Posted by: हरदीप कौर संधु | फ़रवरी 6, 2015

यादें ही यादें


डा सुरेन्द्र वर्मा 

यादों के पाखी ( हाइकु-संग्रह):सं रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, डॉ भावना कुँअर, डॉ हरदीप सन्धु, संयोजन रचना श्रीवास्तव, मूल्य: 200 रुपये, पृष्ठ:136, संस्करण :2012, प्रकाशक: अयन प्रकाशन , 1/20, महरौली नई दिल्ली-110030

 हाइकु संग्रह, ‘‘यादों के पाखी’’ मेरे सामने है। इसमें 48 रचनाकारों के याद-विषयक हाइकु सम्मिलित किए गए हैं। संग्रह की रचनाओं में यादें ही यादें बिखरी पडी हैं। जहां इसमें एक ओर मीठी, प्रसन्न, गुदगुदाती, सुखी यादें हैं वहीं दूसरी ओर, दुखी, तल्ख़, रुलाती यादें भी हैं।जहां  1-यादों के पाखीराहत देतीं ’सकून’ यादें हैं, वहीं विचलित करती और ‘सकून-लूटती’ यादें भी हैं।

इस पुस्तक में ‘यादों का सैलाब’ है, जिसमें न जाने कितने अनुभव स्वच्छंद बह रहे हैं। ‘यादों की किश्ती’ है, जिसपर बैठकर रचनाकार सैर कर रहे हैं। ‘यादों का चरखा’ है जिससे बीता हुआ समय काता जा रहा है। ‘यादों का तकिया’ है जिसपर सर टिका कर राहत की  साँस ली जा रही है। ‘यादों के झरोखे’ हैं जिनमें से ताक-झाँक की जा रही है। ‘यादों की बरात’ है, जिसमें सज-धज कर यादों का कारवाँ निकला है। ‘यादों की पिटारी’ है जिसका आवरण उन्मुक्त भाव से खोल दिया गया है। गरज कि सैर करने के लिए पूरा का पूरा एक ‘यादों -भरा नगर’ है।

संग्रह का नाम, ‘यादों के पाखी’ है। पक्षी के लिए विचरने को खुला आकाश है। ‘यादों के पाखी’ पदबंध पुस्तक में सम्मिलित कई हाइकुओं में आया है। डॉ•भावना कुँअर का ही, जो संग्रह के संपादकों में से एक हैं, एक हाइकु है,

   यादों के पाखी /आए जब मिलने/सोया था मन ।

शायद पुस्तक का नामकरण इसी हाइकु की प्रथम पंक्ति से लिया गया हो। चन्द्रबली शर्मा और सुशील शिवराण की रचनाओं में भी यही पदबन्ध उपस्थित है। –

   यादों के पाखी / थक गए शायद / उड़ न पाएँ ।  (चन्द्रबली शर्मा)

     यादों के पाखी / बना ह्रदय नीड़ / दें घनी पीड़।  (सुशील शिवराण)

बहरहाल मन कितना ही सोया क्यों न हो स्मृति रूपी पक्षी उसे जगाए बिना नहीं रहते। वे शायद थकते भी नहीं। पर इसमें शक नहीं तल्ख़ यादें पीड़ा तो देती ही हैं।

   अपनी किसी मीठी याद को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए एक सर्व-साधारण तरीखा है कि लोग अपनी किताब के पन्नों के बीच किसी फूल या पत्ती या कोई पंख को रख देते हैं। काफी समय गुज़रने के बाद जब वे अपनी किताब खोलते हैं उसमें से वही फूल जो अब सूख चुका है निकल पड़ता है लेकिन ‘याद’ ताज़ा कर देता है। कई रचनाकारों ने इसी भाव को अपने हाइकुओं में वाणी दी है।  डॉ• सुधा गुप्ता कहती हैं –

             भूलता नहीं / एक सूखा गुलाब / बंद किताब । 

कुछ अन्य रचनाकारों ने भी इस सन्दर्भ में अपने भाव प्रकट किए हैं।

            याद तो होगा / पुस्तकें बदलना / पृष्ठो में फूल। (डॉ भगवतशरण अग्रवाल)                      

