Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 11, 2015

देशान्तर में महकी अपनी मिट्टी की खुशबू


प्रियंका गुप्ता

          हाइकु रचने वालों में देशान्तर के बहुत सारे हाइकुकार हैं ,जो अपने निरन्तर कार्य से अपनी  विशिष्ट पहचान बनाने में सफल हुए हैं। इनमें डॉ• भावना कुँअर , डॉ•  हरदीप सन्धु , रचना श्रीवास्तव और कृष्णा वर्मा ऐसे हाइकुकार हैं , जिनके एकल हाइकु संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं।इनके गुणात्मक सृजन को देखकर यही कहना पड़ता है कि  इनको केवल देशान्तर के हाइकुकार न माना जाए । इनके हाइकु का वैविध्य इनको  पूरे हाइकु-जगत्  में विशिष्ट स्थान दिलाने में सक्षम है। इन चारों  रचनाकारों के लेखन ने  मुझे बहुत प्रभावित किया है ।एक सरसरी नज़र में मैं जितना और जो कुछ अपनी अल्प बुद्धि से  समझ सकी हूँ , आपके सामने प्रस्तुत कर रही हूँ।

1-डॉ• भावना कुँअर

 किसी भी देश की भाषा, संस्कृति, साहित्य न केवल उस देश को ही समृद्ध करती है, बल्कि वो तो उस बहती नदी की धारा के समान होती है, जो जहाँ भी जाती है, अपने पीछे की भूमि को एक नई उर्वरा-शक्ति से परिपूर्ण कर जाती है…। पूरी दुनिया में एक बड़ी संख्या में फ़ैले प्रवासी भारतीय आज अपनी प्रतिभा और बुद्धि का लोहा पूरे विश्व को मनवा रहे हैं। बरसों पहले ग़ुलामी की मानसिकता के चलते जहाँ अपने ही देश में हम अपनी मातृभाषा बोलने में शर्म का अनुभव करते आए हैं, वहीं दूसरी ओर डॉ.भावना कुँअर जैसी कलम की धनी शख़्सियत भी है, जो न केवल अंग्रेजी भाषा पर अपनी एक मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं, बल्कि हिन्दी के साथ-साथ ही विभिन्न भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत की भी गहन ध्येता हैं। भावना जी न केवल कई सारे पठनीय और संग्रहणीय हाइकु-संग्रहों के कुशल सम्पादन में अपना योगदान दे चुकी हैं, बल्कि परदेसी धरती पर रहते हुए उनके स्वयं के भी दो हाइकु संग्रह-तारों की चूनर और धूप के खरगोश– हाइकु-प्रेमियों के दिलों में अपना स्थान बना चु्के हैं।  अभी-अभी  आपका सेदोका संग्रह भी आया है। चन्दनमन( हाइकु-संग्रह), भाव-कलश( ताँका-संग्रह), डॉ सुधा गुप्ता के हाइकु में प्रकृति( रागात्मक मनोभूमि: संचयन व संचरण) ,हाइकु-काव्य- शिल्प एवं अनुभूति के  सम्पादन में  रामेश्वर काम्बोज हिमांशु के साथ  तथा यादों के पाखी ( हाइकु-संग्रह)अलसाई चाँदनी( सेदोका-संग्रह), उजास साथ रखना( चोका-संग्रह) के सम्पादन में रामेश्वर काम्बोज हिमांशु तथा डॉ• हरदीप कौर सन्धु के साथ हाइकु जगत् में विशिष्ट सम्पादन कार्य सम्पन्न कर चुकी हैं

भावना जी मानो अपने नाम को ही सार्थकता देते हुए भावनाओं की हाइकुकार हैं। बिम्बों-प्रतीकों के सटीक प्रयोग के साथ-साथ उनके हाइकु महज शब्दों के मायाजाल नहीं हैं, बल्कि अपने अन्दर बहुत गहरे अर्थ भी समेटे बैठे हैं। एक बानगी के तौर पर प्रेम का ही विषय देखिए-

          प्रेम की वर्षा /फूलों पर करता/भँवर दल !

