Posted by: डॉ. हरदीप संधु | दिसम्बर 29, 2014

हिन्दी -हाइकु में शीत ॠतु वर्णन


डा०ज्योत्स्ना शर्मा

       ॠतु-काव्य परम्परा में ॠतुराज वसंत ,वर्षा और ग्रीष्म के साथ शीत ॠतु के भी सुन्दर ,मोहक बिम्ब प्राप्त होते हैं । जिस प्रकार आरोपित कलम स्वयं की विशेषताओं के साथ मूल वृक्ष की विशेषताओं को समन्वित करती हुई विशिष्ट फल, फूल प्रदान करती है वैसे ही जापान से आए प्रकृति के कुशल चितेरे  हाइकु ने भारतीय आचार-विचार ,वेश-परिवेश के साथ यहाँ की जलवायुगत विशेषताओं को आत्मसात् करते हुए बहुत-बहुत मनोहारी दृश्य उपस्थित किए । वसंत-सुषमा और वर्षा का सरस संगीत ,ग्रीष्म का दाहक सौन्दर्य तो शीत की रीत हिन्दी हाइकु ने सभी को अपने नन्हे-से कलेवर में साकार कर हिन्दी  साहित्य को समृद्ध किया।आज यहाँ हिन्दी  हाइकु में शीत वर्णन अभीष्ट है। ज्यों ही वर्षा ॠतु ने अपनी छटाएँ बिखेर धरा को रस-सिक्त बना शनैः शनैः प्रस्थान किया , मेघों से आच्छादित नभ के स्थान पर स्वच्छ ,निर्मल नील गगन अपने सर्वाधिक मोहक,आकर्षक रूप में उपस्थित हो गया। सुखद चन्द्रिका तन -मन के साथ हाइकुकार की कलम को भी आह्लादित करने लगी और हाइकुकार ने अभिव्यजनाएँ  प्रस्तुत कीं –

       उतार फेंकी / बादल की पोशाक / क्वार नभ ने । डॉ.सुधा गुप्ता

         शांत निर्मल / ज्यों सज्जन का मन / क्वार – गगन । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

            झील दर्पण / सिंगार कर झाँकी / शरद लक्ष्मी । डॉ.सुधा गुप्ता 

            खिली शारदी  / चन्द्रमा की टिकुली / लगाए माथ । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

अपने सुन्दर ,मनोहारी रूप से  शीतल शारदी को पर्व के रूप में मनाए जाने की परम्परा  रही है । शरद् पूर्णिमा की चाँदनी अमृत तुल्य रस-वर्षण से विशिष्ट हो गई । पुनश्च यही सुखद एहसास मीठी-मीठी सिहरन में परिणत होता गया और हाइकु सिहर उठा  –

       धरती ने ली / शीत से फुरहरी / माँगा दोशाला । डॉ.सुधा गुप्ता

धरा ने दोशाला तो पाया किन्तु कैसा? शीत ने क्या धरती ,क्या गगन , सूरज ,चाँद, सितारे ,पवन , दिवस-रात्रि, खेत-खलिहान ,धनी-निर्धन,मेहनतकश किसान सब पर कोहरे का दोशाला डाल दिया । सूरज के तेज़ को कोहरे ने ढक उसके दर्प का दमन किया और लज्जित सूर्य जाने कहाँ जा छुपा ।गरमी का शेख़ निकला भी तो छुप-छुपकर या फिर ग्रीष्म में मिली उपेक्षा से रूठा-रूठा । चाँद दुबककर सो गया और धुंध-लिपटी धरा पथ-भ्रष्ट राजनीति- सी प्रतीत होने लगी । बर्फीली हवाएँ चाकू- सी चीर गईं ।कुछ दृश्य हाइकु में देखिए –

       दिन चढ़ा है / शीत -डरा सूरज /सोया पड़ा है । डॉ.सुधा गुप्ता

        सूरज कहाँ ? / खोजते हलकान / सुबहो- शाम । रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

