अग्रवाल 

    डॉ भगवतशरण अग्रवाल का यह हाइकु शिशु के रुदन के एकाकी रहस्य की पीड़ा का  एक  मर्मान्तक उदाहरण है । हिन्दी साहित्य का यह पुरोधा-आज भी कर्मशील है ।इनकी सशक्त लेखनी वट-वृक्ष की छाया की  तरह है जो  तप्त पथिक की थकान को पल में दूर कर देती है। बच्चे तो सुख के स्वागत-गान हैं।कहा जाता है कि अपने लोग घर में हों तो दीवारें भी एक दूजे से बातें करती हैं ।औलाद से ही खुशियाँ है – 

        रौशनी बसी /मन नन्हें शिशु की /बिखरी हँसी । -रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

 पिता के स्वेद तथा माँ के दूध से निखरी  संतानें  घर के हर कोने को  आलोकित करती  है ।पर इन  तारो  का ध्येय खाली घर को रौशन करना नहीं होता, जब ये  अपने आकाश की खोज में निकलते  है- तो इनके बिना माँ-बाप को मिलता है- एकाकीपन ;जो पीड़ा व अश्रु से भीगा होता है।बच्चों को जाना तो पड़ता है,पढ़ाई या फिर जीविकोपार्जन के लिए ,कारण कुछ भी हो सकता हैं।

       हिन्दी साहित्य के बेशकीमती रत्नों ने अपनी काव्याभिव्यक्ति के माध्यम से बच्चो से दूर रहने की पीड़ा तथा विडम्बना , साथी के बिना घर-बार का सूनापन इन सबको बड़ी कलात्मकता से अपने हाइकु में ढाला है ।एक से बढ़कर एक  चाक्षुष बिम्ब उभारे है 

        बड़ा सहेजा /बिखरी पाँखुरियाँ/दर्द जोगिया डॉ. शैल रस्तोगी

       अकेलापन / मन-दर्पण यादें / चंदन वन ।  डॉ. भगवतशरण अग्रवाल

      उनके बिना /दीवारें हैं, छत है  /घर कहाँ है?- डॉ. भगवतशरण अग्रवाल

     माँ-बाप ढूँढे/ लाठियाँ बुढ़ापे की/ दीखती नहीं ।- डॉ. गोपाल बाबू शर्मा

     जीना जरूरी /हो जाओ नीलकन्ठ/ज़हर पियो ।– डॉ. गोपाल बाबू शर्मा

अपने प्यारे ही अपने  निकट न हो तो शाम भी अकेली लगती है-

      पूस की शाम /पश्मीना ओढ़े खड़ी /अकेली डरी।-नीलमेन्दु  सागर

    दूर महानगरो या फिर विदेशों में रहने वालों के हृदय की वेदना को सहज ही समेट लिया है इन हाइकुओ  ने-

     ओ मेरे गाँव/ माटी की गोद तेरी / याद आती है।-डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव

     घर से बड़ा /प्रतीक्षा का दरवाज़ा /सितारों तक ।-प्रो आदित्य प्रताप सिंह

   घर में कोई दुःख सहेज पाए या नहीं ,माँ को हर दुःख सहेजना आता है –

     बाँध लेती है /भीगें आँचल में माँ /दुःख घर का ।नलिनीकान्त

डॉ सुधा गुप्ता एक ख्यातिलब्ध कवयित्री है ,उन्होंने हर विषय पर बड़ी ही संजीदगी से लिखा है। गहरे दुःख में डूबा कलात्मक चित्रांकन का यह मार्मिक उदाहरण ,जिसमें अपने ही लोग अपनों को ही छोड़कर चले जाते हैं , चाहें आपने ही उन्हें  ऊँचाइयाँ दी हों-

     सीढ़ियाँ रौंद/ बढ़ जाते पथिक/ अकेली छोड़ ।- डॉ सुधा गुप्ता

     किसी की याद /फिर फडफड़ाई/छाती में फाख्ता ।-डॉ. सुधा गुप्ता

    रोती तितली /कंक्रीट जंगल में /फूल कहाँ है । डॉ. सुधा गुप्ता 

बच्चों से मिली ऐसी  व्यथा की कथा बड़ी होती हैं, इतनी बड़ी कि नभ भी छोटा पड़ जाए। उनसे जुड़े सपनें कहीं  भटकने लगते हैं  ,माँ तो बाती- सी बस जलती रहती है  इस अग्नि में । हमारे इन बड़े ही  सशक्त रचनाकारों नें इस मौन दुःख की प्राण –प्रतिष्ठा ही कर डाली है अपने हाइकु में –