            मुड़ा -सा पन्ना / कह गया कहानी / वर्षों पुरानी। (डॉ भावना कुँअर)                       

            किताब खोली / सूखे पन्नों में दिखा / बीता यौवन। (डॉ सतीश राज पुष्करणा)   

          ‘पत्तियाँ नहीं / झरती किताबों से / यादें तुम्हारी। (डॉ ज्योत्स्ना शर्मा)               

          ‘सूखे फूल-सी / निकली किताबों में / पुरानी यादें। (मंजु मिश्रा) 

      यादों के तागे में कितने ही तो मोती पिरोए गए हैं। कोई चिनार वन को याद करता है, तो किसी की याद में बासों का झुरमुट बसा है। यादों में चकवी और पपीहा जैसे पक्षी हैं तो सुमनों की सुगंध भी है। फूली सरसों है तो सावन की फुहार भी है। अमराई है, धूप है, चाँदनी है, हरे भरे बागीचे हैं। शैशव की स्मृतियाँ हैं, युवावस्था के सुख और सदमें हैं।

    ज़ाहिर है, यादों का अपना समय-क्षेत्र वर्त्तमान या भविष्य नहीं होता। यादें केवल विगत-काल की ही होती हैं। विगत से मनुष्य का सदैव ही एक भावनात्मक सम्बन्ध रहा है। उसने सदैव अपने ‘गुड ओल्ड डेज़’ याद किए हैं। जिन्होंने मजबूरी-वश गाँव से पलायन किया है और शहर में बस गए हैं, वे अपने गाँव के विगत अच्छे दिनों की याद करते हैं और दुःख मनाते हैं, रमाकांत श्रीवास्तव कहते हैं-

       गाँव मुझको / ढूँढ़ता, मैं गाँव को / खो गए दोनों ।

             खोजता हूँ मैं / गाँव की गलियों में / खोया शैशव ।

             देता आवाज़ / गाँव का वो आँगन / उलझे कहाँ ।

अन्य रचनाकारों ने भी अपने अपने गाँव के सम्बन्ध में कुछ कुछ इसी तरह के भाव प्रकट किए हैं।हरदीप कौर सिन्धु के मन में तो उनका गाँव गहने की तरह बसा हुआ है, वे कहती हैं-

       गाँव की यादें / बसे मन-आँगन / ज्यों हो गहना ।         

 इसी तरह वरिंदरजीत सिंह की ‘यादों में आया/ चूल्हे भुने भुट्टों का/ स्वाद निराला’ डा,सतीश राज पुष्करणा के मन में तो ‘गाँवके बीच / दादा का बरगद / यादों में बसा’ (है)।

     राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी बंधु को तो अपने गाँव की याद बहुत ही रुलाती है-

       कच्चे घर थे / पेड़ों से घिरा गाँव / ईंट हो गया ।                                        

            स्वप्न हो गया / पेड़ों पर झूलना / कजली गाना।                                              

            गाँव जो गए /ढहे  खंडहर भी /बोलने लगे।

    यादों की पिटारी एक भरी पूरी पिटारी होती है। इसमें जहां गाँवों की बिछुडन है वहीं बिछुड़े हुए आत्मीय जन की स्मृतियाँ भी हैं। विवाहिता स्त्रियाँ अपने मायके की भावुक याद करती हैं। डॉ जेनी शबनम की यादों की पिटारी जब खुलती है तो यादें बिखर बिखर  जाती हैं। वे कहती हैं, –

       पीहर छूटा /बचपन भी रूठा / याद रुलाए ।

             बीती सदियाँ  /लुका छिपी थी खेली / सखियों संग।

            कौन बुलाए / बाबुल की गलियाँ /बाबा न अम्मा !

इसी प्रकार सुशीला शिवराण भी ‘माँ का आँचल’ और ‘पिता की गोद’ तो याद करती ही हैं, अपनी ‘हवेली चौक’ को भी याद करती हैं जिसमें थीं ‘चार पीढियाँ साथ / पलता प्यार’। वे  बचपन के दिनों की खेल-स्मृतियाँ भी ताजा करती हैं। उन्हें

          नदी का पाट / वो घरौंदे बनाना / आता है याद

प्रियंका गुप्ता के पास हैं

          अम्मा की गोद / परियों की कहानी / यादें सुहानी

और साथ ही,                             

          दादी के घर / यहाँ वहां बिखरी / कितनी यादें!