       बूढ़ा मौसम / लपेटे है कम्बल / घनी  धुंध का । रामेश्वर काम्बोज हिमांशु  

          मौसम- संग / बदले अपने रंग / दम्भी सूरज । सुशीला शिवराण

            छाया कुहरा /प्रभात से है रूठा /आज रवि । डॉ.क्रान्ति कुमार

           रूठ के बैठा / बिसराकर  सुध/सूर्य है ऐंठा । गुंजन अग्रवाल

            रूठा है रवि / छुपें लोग ग्रीष्म में / अब प्यार क्यों ? ज्योतिर्मयी पन्त

            उफ्फ ये जाड़ा / सूरज भी दुबका / ओढ़ रजाई । सुभाष नीरव

            शीत -प्रकोप /डरे, छुपे रवि के /सातों ही घोड़े । डॉ.क्रान्ति कुमार

            ठिठुरी धरा /जम गईं नदियाँ /वायु -पहरा ।- गुंजन अग्रवाल

            कुहासा देख / कहाँ छिपा सूरज / गर्मी का शेख । सुशीला शिवराण

            बर्फीली ठंड / ठिठुर रहा चाँद / दुबक सोया । डॉ.रमा द्विवेदी

            चाकू चलातीं / ये पहाड़ी हवाएँ / चुभें तन में । रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

            काँपे कोहरा /जाड़ों की दुपहरी /सूर्य न आया  । डॉ.सरस्वती माथुर

            हवा उड़ाए /कोहरे की चादर /सर्दी की भोर । डॉ.सरस्वती माथुर

            बर्फ  -लिहाफ़/ ओढ़ खड़े पर्वत /संत- से लगे । डॉ.सरस्वती माथुर

            सर्द हवाएँ /करती  अट्टहास /काँपती धरा। सुनीता अग्रवाल

            शीत आतंक / हवा रूप बदले / मारती डंक । कृष्णा वर्मा 

            रातों ने ओढ़ी / कोहरे की चादर / चाँद ठिठुरा । कमला निखुर्पा

            सर्द रातों में / ओढ़ लेती है हवा / बर्फ ही बर्फ  । मंजु मिश्रा

रात्रि का मानवीकरण एवं बिम्ब-विधान (रूप और ध्वनि बिम्ब) देखिए, साथ ही सूरज की हालत लाठी टेककर चलते अशक्त बूढ़े बाबा -जैसी हो गई है-

       शीत की मारी / पेट में घुटने दे / सोई है रात । डॉ.सुधा गुप्ता

        ठिठुरी रात / किटकिटाती दाँत / कब हो प्रातः । रामेश्वर काम्बोज हिमांशु      

          लाठी टेकता / सूरज यूँ गुजरा / ज्यों बूढ़ा बाबा । डॉ.जेन्नी शबनम

             सर्प की फुफकार से दी गई उपमा कितनी सार्थक  है-

       शीत के दिनों / सर्प -सी फुफकारें /चले हवाएँ । डॉ.हरदीप सन्धु

       विजय- पताका फहराती बढ़ती जाती शीत का एकाधिकार हो गया सब ओर । क्या गाँव क्या शहर ,पथ- पगडंडियाँ ,सड़कें ,नदी,सरोवर सागर तक आक्रान्त हो गए । पग भर भी पथ दिखाई न दे ,तो कोई क्यों निकले घर से । दिन अनमना है तो  रात की नीरवता भयावहता में बदल गई । नदी-नद , झील , सरोवर जम गए । हाइकु व्याकुल है रूठी धूप को मनाए कैसे । माघ थका बोझा उठाए -उठाए –

            माघ बेचारा / कोहरे की गठरी / उठाए फिरे । डॉ.सुधा गुप्ता

            डालता चौक / आँसू भीगी पातियाँ / माघ डाकिया । डॉ.सुधा गुप्ता

            कोहरा घना / दिन है अनमना / काँपते पात । रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