        नभ पे लिखूँ/अपनी व्यथा कथा /वो छोटा पड़े ।-उर्मिला कौल

       भटक रहे/पिंडदान माँगते/मेरे सपनें । डॉ.  उर्मिला अग्रवाल

     बाती-सी जली /हर दिन रात को /वो मेरी माँ थी ।- डॉ.सतीशराज पुष्करणा

    ठहरी नहीं /बरसती रही थीं /आँखें रेत में ।- डॉ. मिथिलेशकुमारी मिश्र

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ने इस घनीभूत वेदना को अपनी रचनाओ मे बड़ी ही गहनता के साथ प्रस्तुत किया है। हिमांशु जी का रचनाकर्म अपने चारो ओर सुख- शान्ति  तथा मानसिक  ऊर्जा का संचार करता है। इनके निर्मल हृदय का पता इनकी रचनाएँ ही दे देती है, लेकिन  पीड़ा तो निर्मल हृदय को भी होती  ही है-  

       सन्नाटा जागे/ भाँय- भाँय आँगन/ खो गए स्वर ।-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

    ये हाइकु  को प्राण नहीं देते ;बल्कि हाइकु इनके प्राणों में  रचा बसा है।

      बेचैन मन/ शिला-सा भारी हुआ/ अकेलापन ।- रामेश्वर काम्बोजहिमांशु 

डॉ.भावना कुँअर के हाइकु मन की गहराइयों को पर्त –दर –पर्त खोलते हैं। इनके पीड़ा से भरे भावों में किसी दर्द भरी रागिनी का स्वर –विस्तार सुनाई पड़ता है-

            अकेलापन /बाँट रहा मुझमें /अपना ग़म । डॉ.भावना कुँअर

            नींद न आये /अकेलापन मुझे / लोरी सुनाये ।-डॉ.भावना कुँअर

डॉ.हरदीप कौर सन्धु एक ऐसा नाम ,जिनका  साहित्य के प्रति सात्विकता से भरा समर्पण सराहनीय हैं। इनके मार्मिकता से भरे हाइकु ने अकेलेपन के मौन को भी आसुओ में  भिगों दिया है – 

       मौन में मन /रोआँ-रोआँ नहाया /मीत को पाया ।डॉ.हरदीप कौर सन्धु

      भूल न  पाया/जब- जब साँस ली/ तू याद आया ।- डॉ.हरदीप कौर सन्धु

कुछ ऐसे रचनाकार जिन्होंने अकेलेपन से उपजी वेदना को निराले व अनूठे आयाम दिए हैं-उनके हाइकु में  कहीं  बेटी की विदाई  का ग़म है तो कहीं बूढ़े माँ –बाप की तन्हाई का दुःख ,कहीं बेटे की प्रतीक्षा में माँ ,कोट को धूप दिखाती  है कि बेटा न जाने … कब घर  आ  जाए! उधड़ते स्वेटर के उलझे धागे  जैसे अकेलेपन के संतप्त-साक्ष्य कितने सटीक हैं देखिए-

     बेटे का  कोट /रोज़ धूप दिखाती /प्रतीक्षा में माँ ।- रचना श्रीवास्तव

     माँ सिसकती/ आँगन हुड़कता/  बेटी विदाई ।-अनिता  ललित

      एकाकी मन/ ढूँढ लाया यादों के/ साथी हज़ार ।- डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

    बूढ़े माँ-बाप/ कभी मिटा के देखो/ थोड़ी तन्हाई ।-प्रियंका गुप्ता

      अकेलापन / उधड़ता स्वेटर /उलझे धागे ।-प्रियंका गुप्ता

    ये अश्रु , रिश्तों की भूमि को उर्वरा बनाने का काम अनायास ही कर जातें हैं –

     आँखों की नमी /बंजर न होने / दे रिश्तों की ज़मी  । –कृष्णा वर्मा

मन की कसक किस से  कहें ?ये सूनापन सहना ही पड़ेगा ,जब अपने पास अपना ही नहीं, तो जीवन मुरझा ही जाता है –आस अधूरी ही रह जाती है-

