Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मार्च 6, 2015

मन फागुन ।


सुनीता अग्रवाल

1

टेसू न खिले

मले  कृत्रिम रंग

चेहरे जले।

2

कोरी अँगिया

मनवा रँग गए

नैनों से सैयाँ।

3

मंजीरा ,चंग

ठिठोलियाँ ,चुहल

फागुन रंग।

4

विविध रंग

संदेशा प्रकृति का

प्रेम की छटा।

5

भर उमंग

खेले हाइकु होली

।रंग बिखरें।

6

गोपी अरज-

खेलो होरी साँवरे

मन-बिरज।

7

भूलो सजन

शिकवा- शिकायत

होली मिलन।

8

रंग दी भौजी

सजन मनमौजी

घूँघट बैरी।

9

यारो के संग

त्योहारों की उमंग

भंग- तरंग।

10

शर्माई गोरी

बिखरे गालों पर

सिंदूरी रंग ।

11

उदास गोरी

बीता जाए फागुन

चूनर कोरी।

12

नशीले नैन

बहकाती कदम

प्रीत- मदिरा।

13

श्यामल गात

प्रीत गुलाल लगा

रहा निखर ।

14

दहक रहा

महँगाई का रंग

सिमटा फाग।

15

सजनी- धरा

अपने रंग रँगे

अम्बर पिया ।

16

होली -दहन

जले द्वेष , मलाल

मन फागुन ।

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Responses

  1. sundar haiku badhai…

  2. kamboj bhaiya or hardeep di ka haardik aabhar … rachna ko sthan dekar utsah badhane ke liye
    bhawna ji pasandgi jahir karne ke liye haardik aabhar 🙂


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