            सूर्य से कुट्टी / खोल दी है धुँध ने / गुस्से में मुट्ठी । डॉ.भावना कुँअर

            धुंध का घेरा / चढ़कर सूर्य पे / खाए उजाला । डॉ. हरदीप कौर सन्धु

            धुंध ही धुंध  / बजती घंटियाँ दें / दिशा का बोध । रेखा रोहतगी

            लिपटी धुंध / भयावह लगती / जाड़े की रात । ॠता शेखर मधु

            खो गए पंछी / कोहरे के पथ में / ढूँढ़ते नीड़ । शशि पाधा

            रूठी है धूप / बादलों में छुपी / मनाऊँ कैसे ? अनुपमा त्रिपाठी

            भोर ने ओढ़ा / कोहरे का दुपट्टा / धूप नाराज़ । कृष्णा वर्मा

            नदियाँ क्लांत / ओढ़े श्वेत लिहाफ /शांत हो सोईं । कृष्णा वर्मा

            शिकारे मौन / हो गए हैं उदास /जमी झील में । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

            हिम पिघले / पहाड़ ,ठूँठ बने / राहों में खड़े । शशि पुरवार

            कम्बल ओढ़े / ठिठुरता काँपता / सूर्य झाँकता । प्रियंका गुप्ता

शीत में कोहरे ने संवेदनाओं को शून्य कर दिया तो धूप ने नैनों में सपने भी सींच दिए , हाइकु ने यादों के धागों से स्वेटर बुने । देखिए  –

          मन पाषाण / बर्फीली संवेदना / कोहरा घना । कमला निखुर्पा

            नहीं दिखता / क्यों अपना पराया / कोहरा घना । अनुपमा त्रिपाठी

            नेह गायब / ठिठुरते सम्बन्ध / हम अकेले । डॉ.शैलजा सक्सेना

            मंजिलें वही /कुहासे  ने निगले /डगर सभी । सुनीता अग्रवाल

            धूप -टुकड़ा / नैनों में सींच लिया / अंकुर फूटा । कमलेश चौरसिया

            फिर बुनूँगी / याद के धागों से / स्वेटर अनूठे । डॉ.शैलजा सक्सेना

यहीं पर कहाँ थमा जाड़े का विजय रथ ? तीखी हवाएँ  सताएँ तो सताएँ कोहरे ने दृष्टि छीन ली और तुहिन कणों ने जैसे बर्फ की पाल बिछा दी ।आबाल-वृद्ध , नर-नारी , पशु-परिंदे सब हैरान-परेशान ..कहाँ है धूप ? मिले तो चैन आए । हाइकु तो बन गया चिरैया ,सोच में डूबा कैसे लाए बच्चों के लिए दाना और कह उठा …ऐ धुंध जा ना ! संवाद की सहज अभिव्यक्ति का सौन्दर्य देखिए –

        फोड़ी किसने / कोहरे की गागर / जीना दूभर । डॉ.भावना कुँअर

           बर्फीली हवा / लो आ गई सताने / ले के बहाने । डॉ.भावना कुँअर

            दुबकी बैठी / घोंसले में गौरैया / पंख दबाए । डॉ.भावना कुँअर

            सोयी कलियाँ /सुख -भरी निंदिया/धुंध रजाई । सुनीता अग्रवाल

            सोच में बैठी / कैसे लाऊँ मैं दाना / ऐ धुंध जा ना । डॉ.भावना कुँअर

            बर्फ  की पाल/ बिछाके गया कौन / सब हैं मौन । डॉ.भावना कुँअर

       ऐसे सर्द दिनों में यदि पल भर को भी धूप दिख जाए तो तन-मन सहला जाती है लेकिन ज्यों-ज्यों सर्दी बढ़ती जाए धूप के नखरे कहे न जाएँ ,सहे न जाएँ । क्या जाने हठीली , लजीली धूप छुप के बैठी है या हार गई कोहरे से ; लेकिन हाथ नहीं आती । मन तो पूछ ही बैठता है- कहाँ हो धूप ? सर्दी की धूप की अदाओं के दिलकश नज़ारे देखिए –

       ठिठुरी धूप / मुँडेर चढ़ बैठी / बच्ची-सी ऐंठी । रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

         दौड़ लगाएँ / धूप के खरगोश / हाथ न आएँ । डॉ.भावना कुँअर

            लजीली धूप / सिमटी सिकुड़ी सी / बैठी ओसारे । डॉ.उर्मिला अग्रवाल

            हठीली धूप / भाव खाए कितना / पाकर रूप । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