              किससे कहें ?/ कसक मनवा की / दूर अपने ।-कमला निखुर्पा  

              कुछ न कहो/ सह कर तो देखो/ ये सूनापन ।-सुदर्शन रत्नाकर

              कौन अपना/ अपने गए दूर/ टूटा सपना ।- सुभाष लखेड़ा

              खाली दीवारें/ कोई ना आता यहाँ/ सूना है मन ।- रेणु चंद्रा

             जीवन- बेल/ तन्हाई की काई में/ मुरझा जाती।- मंजु गुप्ता

            चुभती रही /कील जैसी मन में /अधूरी आस ।-मंजु मिश्रा

कुछ ने  इस अकेलेपन को  सूने मन्दिर और  प्रतीक्षारत बूढ़े पीपल के प्रतीक से  अभिव्यक्त किया है तो कभी  ऐसे एकाकी जीवन को नियति ही मान लिया है

            मंदिर सूने /अनजले हैं दीप,/छूटा संगीत ।-कुमुद बंसल

            जिन्दगी बीती /अपना नहीं मिला/क्या करूँ गिला ।- कुमुद बंसल

            बूढ़ा पीपल /चौपाल पर बैठा /प्रतीक्षारत ।-सुनीता अग्रवाल

प्रेम मानव को कभी –कभी एकाकी बना देता है ,प्रिय के वियोग मे जब  हम खुद को एकांत पाते हैं तब  बड़े ही कठिन होते हैं इस तरह के पल …पर  इन पलों से भी एक विचित्र  रस  उपजता हैं- जिसका स्वाद मीठा  है ,कुछ अनुभूतियाँ मानो मीठे झरने की शीतल फुहारे  छू गई हों आपको –

       फूल- सी यादेँ / लो हुई बरसात /मन के बाग डॉ.हरदीप कौर सन्धु

       डूबे मगर /उछली फिर भी /मनतरंग । उमेश महादोषी

     खोजती आँखें /मेरे पूर्णविराम /तुम कहाँ हो । डॉ.दीप्ति गुप्ता

    संदेस तेरा /अमृत की बूँद- सा /परदेस में ।- कमला निखुर्पा

   स्मृति चित्र में /अविरल बहता /तुम्हारा प्यार । –सविता अग्रवाल सवि

    न आँसू  तुम /कजरा भी नहीं हो /नैनों में बसे।- डॉ ज्योत्स्ना शर्मा

   बिछड़  कर /तुम्हे  जब  सोचा  तो /क़रीब पाया ।-नमिता राकेश

  तन्हा  हो के  भी /नदी के  ये  किनारे /अकेले नहीं ।-नमिता राकेश

     मिश्री- सी मीठी /निबौरी सी कड़वी/अनंत यादें।- सीमा स्मृति

    शुद्ध व दिव्य प्रेम प्रभु की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है। यह हमारा मानसिक उत्थान तथा आत्मिक शुद्धिकरण करता है।प्रेम देह का नहीं, आत्मा का होता है। ऐसे प्रेम को एकाकी क्षण और भी निर्मल तथा पावन बना देतें है । दो पल का मिलन भी प्रेम को अटूट बनाकर, इबादत तक ले जाकर ,देह के पार …सीता व राधा- सा पवित्र बना देता है। मंदिर –मस्जिद में पाक लोबान, अगरु जैसे पवित्र सुगंध फैलाती…कोमल अनुभूतियाँ –

   व्याकुल मन /दो पल का मिलन /यही जीवन ।-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

   प्रेम बंधन /न रस्सी ,न  साँकल /पर अटूट ।-डॉ. जेन्नी शबनम

    मुहब्बत है/ रब्ब की इबादत/ खेल नहीं हैं । हरकीरत हीर

     यही है प्यार /आत्मा से जुड़े आत्मा /देह के पार ।सुशीला शिवराण

      जीवन बीता /वो कभी बनी राधा /कभी सीता ।ज्योत्स्ना प्रदीप

   अकेलापन प्रेम की  तलहटी से निकला एक अश्रु भी तो है। वेदों के अनुसार नर और नारी एक ही तत्त्व की दो प्रकार की मूर्तियाँ है।दो होकर वह रूप ,भाव ,शक्ति और सामर्थ्य में विभिन्न हो गया है ,नर व  नारी तत्वत: और वस्तुत: एक है। पर अब ये धारणा समय की परतों में दब गई। यही कारण है कि परिणय की परिभाषा में भी बदलाव आ गया । अब तो दो प्रेम करने वालो के बीच भी अहंकार की चट्टान आ जाती है ,तो प्रेम क़ी धारा क़ी दिशा ही बदलने लगती है , इससे अक्षय सूत्र के बन्धन ढीले होने लगे हैं।जीवन साथी का साथ होते हुए भी मन एकाकी हो जाता । मीत का छल-पीर को जन्म देता है… अथाह पीड़ा, जो कभी काँच –सी तो कभी  बबूल-सी चुभती है; पर कहें किससे ? इन काँटों को अब चुन लिया है ,तो सहेजना भी है । इस दर्द का  आरोह –अवरोह लिए कुछ सुंदर  हाइकु  द्रष्टव्य  हैं-