आम इंसान भँवरे को महज आवारगी से जोड़ता है, पर भावना जी ने उसका एक नया ही पहलू दिखा दिया। साथ ही प्रेम में विरह किस तरह एक प्रेमी-मन को तड़पा देती है, उसे वो कुछ यूँ व्यक्त करती हैं-

          आँखें  बोझिल/दुश्मन बनी नींद/तुम्हारे बिन ।

अपने आसपास की  प्राकृतिक सम्पदा को भी उनका कवि-मन किस तरह देखता है-

          धुन बनाए/ये चुलबुली झील/झूमे कमल ।

अकेलापन किसी भी इंसान की नींद उड़ा देता है, पर यहाँ भी भावना जी की कल्पनाशीलता बहुत रोचक है-

          नींद न आए/अकेलापन मुझे/लोरी सुनाए।

और ये भी एक नया ही पहलू है अकेलेपन का-

          अकेलापन/बाँटे रहा मुझसे/अपना ग़म ।

ऋतुओं की तकलीफ़ें भी उनको किसी शरारत से कम नहीं लगती-

          पसीने भीगे/कलियों के चेहरे/लूएँ हैं छेड़े।

और गर्मी की दुपहरी में चहुँ ओर पसरा सन्नाटा उनके शब्दों में मानवीकरण के साथएक नया ही दृश्य उपस्थित कर देता है-

          ऊँघता कुआँजून की दुपहरी/लुएँ प्रहरी।

सर्दी में धूप की आँख-मिचौली कुछ यूँ प्रस्तुत करती हैं-

          क्यूँ रूठकर/अटारी पे जा चढ़ा/धूप टुकड़ा।

          डरी- सी धूप/करने आई बात/शीत से आज।

भावना जी के हाइकु की सबसे बड़ी खासियत पाठक को ये लगेगी कि वे हर वस्तु को एक नई दृष्टि से देखती-परखती हैं। विभिन्न फूलों के लिए उनकी नज़र से रचे हाइकु की बानगी देखिए-

          दहकी जब/पलाश की अँगीठी/डरा अँधेरा ।

          जुगनुओं से/गुलमोहर वृक्ष/हैं झिलमिल।

          राह निहारें/बैठे खिड़की पर/ये कचनार ।

ये कचनार किसकी बात निहार रहे हैं ? वह भी खिड़की पर बैठकर कि बस झलक भर मिल जाए ! प्रिय की यह प्रतीक्षा कितना माधुर्य लिये  हुए  है !

अपनी धरती से दूर रह कर त्योहारों पर ही सबसे ज़्यादा दिल कचोटता है। ये पीड़ा उनके हाइकु में कुछ इस तरह व्यक्त होती है-

          परदेस में/राह देखता भाई/राखी ना आई।

यूँ तो बेटियों को हर पल माँ की याद सताती है, पर मीलों दूर जाकर बस जाने पर जब मायके की याद आती है तो ये दर्द और भी मुखर हो उठता  है-

          आज भी बसा/अम्मा के  ही घर में/मीठा -सा प्यार।

भावना जी का हाइकु-संसार ज़िन्दगी के किसी भी पक्ष से महरूम नहीं रहा, चाहे वह रूमानी जज़्बात हों-

          सुबक पड़ी/कैसी थी वो निष्ठुर/विदा की घड़ी।

या फ़िर समाज के शोषक वर्ग के प्रति उनकी तिलमिलाहट और आक्रोश-

          नन्हीं तितली/बुरी फँसी जाल में/नोच ली गयी।

बिम्बों का प्रयोग करने में तो जैसे भावना जी को महारत हासिल है। उनके द्वारा किए गए ऐसे ही प्रयोग जैसे हाइकु को सार्थकता प्रदान करते हैं-

          भटका मन/गुलमोहर वन/बन हिरन।

अगर संक्षेप में कहूँ तो भावना जी का अनुभव संसार बहुत वृहद् है और उन्होंने जिस खूबसूरती से बिल्कुल सटीकता के साथ उपयुक्त शब्दों का चयन करते हुए अपने हाइकुओं की रचना की है, वह निःसन्देह ही क़ाबिले-तारीफ़ है। इसके बावजूद एक सच्चे रचनाकार की तरह वे आज भी महसूस करती हैं कि अब भी उनसे बहुत कुछ अनकहा ही रह गया है-

          कहना चाहूँ/है छटपटाहट/कह ना पाऊँ ।

उनकी ये छटपटाहट यूँ ही बरकरार रहे ताकि उनके प्रशंसकों-पाठकों को निरन्तर उनकी रचनाओं और हाइकु का रसास्वादन करने का अवसर मिलता रहे, इससे बेहतर शुभकामना मैं उन्हें और क्या दूँ…?