            धूप आवारा / छुप करके बैठी / हाथ न आए । रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

            इन्द्रधनुष / सतरंगी झूला / झूलती धूप । शशि पाधा

            धूप सेंकती / गठियाए घुटने / वृद्धा सर्दी  के । डॉ. उर्मिला अग्रवाल

            शीत की धूप / माँ -सी लिपटकर / दे कोसा प्यार । -कृष्णा वर्मा

            देश की धूप / थपथपाए तन/ माँ का प्यार । डॉ.सुधा ओम ढींगरा

            लपेटे हुए / कोहरे की चादर / धूप सो रही । प्रियंका गुप्ता

            ठंड का हुक्म / धूप हुई घर में / नज़रबंद ।- रचना श्रीवास्तव

            दिखे न कहीं / धूप ने ली शायद / आज की छुट्टी । रचना श्रीवास्तव

            सर्द लहर / ठिठुरती है काया / कहाँ हो धूप ? अनिता ललित

            निखरी धूप /जाती हुई ज़िन्दगी /फिर  जी उठी । गुंजन अग्रवाल

            सहमी धूप / बर्फीले थपेड़ों से / हो गई फीकी ।  डॉ.अनीता कपूर 

            बंद तिजोरी / सूरज -हाथ चाबी / जाड़े की धूप । शशि पाधा

            धूप का रंग / चमकता आँखों में / सपना बन । तुहिना रंजन

       हाइकु में सर्दियों की धूप के इतने रंग खिले ,इतनी सुन्दर अभिव्यंजनाएँ हुईं कि उन्हें एक साथ उपस्थित करना ही कठिन है । यह धूप जैसे बीच-बीच में आकर जाड़े की कॉपी जाँच जाती है या रेशमी उजाले लिये आँगन में उतर आती है। धूप के  रूप कितने सारे हैं ! गुलाबी, शर्मीली, छुईमुई आदि , देखिए –

       धूप जाँचती / ॠतुओं की शाला में / जाड़े की कॉपी । पूर्णिमा वर्मन

            शर्मीली धूप / कोहरे में से छने / सिंदूरी रंग । डॉ. हरदीप कौर सन्धु

            छुईमुई-सी / चुप मिले अकेली / धूप सहेली । डॉ.हरदीप कौर सन्धु

            जाड़े की धूप / गुनगुनाए गीत / कुनकुने- से । डॉ. हरदीप कौर सन्धु

            खिली है धूप / या रेशमी उजाले / द्वार- आँगन । अनीता कपूर

            गुलाबी धूप / मोहिनी धरणी का / निखरा रूप । सुशीला शिवराण

       धूप-टुकड़ा / बच्चे -सा ठिठुरता / सर्द हवाएँ  । डॉ.अनीता कपूर

            सर्दी की धूप / शीतल तुम बिन / बर्फ  के जैसी । उमेश मोहन धवन

ऐसे में यदि बदलियाँ और आ धमकें तो जीना मुहाल । शूल चुभाती बौछारों ने समस्त धरा पर जन-जीवन को व्याकुल कर दिया , जैसे वेदना ही बरस उठी हो ,दिन भी सिहर उठा ।  धूप में गरमाहट नहीं बची । उसकी हालत बिन माँ की बच्ची जैसी हो गई-