     टूटे काँच- सी /चुभती रहती है /बेवफाइयाँ ।- डॉ.उर्मिला अग्रवाल

     मीत का धोखा /छलक जाए आँख /दिल न मानें ।-डॉ.सुधा ओम ढींगरा 

      पीर जो जन्मी /बबूल- सी चुभती /स्वयं की साँसें ।शशि पुरवार 

       अथाह पीड़ा /बस मौन ही रहूँ /किससे कहूँ?-अनुपमा त्रिपाठी

दर्द जो दिए /कैसे जाऊँ मैं भूल /हिय के शूल।-पुष्पा जमुआर                       

     फूल जो खिले /सब तेरे हवाले /मैं चुनूँ काँटे ।-अनिता ललित

     रेतीली आँखे /बरसे शबनम /भीगे कपोल ।-आरती  स्मित

सहेजे मैंने /तेरे दिए वो काँटे / कभी न बाँटे ।ज्योत्स्ना प्रदीप                      

       चुप्पी दीवार/खड़ी हो गई ऊँची /लाँघी न जाए।-ऋता  शेखर मधु

      तुम दूर हो /खिड़की से झाँकता /आकाश पास ।रेखा रोहतगी

प्रकृति  में भी अकेलेपन को देखा जा सकता है समुद्र ,नदी ,पर्वत ,पेड़ ,पौधे ,आकाश ,सूर्य ,चंद्रमा तारे कभी न कभी एकाकीपन से साक्षात्कार कर ही लेते हैं कहीं अकेली झील स्वप्न बुनती है ,तो कहीं पहाड़ी नदी मस्त  छोरी सी घूम रही है ,कभी –कभी साँझ भी अकेली भटकने लगती है । हमारे सशक्त रचनाकारों  ने मूक में भी हूक सुनी है –     

       अकेली बैठी /बुनती रही झील /ख़्वाब ही ख़्वाब ।- डॉ. शैल रस्तोगी

      बीहड़ वन /अकेली मस्त छोरी/पहाड़ी नदी ।-नीलमेंन्दु  सागर

     मीरा-सी साँझ /जोगी की तलाश में /भटक रही ।-डॉ. सुधा गुप्ता

सुंदर चाक्षुप बिम्ब के कुछ और अनोखे रूप –

   अकेला पात /अटका डाल पर /राह देखता । डॉ. सुरेद्र वर्मा

       चलता रहा /सांझ पतझर की/ मार्ग अकेला ।डॉ. सुरेद्र वर्मा

       अकेला पेड़ /घर की दीवार से /सटा है पेड़ ।- डॉ. कुँवर दिनेश सिंह

       डगर सूनी / जी बहलाने आई /हवा बातूनी ।- डॉ. कुँवर दिनेश सिंह

       नीड़ गिराए/ सन्नाटें में नहाए/जंगल सारे ।-डॉ.भावना कुँअर

    बीज अकेला /अंकुर बन फूल /स्वयं है गला पुष्पा मेहरा

            भोर ने खोली /आँख ,चाँद घर को /चला अकेला ।रचना श्रीवास्तव

       अकेली रात /दूर तलक चली /कोई न मिला ।प्रियंका गुप्ता

             पर्वत पर /उगती हरी घास /एकाकी  मन ।पूर्णिमा बर्मन

कड़ी धूप में /मशाल लिये खड़ा /तन्हा पलाश । कमलेश भट्ट कमल

प्रकृति की तन्हाई को मानव ने समझा है,बखूबी उतारा भी है मन में ;पर उसका क्या ? उसे तो स्वयं ही इससे उबरने का मार्ग खोजना पड़ेगा, अपने मन को सबल बनाना पड़ेगा । सुख–दु:खमय संसार में वह मन सबल कहा जा सकता है ,जो समभाव से सुख-दुख का उपभोग कर सके- दुख में अनुद्विग्नमना और सुख में विगत-स्पृहा रह सके।निरवच्छिन्न सुख किसी के भाग्य में नहीं। दु:ख का हिस्सा सबको लेना पड़ता है,वह भी नितान्त अकेले; मगर धीरज रखना चाहिए-