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 2- डॉ•हरदीप कौर सन्धु

 जब कोई व्यक्ति अपनी मिट्टी से, अपने वतन से दूर किसी पराई धरती पर बरसों से जा कर बस जाता है, तो आम तौर पर यही माना जाता है कि वो हर तरह से परदेसी ही हो गया होगा । ऐसे में कोई न केवल अपनी मातृभाषा से पूरी तौर से जुड़ा रहे, बल्कि एक विदेशी साहित्यिक विधा को भी अपनी ही मिट्टी की खुशबू में इस कदर सराबोर कर दे कि एक समय बाद शायद सिर्फ़ नाम ही विदेशी रह जाएगा, बाकी सब कुछ अपना-सा…तो वो व्यक्ति निःसन्देह क़ाबिले-तारीफ़ होगा।      ऐसी ही एक शख़्सियत हैं- सिडनी (ऑस्ट्रेलिया) में बरसों से अपने परिवार के साथ रह रही सुश्री हरदीप कौर सन्धुजी…। हरदीप जी न केवल हिन्दी में जापानी काव्य-विधा-हाइकु- के लिए समर्पित हैं, बल्कि अपनी मातृभाषा पंजाबी में भी उन्होंने हाइकु के नियमों को ध्यान में रखते हुए अनेकानेक हाइकु रचना की है। हाइकु को समर्पित वेब-पत्रिका के सफ़ल सह-संचालन करने के अलावा उनके खुद के हाइकु का एकल संग्रह-ख़्वाबों की खुशबूभी भारतीय हाइकु जगत को समृद्ध करने में अपना योगदान दे रहा है। यादों के पाखी ( हाइकु-संग्रह)अलसाई चाँदनी( सेदोका-संग्रह), उजास साथ रखना( चोका-संग्रह) के सम्पादन में रामेश्वर काम्बोज हिमांशु तथा डॉ भावना कुँअर के साथ इनका भी विशेष योगदान रहा है ।

जहाँ तक उनके हाइकु संग्रह की बात है ; ज़िन्दगी का कोई ऐसा पहलू नहीं जो उनकी सशक्त कलम से अछूता रह गया हो…।

          चाहे वह हर पल मन में उमड़ती-घुमड़ती यादों की बातें हों-

          ठंडक मिली /आया जब यादों का /नाज़ुक झोंका ।

या फ़िर किसी प्रिय के बिछड़ जाने के बाद उसकी याद में आँखें नम हो जाती हों-

          याद उनकी /  हर पल है आती /     बड़ा रुलाती ।

हरदीप जी सिर्फ़ बहुत गहरे तक दिल के तार ही नहीं छूती, बल्कि जीवन के हर छोटी-बड़ी घटनाओं पर उनकी पैनी निगाह है। तभी तो जब लोकप्रिय सर्च इंजन गूगल अपने 14 जन्मदिन को मनाने की बेला में आया तो उन्होंने उसको भी हाइकु के माध्यम से बधाई दे डाली-

          दिन सुहाना/देखो जश्न मनाता /गूगल काका ।

साहित्य, खास तौर से कविता के प्रति उनके इस गहरे अनुराग की वो क्या वजह बताती हैं, ज़रा एक बानगी देखिए-

          लगे कविता /ज्यों माँ लोरी सुनाती/मुझे सुलाती ।

उनके हाइकु में बिम्बों का खूबसूरत प्रयोग मन को आनन्द से भर देता है-

          दुःख अम्बर /टिमके सुख तारे /बन दुआएँ ।

किसी भी सजग इंसान की तरह हरदीप जी को इस सुन्दर प्रकृति से प्यार है, उसकी चिन्ता भी है। मौसम बदल रहे, ऋतुओं की स्वभावगत विशेषताएँ भी अब पहले जैसी नहीं रही। तभी तो हरदीप जी कहती हैं-

          रूठा वसन्त/भेजी न पाती कोई/न नए पात ।

हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में दिखते साधारण से दृश्य भी उनकी लेखनी के स्पर्श से

काव्यात्मक हो गए हैं –

          पाक सुराही/ये विशाल गगन/जाम चाँदनी ।

सिर्फ़ प्राकृतिक सुन्दरता ही नहीं, बल्कि समाज के सामने एक भयावह सच्चाई के रूप में आते जा रहे प्रदूषण के प्रति भी उनकी चिन्ता साफ़ झलकती है-

          वसंती हवा/चलती अब कहाँ/उड़ता धुआँ ।

स्वयं भी एक प्यारी सी, प्रतिभावान् बिटिया सुप्रीत की माँ हरदीप जी को बेटियों से बहुत प्यार है। समाज में उनके विरुद्ध व्याप्त कुरीतियों-विडम्बनाओं से उनका मन क्षोभ से भर उठता है-