       रोती रहती / बिन माँ की बच्ची- सी / पूस की धूप । डॉ.सुधा गुप्ता

        शीत ॠतु में / बारिश की बौछारें / चुभें शूल -सी । अनिता ललित

         माघ की वर्षा / धराशायी हो गई / चना-फसल । डॉ.सुधा गुप्ता

         सर्द जंगल   / फुफकारती हवा / माघ नागिन । नीलमेन्दु सागर

        सूर्य को ढाँपे / एक मोटा बादल / खुद भी काँपे । डॉ.कुँवर दिनेश सिंह

         दिन सिहरा / बादलों की चादर / छिड़कें बूँदें । अनिता ललित

         माघ-कटार  / निष्प्राण कर गई / फूल क्यारियाँ । डॉ.सुधा गुप्ता 

          सिहरी काँपी / बदली -सी वेदना / आज बरसी । शशि पाधा

          जाड़े की रात / खुद को पा अकेला / चाँद भी रोया । ॠता शेखर मधु

गाती बाँधना या गाती मारना चादर को ओढ़ने का एक ढंग है । डॉ. जेन्नी शबनम  ने इस शब्द के प्रयोग ने हाइकु को प्राणवन्त कर दिया है।  माघ का क्रोध भी बर्फ़बारी से होता है।यह क्रोध  डॉ. सुधा गुप्ता के हाइकु में चरम   परिणति को पहुँचता है-

       धरा ने बाँधी  / सफ़ेद नर्म गाती /  आस्माँ से माँगी । डॉ.जेन्नी शबनम

      माघ है क्रोधी / बर्फ  से नहलाई / धरती रो दी । डॉ.सुधा गुप्ता

डॉ.सुधा ओम ढींगरा का अनुभव अलग रूप में सामने आता है।अमेरिका के जिस भू-भाग में सुधा जी रहती हैं, बर्फीले तूफ़ान वहाँ आम बात हैं।हिमपात जब होता है तो धरती सफेद झख हो जाती है और हिम रुई के फाहों-सी गिरती है। अगर तापमान जमने की स्थिति से नीचे चला जाए ,तो वह बर्फ बन जाती है और सब चीज़ों को शीशे- सा ढक लेती है। तब फिसलन बहुत होती है। ये हाइकु इन्हीं दृश्यों को समर्पित हैं-

         रुई के फ़ाहे / ढाँपी प्रकृति सारी  /सर्दी का हिम ।-डॉ. सुधा ओम ढींगरा

            बर्फीली वर्षा /शीशे -सी चमका दे /सर्दी में धरा ।- डॉ. सुधा ओम ढींगरा

            हिम रुई -सा /बर्फ शीशे- सी दिखे / फिसलें ,गिरें-डॉ.सुधा ओम ढींगरा

            बर्फ़ गिरे /शीशे -जड़ी प्रकृति /छुई न जाए ।-डॉ. सुधा ओम ढींगरा

            बच्चों को भाए /रूई -सा हिम,रचें /हिम मानव। -डॉ. सुधा ओम ढींगरा

सौ पूस बीतने पर भी पूस की रात नहीं बीती । आज भी गाँव में बहुतों की यही नियति है। यह हाइकु हमारे मानस-पटल पर प्रेमचन्द की कहानी ‘पूस की रात’ की तरह कौंध जाता है-

   पूस की रात / ठिठुरती हवाएँ / दस्तक देतीं । डॉ.भगवतशरण अग्रवाल

   पूस की रात / न बीती आज तक / बीते सौ पूस । प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

       सामर्थ्यवान् के लिए सभी काल , परिस्थितियाँ अनुकूल हैं ,तो निर्धन ,असहाय को सताने में मौसम भी कोई कोताही नहीं  बरतता ।गर्म रजाई ,कम्बल ,शॉल और ब्लेज़र ,मौजो में लदे-फँदे भले ही पर्वतीय सौन्दर्य का, स्नो फाल का आनन्द लें किन्तु निर्धन को सिर पर छत और तन ढकने को कपड़े भी नहीं , उनका क्या ? न मज़दूरी ,न खाने की व्यवस्था । पाले ने फसलें मार दीं । वृद्ध और बीमारों की दशा ही न पूछिए । उस पर सर्दियों के छोटे-से दिन और लम्बी-लम्बी रातें ,खुद जाड़ा हैरान-परेशान कि आखिर कटें तो कटें कैसे रातें ? हाइकु रो उठा –

   पड़ा है पाला / फसलें बेरौनक / चिन्ता गहरी । रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

       कैसे हैं भाग / तन शीत जकड़े / उदर आग । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

         रात काँपती / रजाई में दुबकी / भोर ठिठकी । डॉ.जेन्नी शबनम

            जाड़े में रंक / फुटपाथ पे सोया / चुप से रोया । ॠता शेखर मधु

    पाँव अकड़े / घुटने भी जकड़े / शीत डराए । रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