             बड़ा कठिन /जीवन का समर/ धीरज धर ।- भावना सक्सेना

    पवित्र जीवन वसुन्धरा पर एक दुर्लभ वस्तु है। विचारों की पवित्रता कर्मों में स्वत:आ जाती है अकेलापन अपने में  ऐसी ही  शक्ति समाहित रखता है;जो अन्यत्र कहीं नहीं। यह आध्यात्मिक भाव को  भी जन्म दे देता  है। सत्य-पथ का अपूर्व प्रदर्शक एवं साधक बना देता है,आत्मचिन्तन का अवसर देता है-

      सत्य खोजता /मथता रहा मन /मन पुराण है । शशि पाधा

ईश-मनन की चरम सीमा तक  पहुँचा देता है-

        अकेलापन/नव-ऊर्जा-चेतना / ईश- मनन ।-गुंजन गर्ग अग्रवाल

ऐसे आलौकिक व्यक्ति ‘मै’ का अन्त करके अनंत युगों तक काम ,क्रोध ,मद ,लोभ ,मोह और अहंकार से मुक्त हो जाते है. असीम सुख के मकरन्द का पान करते है। परम उपरति को प्राप्त करते हैं-

       मै का हो  अंत/अनंत युगों तक / मन बसंत ।-ज्योत्स्ना प्रदीप

भीड़ में हों या अकेले, कोई साथ चले न जले, अँधेरा हो या उजाला , आगे ही बढ़ते जाना  है, क्योंकि यही तो जीवन है-चरैवेति चरैवेति-

    मैं नहीं हारा / है साथ न सूरज / चाँद न तारा ।-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु 

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Responses

  1. अच्छा लेख

  2. मन के अकेलेपन की अनेक छवियाँ और रंग ज्योत्स्ना जी ने बडी मेहनत से सहेजे हैं । इस से पता चलता है कि हाइकु की पहुँच कहाँ कहाँ तक है । उन्हें बधाई ।

  3. बहुत सुन्दर भावपूर्ण लेख! अभिव्यक्तिपूर्ण उद्धरण!!

  4. waah akele pan ki vyatha … us se uttapan chintan manan .. aas virah ke bhawo ko ektrit kar bahut hi khubsurati se yaha vykt kiya hai … jyitsna di ka ye lekh anupam hai badhayi 🙂

  5. vastav mein akelepan ko is bhii.D mein rah kar bhi Dhona hi pa.Data hai.kitana hi sukh -dukh ham sang- sath mein ba.NT le.n kintu kuch shesh ko akele hi jeenna padta hai jo use janate-samajhate hain ve bhi nahin ba. NT sakate .is sandarbh mei.n itana hi kahana hai;
    is sabha men
    hans rahi hoon ,par
    hoon main akeli !
    pushpa mehra.

  6. हाइकुकार की दृष्टि से अकेलेपन के विविध आयाम बहुत सुन्दर ,सशक्त रूप में प्रस्तुत किए गए हैं | मन को भीतर तक मथ देता अकेलापन और आत्मानंद में डूबा एकाकी भाव दोनों को ज्योत्स्ना जी की कलम ने बहुत प्रभावी ढंग से सुन्दर हाइकु उद्धरण के साथ ,उपस्थित किया है | सुन्दर , सरस आलेख हेतु लेखिका को बहुत बहुत बधाई ..हार्दिक शुभ कामनाएँ !!

  7. sarvpratham Jyotsnaa ji ko badhai . jinhonne ‘ akelapan ‘ par sabhi varishth sudhijanon ke haaiku ka smikshaatmk aalekh prastut kiya . mere haaiku ko bhi staan milaa .
    Rameshvar bhai – Hardip didi ke pryaason kaa pallvit haaiku vriksh ‘ shbdon kaa ujaala ‘ nabh si anntaa – vyaapktaa ne desh – videsh ke saahitykaaron ko jod diyaa . jinki klm se saraa saahity jagt roo – b – roo hotaa hae .
    meraa sadar naman .- aabhaar .

  8. बहुत ही गहनता से लिखा गया यह आलेख…अकेलेपन को उसके समस्त रंग-रूप के साथ उकेर कर रख दिया गया है इसमें…| ज्योत्स्ना जी को बहुत बधाई…और शुभकामनाएँ…|


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