          माँ मजबूर /कोख में बेटी कत्ल /समाज चुप ।

इस पीड़ा का एक और उदाहरण देखिए-

          आज फिर क्यों /दहेज  बलिवेदी /चढ़ी दुल्हन ।

समाज भले ही बेटी को बोझ मानता हो, उनकी नज़र में बेटियाँ किसी दुआ से कम नहीं-

          प्यार-प्यार ही /पावन दुआ जैसी /बिटिया होती ।

हमारे भारतीय समाज मे राधा-कृष्ण को पूजने के बावजूद प्यार को किसी वर्ज़ित विषय की तरह लिया जाता है। परन्तु जीवन यदि प्रेम-विहीन हो, तो उस के बारे में वो कहती हैं-

          कैसे जिओगे ?/जब जीवन से हो/प्यार लापता ।

और यदि सच्चा प्यार मिल जाए, तब तो कहने ही क्या-

          मिला जो प्यार/पतझड़ बन गई /देखो बहार ।

सिर्फ़ रक्त-सम्बन्ध ही नहीं, बल्कि मन से बँधे मित्रता के रिश्ते को भी वे बहुत गहराई से सामने लाती हैं। एक सच्चा मित्र उनकी नज़र में कुछ यूँ उभर कर आता है-

          बनता दोस्त/पथरीली राहों का/नर्म बिछौना ।

अपने हाइकु में कई बार उन्होने इस संसार की परिकल्पना एक त्रिंजण के रूप में की है, जो उनके दार्शनिक चिन्तन को दर्शाता है-

          यह जीवन/संसार त्रिंजण का/खेल तमाशा ।

विदेशों में तो शायद उँगलियों पर गिने जाने लायक त्योहार-पर्व होते होंगे, पर हमारे देश की एक बहुत बड़ी खासियत है, यहाँ के त्योहार…। उनकी कलम से कोई त्योहार भी अछूता नहीं रहा है-

          वैशाखी सुना/फिरकी -सा थिरका/तन व मन !

          लोहड़ी  आई/निष्क्रियता की जड़/चूल्हे है पाई !

          तारे गगन/दीपक हैं जलते/धरती पर ।

परदेस में रहते हुए सिर्फ़ त्योहारों की रौनकें ही नहीं याद आती, वरन अपने देश-गाँव, अपनी मिट्टी से दूर होने की कसक उनके इस हाइकु में कुछ यूँ परिलक्षित होती है कि कलेजा चीर जाती है-

          चाटी की लस्सी/गाँव जाकर माँगी/अम्मा हँसती ।

हमारी कुछ विरासत, कुछ परम्पराएँ आज किस तरह हमारे बीच से लुप्तप्राय: हो  चुकी हैं, इन शब्दों में साफ़ स्पष्ट हैं-

          दादी पूछती/कहाँ फ़ेंक दिया रे?/चरखा मेरा ?

माँ की ममता भरी छाँव भी उनको किस कदर बेचैन करती है, ज़रा देखिए-

          सबसे बड़ा /   है इस दुनिया का /तीर्थ मेरी माँ !/

          माँ की रसोई /पकवान बनते /ममता -पगे !

आसान नहीं होता, अपनी जड़ से उखड़ कर कहीं चले जाना। अपनों से मीलों दूर जाकर परदेस में बसना क्या होता है, ये वो इस तरह बताती हैं-

          प्रवास में वो /धीरे जड़ लगाए /रोपा जो पौधा ।

हरदीप जी का रचना-संसार इतना वृहद है कि उनके समस्त हिस्सों को सिर्फ़ चन्द पंक्तियों में छू पाना सम्भव नहीं है। पर एक कामकाजी महिला होने के साथ-साथ न केवल वे एक अच्छी गृहिणी और माँ हैं, बल्कि जिस तरह उन्होंने पूरे विश्व से अनेकों कलमों को हाइकु विधा में अपने साथ लिया, किसी भी ईर्ष्या-द्वेष से परे होकर उन्हें प्रोत्साहित करते हुए अच्छे से अच्छा लिखने को प्रेरित किया, उससे यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि सब सामाजिक रूपों में बेहतर होने के साथ ही वे एक बहुत अच्छी इंसान भी हैं…और शायद यही उनकी सफ़लता का राज़ भी है…।