    काँपता भोला / सिमटती बुधिया / शीत- लहर । भावना सक्सेना

        इतनी सर्दी ! / कोहरे की बेदर्दी / झेलें गरीब । सुभाष लखेड़ा

            हुआ लाचार / तन-मन पे भारी / चिल्ले की मार ।डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

      टूटा छप्पर / कम्बल न रजाई / निर्धन कुटी । भावना सक्सेना

       उखड़ी साँस / आफत का मारा -सा / घूमे शिशिर । डॉ.शैलजा सक्सेना

    कैसे कटेगी / रात फुटपाथ पे / सोचता जाड़ा । डॉ.शैलजा सक्सेना

            छोटे- से दिन / पलक छूमंतर / बीते न रात । शशि पाधा

       कोहरा छाए / भूली -बिसरी बातें / याद दिलाए । सुभाष लखेड़ा

संवेदना की पराकाष्ठा यहाँ देखिए  –

       खटका द्वार / थरथराता पिल्ला / माँगता ताप । पुष्पा मेहरा

            पक्की सड़क / काँपता तन-मन / भूखा बछड़ा । अरुण सिंह रूहेला 

       प्रकृति में कुछ भी ऐसा नहीं जो नितांत दुखदायी या बुरा हो । काँपते गात और धुंध- भरी रात के साथ शीत का सौन्दर्य भी अनुपम है।धीमे-धीमे रुई- सा झरता हिम घाटी की गोद में उतरते बच्चे- सा प्रतीत होता है । हिमाच्छादित पर्वत-शिखर सैलानियों का मन मोह लेते हैं ,तो वनस्पतियों पर टँगे तुहिन-कण मोतियों की शोभा धारण कर लेते हैं । लुकता-छिपता सूरज मानो कोहरे का परदा हटाकर झाँक रहा है और किरनें आँख -मिचौली खेल रहीं प्रतीत होती है।

       पौष की भोर / हरे शनील पर / बिखरे मोती  । डॉ.सुधा गुप्ता

       हिम उतरा / ठुमक-ठुमक के / घाटी की गोद । कृष्णा वर्मा

        श्वेत पंखुरी / रूई -सा झरे हिम / पूजे धरा को । ज्योतिर्मयी पन्त

      चूमें तुषार / कोमल कुसुमों के / नर्म कपोल । कृष्णा वर्मा

            सरकाकर / कोहरे का परदा / झाँके सूरज । रचना श्रीवास्तव

        सूरज ओट / छिप गईं किरनें / आँख-मिचौली । शशि पाधा

        सर्दी की धूप / शरमाकर झाँकती / छिप-छिपके । अनिता ललित

        नभ से गिरी / पुष्प के होंठ छूने / बिंदास ओस । ज्योत्स्ना प्रदीप

       ओस की रात /मोती सम चमके / वृक्ष ,पत्तियाँ । शान्ति पुरोहित

     सर्दी की भोर / सहमी शरमाई / नव वधू-सी । मंजु मिश्रा

     पर्वत श्रेणी / धारे हैं हिम टोप / खेलें धुंध से । पुष्पा मेहरा

आँख मूँदकर धूप-स्नान करने वाले पक्षियों पर जाकर जब सुधा गुप्ता जी का कैमरा रुकता है ,तो क्या पाता है, देखिए –