डॉ मिथिलेश कुमारी मिश्र भी ‘ माँ की ममता / किसी भी पल / भूल न पाती’। इसी प्रकार डॉ रमा द्विवेदी अपने भैया को याद करती नहीं थकतीं –

       एक ही आस / राखी के पर्व पर / भैया हों पास।                                                                      

       कंठ हो रुंधा / भैया से गले मिल / खुशियाँ झरें ।    

माता, पिता और भाई की याद आना तो सहज, सरल है ही, भारत में स्त्री का भावुक मन बुआ, दादी और बाबा के लिए भी उतना ही टीसता है –

       स्नेह फुहार / था बुआ का वो प्यार /मीठी बयार। (ऋता शेखर मधु‘)

            दादा का लड्डू / बाबा की रजाई / हुई पराई ।(भावना सक्सेना)

      यादें न होतीं तो हमारा भूतकाल पूरी तरह अन्धकार में होता। यादें हमारे विगत को उजास और उजेला देतीं हैं। यादें दीपक की तरह हैं। वे हमारी भूले हुए अनुभवों प्रकाशित कर देतीं हैं। कवि अपने यादों के दीप जलाना चाहता है ताकि दिल के अँधेरे कोनों में उजाला हो सके। वह अच्छी तरह से जानता है कि –

          यादें हैं दीया / दिल के अंधेरों में / उजाला करें

            तुम्हारी याद / अँधेरे में दीप सी / रहे आबाद                    

इसी लिए तो  नदी समीप / मन बैठा तैराता / सुधी के दीप (डॉ गोपालबाबू शर्मा)  

ऐसे में यादें उजास से भर उठती हैं और तब ऐसा लगता है कि –

       उजास फैली / भोर किरण सी / तेरी याद भी   (डॉ उर्मिला अग्रवाल)               

            धुले रूप सी / गुनगुनी धूप- सी / तुम्हारी यादें ।(रामेश्वर काम्बोज)

     रामेश्वर काम्बोज हिमांशु और उनकी टीम (डॉ भावना कुँअर, डा

डॉहरदीप कौर संधु और रचना श्रीवास्तव) ने हाइकु संग्रह ’यादों के पाखी’ का कुशल सम्पादन तो किया ही है, स्मृति-संबंधी उनके अपने हाइकु भी अपनी रचनात्मकता और मौलिकता में अलग खड़े दीखते हैं। बानगी के रूप में निम्नलिखित कुछेक द्रष्टव्य हैं

       टेरती रहीं / हिलते रूमाल -सी / व्याकुल यादें । (रामेश्वर काम्बोज हिमांशु)         

            सँजोके रखीं / यादों की कतरनें / तकियों पर।  (डा भावना कुँअर)               

            थका ये मन / ले यादों का तकिया / जी भर सोया    (डा हरदीप कौर संधु)        

            आँसू से लिखी / वो चिट्ठी जब खोली / भीगी हथेली । (रचना श्रीवास्तव) 

      डा भगवतशरण अग्रवाल एक वरिष्ठ हाइकुकार हैं और उन्होंने हाइकु भारती से आज के अनेक रचयिताओं को हाइकु लिखना सिखाया है। इसी प्रकार डा सुधा गुप्ता भी हैं जिन्होंने प्रकृति को केंद्र में रखकर भारत में हाइकु विधा को प्रतिष्ठित किया है। –

       फूला पलाश /यादों के दीप जला / आया बसंत । (डा भगवतशरण अग्रवाल)                

            यादें ही यादें / आँखें बंद की तो क्या / चित्र उभरे । (डा भगवतशरण अग्रवाल)     

            याद चिड़िया / मन की अटारी पर / तिनके जोड़े ।   (डॉ सुधा गुप्ता)                       

            देखा जो तारा / माँ की लौंग का हीरा / कौंध मारता (डॉ सुधा गुप्ता)

       डा रमाकांत श्रीवास्तव कदाचित इस समय हिन्दी के वरिष्ठ हाइकुकार हैं। डा गोपालबाबू शर्मा भी वरिष्ठ हाइकुकारों में ही आते हैं। ये दोनों आज भी सक्रिय रूप से हाइकु विधा को अपने योगदान से संपन्न कर रहे हैं-

       तुमने दिया / प्रीति का जो गुलाब / ताज़ा रहेगा । (डा रमाकांत श्रीवास्तव)           

            आया बसंत / मंजरियों में बसी / तेरी सुगंध।   (डॉ रमाकांत श्रीवास्तव)         

       आकुल मन / भर भर आते ज्यों / यादों के घन।  (डॉ गोपाल बाबू शर्मा)

    हिन्दी हाइकु लेखन में डॉ उर्मिला अग्रवाल, डॉ मिथिलेश दीक्षित तथा डॉ सतीश राज पुष्करणा  ने भी अपनी राचनाओं से हिन्दी हाइकु जगत का ध्यान खींचा है। कुछ हाइकु द्रष्टव्य हैं-    

       उजास फैली / भोर किरन नहीं / तेरी याद थी । (डॉ उर्मिला अग्रवाल)

            कान्हा की यादें  /सिसकी भर रहा / राधा का मन। (डॉ उर्मिला अग्रवाल)                             

            जैसे बसती / सुरभि सुमन में / स्मृति मन में। (डॉ मिथिलेश दीक्षित)

            रेत का घर / कभी तोड़ा, बनाया / भूल न पाया    ( डॉ सतीश राज पुष्करणा)

    और अंत में, याद संबंधी लगभग 793 हाइकु के इस अद्भुत संग्रह से अपेक्षा कृत नए रचनाकारों के कुछ चुनीन्दा हाइकुओं को उद्धृत करने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पा रहा हूँ-  

1-घुमड़ी यादें /चलती लेखनी भी / लिख न पाई। चन्द्रबली शर्मा

2-कहीं भी जाऊँ / परछाईं सी साथ /यादें तुम्हारी । कमला निखुर्पा)              

3-सहला जातीं /गुनगुनी धूप- सी / पुरानी यादें (प्रियंका गुप्ता)                           

4-यादों के ख़त /भटकते पहुँचे /बरसों बाद (डॉअनिता कपूर)                              

5-याद खुशबू / साथ भी रहती /उड़ भी जाती (डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति)           

6-यादों की हवा/छेड़ पत्ते ज़ख्मों के /कर दे हरा ।(रेखा रोहतगी)                       

7-घड़ी पुरानी/नहीं वक्त बताती/बातें करती (श्याम सुन्दर अग्रवाल)                

8-कल की बात/आज थे मेरे साथ /आज भी याद (सुदर्शन रत्नाकर)          

9-जीवन मेरा / था सूखी धरती सा / यादों ने सींचा । (सुभाष नीरव)               

10-यादों की शाल / कांपती रूह पर / ओढ़ मैं बैठी (स्वाति भालोटिया)           

11-यादें कांकर / गिरे मन सागर / अक्स डोलते ।(डॉ सरस्वती माथुर)           

12-काली थी रातें /दिल दीपक बना /बाती थी यादें ।(प्रो दविंद्र कौर सिद्धू)      

13-सपने बुने /अलगनी में पड़े /सूखते रहे(डॉ रमा  द्विवेदी)                         

14-छीला जो मैंने /यादों की फलियों को/बिखरे दाने ।(संगीता स्वरूप)         

15-हैं कुछ कही /हज़ारों अनकही /यादें हमारी ।(मुमताज टी एच खान)            

16-आग बरसी /झुलसी कल्पनाएँ /बची हैं यादें ।(डॉ उमेश महादोषी)         

17-यादें गहना / चंचल से मनका / मैनें पहना ।(डॉ अमिता कौंडल)            

18- मिश्री सी मीठी / निबौरी सी कड़वी / अनंत यादें (सीमा स्मृति)                   

19-याद तुम्हारी/आँखों के कोरों पर/आँसू की बूँद(कृष्णा वर्मा)                                  

20-स्वप्न से सजे /आँचल लहराए /वो याद आए(तुहिना रंजन)                       

21-शांत मन में/बुलबुले सी उठीं/सहसा यादें ।(सारिका मुकेश)                                  