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3-रचना श्रीवास्तव

 अपनी नवाबी तहज़ीब और नफ़ासत भरी उर्दू ज़बान के लिए जानी जाने वाली उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में जन्मी और वर्तमान में विगत लगभग दस वर्षों से अमेरिका के लॉस एँजलिस में रह रही रचना श्रीवास्तव की दोनो भाषाओं पर समान पकड़ है। मूलतः हिन्दी में लिखने वाली रचना जी जब विभिन्न सहयोगी हाइकुकारों के हाइकु अवधी में अनूदित करके उसे एक पुस्तक रूप देती हैं, तो कहीं से भी उसकी भावप्रवणता या अर्थ में कोई कमी नहीं दिखती, उलटे उन हाइकु में एक अनोखी मिठास और जुड़ जाती है। ये प्रमाण है उनकी कलम के सक्षम और सशक्त होने का…। किसी एक जगह नौकरी में जुटने की बजाय घर-परिवार देखते हुए उन्होंने स्वतन्त्र पत्रकारिता का क्षेत्र चुना और साथ ही साथ विभिन्न विधाओं में अपनी कलम का जादू भी बिखेर रही।

          रचना जी बिल्कुल सहज शैली में गहरी बात कह देने वाली रचनाकार हैं।भोर की मुस्कान(2014) हाइकु-संग्रह उत्कृष्ट हाइकु सँजोए हुए है । किसी भी संवेदनशील इंसान की तरह वे ज़िन्दगी के हर रूप में, उसके हर रंग को बहुत गहराई तक महसूस करती हैं और उन्हें अपने नज़रिए से कागज़ पर उकेर देती हैं। वे सजीव तो क्या, निर्जीव वस्तुओं के आँसू भी देख लेती हैं-

          रोया था घर/टूटने से पहले/भीगी दीवारें ।

वे बेमुरव्वत और पल-पल बदल जाने वाले वक़्त की आवाज़ भी सुनती हैं, तभी तो उसको अपने शब्द कितनी खूबसूरती से देती हैं-

          बदलता हूँ/तभी  दुःख के बाद /सुख आता है ।

एक सजग इंसान के रूप में पूरी दुनिया में एक भयावह रूप लेती जा रही प्रदूषण की समस्या भी उन्हें विचलित करती है, तभी तो वे मानो खुद भी व्याकुल हो उठती हैं-

          देखी शिकन/मौसम के माथे पे/दुखी थी हवा  ।

          दूषित हवा/पूरी रात  खाँसता/बेचारा चाँद  ।

हम माँ कही जाने वाली अपनी धरती को भी आखिर क्या दे रहे, वे बता रही-

          धरा व्याकुल/देख अपनी काया/फफोलों भरी  ।

स्वार्थी लोगों को भले माँ की भी कोई कदर न हो, पर जब सामने रचना जी हों, तो भला वे इस कोमल और मधुर रिश्ते को कैसे भुला सकती हैं। माँ की याद कितनी शिद्दत से आती है उन्हें-

          बोलती नहीं /तस्वीर बन गई/अब माँ मेरी ।

कहते हैं, माँ से ही मायका होता है। वे भी मानती हैं यह बात, तभी तो कह उठती हैं-

          कोई न कहे -/कब आओगे घर /माँ के सिवाय ।

जब बात घर की चले तो भला अपने देश के पर्व-त्योहार क्यों न याद आएँ। लेकिन सामाजिक सरोकारों से उनके ऐसे हाइकु भी अछूते नहीं हैं, तभी तो त्योहारों की बात करते हुए भी वे कहती हैं-

          हवा न रोए/धुएँ के ज़हर से/इस दिवाली ।

           ज्ञान का दीप/हर आँगन जले/इस दीवाली ।

एक सुन्दर से बिम्ब-प्रयोग का उदाहरण देखिए-

          जला अनार/अम्बर खिड़की से/झाँके है चाँद ।

त्योहारों की जब कभी याद आती है, तो याद आते हैं अपनी धरती पर खिलने वाले विभिन्न मौसम…उनकी महक…उनकी छटा…।

          वसन्त है आया/धरती ने बदली/अपनी काया ।

          चाँद ने ओढ़ी/कोहरे की चादर/काँपते हुए ।

दुनिया के किसी भी कोने में ऐसी वर्षा पनिहारिन मिलेगी क्या, जिसका साक्षात्कार रचना जी अपनी जादुई कलम के माध्यम से करा रही हैं-