            धूप -जल में / आँखें मूँद नहाते / ठिठुरे पंछी । डॉ.सुधा गुप्ता

नवान्न से परिपूर्ण माघ का सौन्दर्य डॉ.सुधा गुप्ता जी के हाइकु में देखिए –

      माघ महिमा / शिल्पी तराश रहा / नव्य प्रतिमा । डॉ.सुधा गुप्ता

      माघ की माया / नवान्न से भर दी / खेतों की काया । डॉ.सुधा गुप्ता

     पसर गई /सरसों फूली शय्या / माघ की धूप । डॉ.भगवतशरण अग्रवाल

        माघ हरषा / हरे शाक-पत्र की / कर दी वर्षा । डॉ.सुधा गुप्ता

            माघ आह्लाद / ताजा गुड़ की गंध / गाँव आबाद । डॉ.सुधा गुप्ता

        माघ की छटा / नाच रहीं फसलें / घूँघट उठा । डॉ.सुधा गुप्ता

सम्यक् स्वभाव के साथ उपस्थित माघ स्वयं में एक आह्लादकारी उत्सव का आयोजन है । सुखद सुहानी धूप अनुरंजन करती है । लोहड़ी ,मकर संक्रांति तथा संकट चतुर्थी आदि त्योहारों की धूम कई दिन पहले से गूँज उठती है । तिलकुट, रेवड़ी , मक्का की फुलियों की गंध हवाओं को महका देती है ,तो नील गगन रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है। कई स्थानों पर पतंग-उत्सव का आयोजन होता है ।

       माघ तरुण / ले मटर दुल्हिन / आया है घर । डॉ.सुधा गुप्ता

        पीली साड़ी में / माघ मेला घूमेगी / लाडो सरसों । डॉ.सुधा गुप्ता

            ठिठुरन में / सुख दे गई खूब / पूस की धूप । डॉ.सतीशराज पुष्करणा

         माघ-अम्बर / उड़ी फिरें पतंगें / भरें उमंगें । डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा

         तिल की बर्फी / तिलकुट सम्भार / माघ त्योहार । डॉ.सुधा गुप्ता

सर्दी की बात हो और कलयुगी अमृत चाय का ज़िक्र न हो ,तो सब अधूरा है । निर्धन  हो या धनी  सबके लिए  सचमुच जीवन रस है चाय । हिन्दी  हाइकु ने भी खूब मान दिया चाय को –

       चाय की प्याली / मीत बनी सबकी / इठला रही । रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

            करती रही / धूप से गपशप / चाय की प्याली । डॉ.सुधा गुप्ता

            ठिठुरा तन / एक प्याली चाय से / तृप्त है मन । ॠता शेखर मधु

            शीत लहर / अदरक की चाय / गरम चुस्की । शशि पुरवार

            हाथ में चाय / ओढ़ कम्बल , टोपी / बुढ़ापा बैठा । देवी नागरानी

और भी आनन्द हैं शीत के । हिमाच्छादित शिखर विकट परिस्थिति में भी दृढ़ रहने का सन्देश देते हैं । सर्द रातों में अलाव जलाए देर रात तक बतियाना , अपनों के साथ बैठना ,हाथ सेंकना  मन को, रिश्तों को भी एक ऊर्जा प्रदान करता है । सुन्दर बिम्ब देखिए –

   खुश अलाव / सुनता रात भर / कथा कहानी । रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

    हँसी-ठहाके / कभी बिसरी यादें / आँखों में पानी । रामेश्वर काम्बोज हिमांशु 

            सीना तान के / बर्फ  ओढ़के खड़ा / मौन शिखर । देवी नागरानी

यूँ ही श्वेत-श्याम चित्र  उपस्थित करता हिन्दी  हाइकु में शीत ॠतु का वर्णन बहुत सजीव एवं  मनोहर  है । वस्तुतः क्षण के काव्य ने शीत के पल-पल की कथा कही तभी तो शीत के दोनों पक्षों को प्रस्तुत करता डॉ.जेन्नी शबनम जी का हाइकु कह उठा  –

       शैतान जाड़ा / सबको है रुलाए / फिर भी भाए ।

-0-

डॉ ज्योत्स्ना शर्मा ,

टावर एच-604, प्रमुख हिल्स , छरवडा रोड ,

वापी , जिला , वलसाड  (गुजरात) -396191

 

 

Advertisements

Responses

  1. डा०ज्योत्स्ना शर्मा का हाइकु की व्यापकता और शक्ति को दर्शाता ,गहन अध्ययन और मंथन के बाद लिखा लेख ” हिन्दी -हाइकु में शीत ॠतु वर्णन ” पढ़ कर जो आनंद मिला, उसको व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द तो नहीं हैं किन्तु मैं इतना जरूर कहना चाहूँगा कि इस लेख को लिखने के लिए उन्होंने चिंतन – मनन और फिर ” सार – सार को गही………. ” का अनुकरण करते हुए जो प्रयत्न किया, वह उनकी पारखी दृष्टि का परिचायक है। डा०ज्योत्स्ना शर्मा आपको हार्दिक बधाई और शुभकामनायें !