22-दुःख बादल/बिजली की रेख सी/चमकी याद।(दिलबाग विर्क)                       

23-गाड़ी में मिले /वे दो पल के साथी/कभी न भूले।(पुष्पा जमुआर)                        

24- यादों के पत्ते /कभी न उड़ पाए /तूफाँ भी आए  (उमेश मोहन धवन)              

25- मेरा ह्रदय / यादों की डोर बंधा / पतंग बना (अनुपमा त्रिपाठी)                           

26-दिल ही काफी / याद में जलने को /बुझा दो दीप (कृष्ण कुमार कायत)

-0-

 डॉ सुरेन्द्र वर्मा ,

10, एच आई जी ,  1, सर्कुलर रोड,   इलाहाबाद 211001

   मो 09621222778

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Responses

  1. बढ़िया हाइकु संग्रह “यादों के पाखी” की बढ़िया, विस्तृत और बहुत ही सुन्दर समीक्षा .. पुस्तक के हर पहलू को बारीकी से देखा और समझा है डॉ सुरेन्द्र वर्मा जी ने …
    इस संग्रह के लेखकों व वर्मा जी को बधाई लाजवाब समीक्षा के लिए .१..

  2. sundr mukhprishth ke saath 793 haikoo kaa anmol sngrah ‘ yaadon kaa paakhi ‘ hindi sahity jagat kii yaadgaar dharohr vishv shikhar ko choo rhii hae .
    snpaadakon ke saath , smikshk surendr varma ji rachnaakaaron ko badhaai .

  3. बहुत सारगर्भित समीक्षा…आ० सुरेन्द्र वर्मा जी को बधाई|
    यादो के पाखी
    यादों मे लहराए
    यादों की माला
    पुस्तक में सम्मिलित सभी रचनाकारों एवं सम्पादक रचनाकारों को हार्दिक बधाई !
    *ऋता*

  4. bahut gahan adhyan ke baad likhi gayi samiksha .yado ko sunder upmaon me bandh kar likhi gayi samiksha .kamal
    mujhe is mustak me naam dene ke liye bhai Himanshu ji Bhavna ji Hardeep ji ka abhar
    Rachana

  5. Bahut man se, bahut vistrit rup se likhi “yadon ke paakhi” ki samikasha ke liye aapko hardik badhai or aabhaar…

  6. बहुत बढ़िया भरपूर समीक्षा डा० सुरेन्द्र वर्मा जी को बधाई!

  7. यादों की उपमाएं लाजवाब हैं ,कहीं किश्ती हैं तो कहीं चरखा|याद कहीं झरोखा है तो कहीं पिटारी ,यादों की बारात है तो कहीं पूरा का पूरा यादों भरा नगर |अति सुन्दर |बहुत -बहुत बधाई

  8. एक खूबसूरत संग्रह की सार्थक समीक्षा के लिए सुरेन्द्र जी को हार्दिक बधाई और आभार…|

  9. sunder v saargarbhit samiksha …hardik badhai dr surendr verma ji ko .

  10. sundar pustak kii bahut saargarbhit sameekshaa ke liye haardik badhaaii …saadar naman !

  11. विषय जब ‘याद’ हो तो अभिव्यक्ति तो बेहतरीन होनी ही है ! बहुत ही प्यारा एवं ख़ूबसूरत हाइकु-संग्रह है।
    आदरणीय सुरेन्द्र वर्मा जी की अनुभवी लेखनी से समीक्षा बहुत-बहुत प्रभावी बन पड़ी है !
    ह्रदय से बधाई आप को एवं सभी हाइकुकारों को !

    ~सादर
    अनिता ललित

  12. सुरेन्‍द्र वर्मा जी आप को हदय से धन्‍यवाद ।


रचनाओं से सम्बन्धित आपकी सार्थक टिप्पणियों का स्वागत है । ब्लॉग के विषय में कोई जानकारी या सूचना देने या प्राप्त करने के लिए टिप्पणी के स्थान पर पोस्ट न करके इनमें से किसी भी पते पर मेल कर सकते हैं- hindihaiku@ gmail.com अथवा rdkamboj49@gmail.com.

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