          भरे गागर/ऋतु पनिहारिन/छलक जाए ।

बहुत बड़ा सत्य हैं कि पराए आँचल तले कितनी भी ममता मिल जाए, पर बात जब किसी चिन्ता की हो तो सदा अपनी माँ ही याद आती है। तभी तो माता-स्वरूपा गंगा के सूखने की कितनी चिन्ता झलक रही उनके इन शब्दों में-

          सँभालो मुझे /दिखूँगी  नक़्शे पे ही /सूखी  अगर ।

जब माँ याद आती है, तो अपनी मजबूत बाँहों का सहारा देने वाले पिता भी उतनी ही शिद्दत से याद आते ही हैं-

          खड़ा होता है /धूप में बन साया/केवल पिता ।

केवल रक्त-सम्बन्धों में ही नहीं, बल्कि मन से भी बँधे रिश्तों को भी वे उतनी ही अहमियत देती हैं-

          मरुभूमि  में/बने प्यासे की बूँद/यही है प्यार  ।

ऐसा कौन होगा जिसे फूलों से प्यार नहीं होगा। कोई भी आम इंसान फूलों को महज फूल की खूबसूरती के लिए सराहेगा, पर रचना जी उसमें कैसा सौन्दर्यबोध जगा देती हैं, ज़रा एक बानगी देखिए-

          पलाश- फूल/पाँव में महावर/पेड़ लगाए  ।

          सजे अंगारे/पत्तों की हथेली पे/पलाश फूल  ।

और अन्त में, अंग्रेजी हिसाब से…लास्ट बट नॉट द लीस्ट…उनका मनमोहक अवधी अनुवाद-

          पिंजरा तोड़/न जाने किस ओर/लो पंछी उड़ा । (मूल)

          पिंजिरा तोर/न जाने कौने ओर/उड़ि गै पंछी । (अवधी-अनुवाद)

अब तक लगतार अपनी कलम से पाठकों का दिल जीतती आ रही रचना जी आगे आने वाले समय में भी ऐसे ही मनभावन और गहन अर्थ समेटे अपनी रचनाधर्मिता से पाठकों का दिल बार-बार जीतती रहेंगी, ऐसी ही आशा है…।

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 4-कृष्णा वर्मा

           कहते हैं, खंज़र से ज़्यादा ताक़त कलम में होती है। कितनी बार ये कलम अपना जादुई असर का अहसास बहुत छोटी उम्र में ही करा देती है, कई बार अपनी शक्ति का अन्दाज़ा लगते हुए थोड़ा सा समय भी निकल जाता है। पर बात तो वही है…जब जागे तब सवेरा…। दिल्ली में एक लम्बा समय बिताकर कनाडा में जा बसी कृष्णा जी जब हिन्दी राइटर्स गिल्ड से जुड़ी तब शायद उनको अहसास भी नहीं रहा होगा कि जल्दी ही ये जुड़ाव उन्हें एक नई और सशक्त विधा से इतनी शिद्दत से जोड़ देगी…हाइकु लेखन से…। वे न केवल कई सम्पादित संग्रहों में शामिल की गई हैं, बल्कि हाल ही में उनका खुद का भी एक हाइकु संकलन-अम्बर बाँचे पाती– भी प्रकाशित हो गया है।

          कृष्णा जी विभिन्न मानवीय कोमल मनोभावों की सहज चितेरी हैं। इनको वे बेहद खूबसूरती के साथ अभिव्यक्त करती हैं-

          घुली चाँदनी/आँगन के कसोरे/महके प्यार ।

जब वो कोई यथार्थपरक बात कहती हैं, तो वो उतनी ही गहराई तक पाठक का मर्म भेद देती है, और वो बहुत कुछ सोचने पर मजबूर हो जाता है-

          उड़ी संतान/युग की हवा संग/सौंप एकांत ।

बिम्बों का सटीक प्रयोग करने में तो जैसे उनको महारत हासिल है। जब वे रिश्तों की बाबत बोलती हैं ,तो  जटिलता से दूर उनकी  दार्शनिकता देखते ही बनती है-

          उधड़ें रिश्ते/सिसकियाँ टहलें/कण्ठ की गली।

          कितना जोड़ो/उधड़ ही जाते हैं/फिर पैबंद।

दुनिया के हर रिश्ते चाहे भले ही धोखा दे जाएँ, पर माता-पिता का नेह-बन्धन सिर्फ़ ममता, प्यार और सम्बल देना ही जानता है। हर किसी की तरह ही एक आम इंसान होने के बावजूद जब एक नारी माँ के रूप में आती है तो फिर उसके अन्दर एक अनोखी शक्ति, एक नया सामर्थ्य भर जाता है, तभी तो कृष्णा जी माँ के बारे में कुछ यूँ बताती हैं-

          पुतले सब/ माटी के, पर माँ की/माटी विशेष ।

और एक बच्चे के लिए, चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए, पिता किस तरह के सम्बल होते हैं, ज़रा देखिए-

          नहीं सिलता /पिता बिन कोई भी/फटा कलेजा ।

एक आम नारी के त्याग, समर्पण और सहनशक्ति को उनकी नज़र से कुछ ऐसे पहचाना जा सकता है-

          बेबसी पीती /दुखों को धोए, गूँधे/आटे में दर्द।

कृष्णा जी जब प्राकृतिक दृश्यों को अपने शब्दों का जामा पहनाती हैं तो उनकी मनमोहक छटा पाठकों को एक अलग ही रंगीली दुनिया में ले जाती है-

          नीली  छतरी/चाँद  सितारों  जड़ी/धरा  ले  खड़ी।

          बादल करें/सूर्य की अगुवाई/धरा थर्रायी।

          सोई है झील /श्वेत चादर तले/अखियाँ मूँदे।

          भिनसार में/टूटीं स्वप्न की साँसें/पलकें खुलीं।

ये हमारी खूबसूरत धरती जब अलग-अलग मौसमों के हिसाब से सज-सँवर कर हमारी नज़रों के सामने आती है, तो किसी का भी मन आह्लादित हो उठता है। कृष्णा जी के मनोहारी हाइकु किस तरह इनका शब्द-चित्र पाठकों के समक्ष खींच देते हैं, इसकी एक बानगी देखिए-

          हरी ओढनी /रंगी कशीदाकारी/क्या फुलकारी।

          शीत सताए/सोए रवि दिन में/साँझ उगाए।

          क्रोध से तेरे/वसुधा कुम्हलाई/हवा रुआँसी।

इन ऋतुओं के साथ-साथ धरा समय-समय पर जब खूबसूरत फूलों से अपनी काया सजाती है, तो कैसा सुन्दर दॄश्य उपस्थित हो जाता है-

          गुलमोहर-/हथेली पर हिना/रचाता कौन ।

          स्वर्ग सुमन/धरती के आँचल/टाँके ऋतु  ने।

किसी भी आम इंसान की तरह कृष्णा जी भी त्योहारों में खुशियाँ तलाश लेती हैं। परन्तु इसके साथ ही उनके हाइकु में आशा-विश्वास की एक अनोखी झलक भी दिखती है-

          आज खुदाई/रोशनी में नहाई/ओढ़ के खुशी।

          बेमोल माटी /गढ़ती है दीपक/साहस -भरा।

कृष्णा जी के हाइकु पढ़ते समय पाठकों को अपने सामने विभिन्न भावों और अनुभूतियों से भरे एक नए ही संसार का अवलोकन होता है। नए-पुराने हाइकुकारों के बीच अपनी सशक्त उपस्थिति महसूस कराती हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है।

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ई-मेल-

 priyanka.gupta.knpr@gmail.com

 

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Responses

  1. Rochak lekh!

  2. विदेशी धरती पर अपनी संस्कृति और भाषा के उत्थान के प्रति समर्पित विशेषकर हिन्दी हाइकु के निरंतर सिंचन ,पल्लवन में रत चारों रचनाकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर बहुत सुन्दर ,सारगर्भित प्रस्तुति !
    इस परिश्रम साध्य कार्य के लिए प्रियंका जी को बहुत बहुत बधाई ,हार्दिक शुभ कामनाएँ !

  3. hamare sashakt haikukaaron ne hi deshantar mein apnee mitti ki mahak ko banaye rakkha hai ..ye bade hi garv ki baat hai ..aur isi mahak ko badi hi khoobsurti se utara hai priyanka ji ne is lekh mein.sundar v saargarbhit lekh ..aap sabhi ki lekhni ko pranaam..shat -shat pranaam.

  4. देशान्तर में भी अपने देश की माटी की गंध, अपने गाँव का वसन्त और सावन, संस्कार व त्योहार, अपने देश की भाषा व संस्कृति के प्रति समर्पण भाव से काव्य सृजन में रत चारों हाइकुकारों के कृतित्व को उद्घाटित करता बढ़िया आलेख!!! प्रियंका गुप्ता जी को साधुवाद!!! – डॉ कुँवर दिनेश

  5. gahan bhawo ko liye apni mati or jude in sabhi rachnakaro ko dil se naman

  6. किसी रचनाकार के व्यक्तित्व तथा कृतित्व के बारे में लिखने के लिए उसको केवल पढ़ना ही आवश्यक नहीं बल्कि गुणना भी ज़रूरी होता है। प्रियंका गुप्ता का यह लेख इसी बात का जीता -जागता उदाहरण है कि आपने जिस दिलचस्पी से हम सभी रचनाकारों के हाइकु पढ़े होंगे उसी शिद्द्त से अपनी कलमी मोतियों की माला में व्याख्या करते हुए पिरोया भी है। यह तो केवल बड़ा तथा निर्मल मन ही लिख सकता है। आजकल देखने में आया है कि अच्छे को अच्छा कहने से भी लोग हिचकिचाते हैं। ऐसे में कोई ऐसी कलम जो किसी रचनाकार की रचनाओं को सारगर्भित प्रस्तुति करती है …हम उसका हार्दिक स्वागत करते हैं और उसकी कलम को सलाम भी।

    डॉ हरदीप सन्धु

  7. हमें गर्व है अपने इन साथ हाइकुकारों पर, जो अपनी मिटटी से दूर होकर भी उससे दिल से जुड़े हुए हैं और बड़ी लगन व मेहनत से, दिल से, समर्पित एवं सृजनरत होकर अपनी संस्कृति तथा भाषा की ख़ुश्बू बिखेर रहे हैं !
    प्रियंका जी ने इन हाइकुकारों की रचनाओं का गहरा अध्ययन किया है और इस आलेख में उनका परिश्रम साफ़ दृष्टिगोचर होता है। इस आलेख के लिए आपको हार्दिक बधाई !

    ~सादर
    अनिता ललित

  8. मेरी इस छोटी सी कोशिश को इतनी सराहना देने के लिए दिल से आप सभी की आभारी हूँ…| आदरणीय काम्बोज जी का भी तहे दिल से शुक्रिया कि उन्होंने मुझे इस काबिल समझा कि मैं इतनी सशक्त कलमों के बारे में कुछ लिख सकूँ…|

  9. बहुत सुन्दर स्तरीय लेख। प्रियंका जी जिस गहनता से आपने हाइकुओं में छिपे भावों को जाना और सुन्दर शब्दों में विस्तार दिया सच में सराहनीय है। अपने लेख में इतने योग्य हाइकुकारों के बीच मेरे हाइकुओं को स्थान देकर आपने जो मेरा उत्साहवर्धन किया है हार्दिक आभार। आपको बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।

    सादर
    कृष्णा वर्मा

  10. सबसे पहले देरी से आने के लिए माफी चाहती हूँ अपनी कुछ मजबूरियों के कारण लिखने और पढ़ने से दूर रहना पड़ा।प्रियंका जी ने मेरा लेखन आज सार्थक कर दिया ये सच है कि अच्छा लिखे को अच्छा कहना आज के युग में बहुत कम रह गया है आप जो भाव लेकर लिखे वो पाठक ग्रहण करता है या नहीं पहली बात, दूसरी बात की ग्रहण करता भी है तो उसका आंकलन सही होता है या नहीं? तीसरी बात क्या उस आंकलन के सबके सामने प्रस्तुत करने में हिचकता है कि नहीं ?प्रिंयका जी ने खूब मन के साथ,लगन के साथ हम रचनाकारों को पढ़ा एक बार नहीं कईं कईं बार पढा तब जाकर उनका ये गहन लेख सामने आया है बहुत शिद्दत के साथ आपने ये लेख लिखा है छोटी से छोटी बात को आपने बहुत गहराई से महसूस किया है मैं तहे दिल से आपका आभार व्यक्त करती हूँ और गहन सोच को बनाए रखने के लिये आपको शुभकामनाएँ देती हूँ।बहुत-बहुत आभार
    डॉ० भावना कुँअर

  11. बहुत प्यारा आलेख, अपनी माटी की गंध और भाव को उकेरती सभी प्रवासी हाइकुकारों की लेखनी को नमन…साथ ही बधाई प्रियंका को|

  12. बहुत सुन्दर लेख. प्रवासी हाइकुकार दूर रहकर भी अपनी मिट्टी से जुड़े हुए हैं. सभी को बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ. सार्थक लेखन के लिए प्रियंका जी को बधाई.


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