  2. डॉ ज्योत्स्ना जी को बहुत बहुत बधाई शीत ऋतु पर इतना अच्छा लेख और हाइकु से रूबरू हुए।

  3. सटीक/सुंदर लेख
    हाइकु इठ लाते
    धूम मचाते

    बहुत बहुत बधाई !ज्योत्स्ना जी

    सादर
    रेखा रोहतगी

  4. सुंदर लेख, बहुत बहुत बधाई !ज्योत्स्ना जी

  5. हमारे हाइकु को इस लेख में शामिल करने योग्य समझा …आभारी हूँ

  6. शीत के विविध रूपों में गढ़े हाइकुओं से मढ़ा बेहद ख़ूबसूरत लेख पढ़ कर मन गद्गद हो गया। इस अनुपम प्रयास के लिए डा० ज्योत्स्ना जी आपको बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।

  7. कितने सारे जाड़े के हाइकु … चले आए साथ साथ …एक से बढ़कर एक …चमकीले मोती से … बर्फीली ठिठुरन के साथ… कितने सारे चित्रों को थामे .. … चले आए साथ साथ ..

    जमा था मन …हाइकु की धूप पा पिघल-पिघल गया|
    बधाई .. ज्योत्स्ना जी

    सादर

    कमला निखुर्पा

  8. हाईकु में शीत ऋुतु पर ज्योत्स्ना जी ने सुंदर आलेख लिखा है ,उन्हें साधुवाद । सच कहूँ तो यह एक साहित्यक निबन्ध है जो पढ़ने वालों के सामने एक सुंदर दृश्य उकेर देता है!
    वैसे भी शीत ऋुतु बहुत मनभावन ऋतु होती है! सुंदर अभिव्यंजनाओं व बिबों के माध्यम से लिखे हाईकुओं का चयन भी तारीफ के क़ाबिल है ।
    मेरे हाइकुओं को भी आलेख में आपने स्थान दिया उसके लिए तहे दिल से आपका और संपादक द्य का आभार !
    स्नेही हरदीप जी व कंबोज भाई को भी बहुत बहुत बधाई व शुभकामनायें !
    नववर्ष की भी हाइकु परिवार के सभी सदस्यो को शुभकामनायें !

  9. nana bimbpradhan hiku ko darshate hue sheet ritu par likha gaya lekh bahut sunder likha hai. jyotsana ji apko badhai.
    pushpa mehra.

  10. मेरी अभिव्यक्ति को आपका स्नेह मिला ,हृदय से आभार आप सभी का !आपकी प्रेरक प्रतिक्रियाएँ मेरे लेखन की ऊर्जा हैं !
    समस्त हिन्दी हाइकु परिवार को नए वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएँ !

  11. bahut bahut saadhuvaad jyotsnaji…sheet ritu par aap ka lekh naman yogy hai …sunder,saarthak tatha aapke gahan addhyan ko darshata hai…karbaddhnaman ke saath -saath badhai.

  12. दिल से शुक्रिया ज्योत्स्ना प्रदीप जी !
    सखि !
    चाह हमारी
    स्नेह भरी बतियाँ
    सदा आपसे !! … 🙂

    ज्योत्स्ना शर्मा

  13. बहुत सार्थक और सटीक आलेख है…| बधाई ज्योत्सना जी..|


रचनाओं से सम्बन्धित आपकी सार्थक टिप्पणियों का स्वागत है । ब्लॉग के विषय में कोई जानकारी या सूचना देने या प्राप्त करने के लिए टिप्पणी के स्थान पर पोस्ट न करके इनमें से किसी भी पते पर मेल कर सकते हैं- hindihaiku@ gmail.com अथवा rdkamboj49@gmail.com.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

श्रेणी

%d bloggers like this: