Posted by: डॉ. हरदीप संधु | नवम्बर 22, 2014

सफ़र के छाले और मौसम के रंग


सफ़र के छाले और मौसम के रंग

           १-सफ़र के छाले हैं ‘हाइबन’ जापानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है- (हाइ-काव्य ,बन- गद्य )। इस प्रकार  हाइबन गद्य तथा काव्य का संयोजन  है।  17  वीं शताब्दी के कवि बाशो ने इस विधा का आरंभ 1690 में अपने एक शिष्य क्योराइ को खत में सफरनामा /डायरी के रूप में ‘भूतों वाली झोंपड़ी’ लिख कर किया। इस खत के अंत में एक हाइकु लिखा गया था।

     परम्परागत रूप  में हाइबन एक सफरनामे या डायरी के रूप में लिखा जाता था । यात्रा करने के बाद बौद्ध भिक्षु पूरी दिनचर्या को वार्ता के रूप में लिख लेता था और अंत में एक हाइकु भी।  हाइबन में एक से ज्यादा हाइकु हो सकते हैं। हाइकु वार्ता से जुड़ा हुआ हो ,मगर इसका दोहराव न करे और न ही इसको परिभाषित  करता हो। अंत में हाइकु लिखने का उद्देश्य  वार्ता को और विशालता प्रदान करना ही होता है। हाइबन किसी लेख या कहानी से हटकर एक विशेष सर्जनात्मक कृति है, जिसे अंतर्मन की यात्रा भी कहा  जा सकता है ;क्योंकि  यह तो जिंदगी के पल -पल के अहसासों में से गुज़रती है ,जिसमें दुःख -सुख , हर्ष-विषाद , शारीरिक तथा बौद्धिक अनुभव शामिल हैं। हाइबन में यात्रा  वर्णन ,व्यक्ति रेखा चित्र /( ये  हिन्दी  में भी हैं),प्राकृतिक दृश्य ,किस्सा – कथा का शब्दांकन ,किसी विशेष व्यक्ति या घटना पर लेखन, दिन प्रतिदिन की दिन-चर्या की डायरी शामिल है । स्वप्न या फ़न्तासी भी इसकी विषयवस्तु बन सकते हैं।परम्परागत हाइबन किसी व्यक्ति , स्थान , वस्तु का वर्णन  या यात्रा डायरी  या कवि के जीवन में घटने वाली घटनाओं की कड़ियाँ ( धारावाहिक रूप से) भी हो सकता है हाइबन की वार्ता सरल, मनोरंजक  तथा बिम्बात्मक होती है। इस में आत्मकथा, लेख ,लघु कथात्मक  प्रसंग  या यात्रा का ज़िक्र आ सकता है। हिन्दी पाठकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी लघुकथा, प्रेरक प्रसंग  या दृष्टान्त  में हाइकु जोड़ देना हाइबन नहीं है।विषयवस्तु की व्यापकता का यह अर्थ भी कदापि नहीं कि बेतुकी घटना पर ही हाइकु चस्पाँ कर दिया जाए।

    हाइबन एक स्पष्ट हाइकाई विधा है ,जो लघु गद्य कविता होती है जिस में हास्यरस तथा संजीदगी दोनों अंश होते हैं। संजीदगी से तात्पर्य यहाँ यह नहीं है कि दार्शनिक चिन्तन के भार से दबी टिप्पणी  प्रस्तुत की जाए। हाइबन आम तौर पर हाइकु से खत्म होता है; जिसमें 100 से लेकर 300 शब्द हो सकते हैं।शब्द सीमा से तात्पर्य यह है कि अनावश्यक शब्द या वाक्यों का समावेश कतई न हो । हाइबन आत्मकथात्मक शैली में ही लिखा जाए ,वर्त्तमान घटना  ही  हो  , यह ज़रूरी नहीं। हाइबन में एक या दो अनुच्छेद  हो सकते हैं । विषयानुसार एक या एकाधिक  हाइकु  आ सकते हैं। यहाँ  यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि हाइबन में प्रस्तुत गद्य हाइकु की व्याख्या नहीं होता।भाषा पूरी तरह सधी हुई होनी चाहिए । अनावश्यक शब्दावली न हो । लम्बे हाइबन में एक से ज्यादा हाइकु वार्ता के टुकड़ों में रखे जा सकते हैं।ये हाइकु 

1- गद्य में आई विषयवस्तु या सन्देश को सत्त्व रूप में प्रस्तुत करें,लेकिन बिना किसी पूर्वकथन के, बिना  दोहराव के। हाइबन में प्रयुक्त हाइकु इसके कथ्य से सीधे या सूक्ष्म /अतिसूक्ष्म रूप में जुड़ा हो सकता है या प्रस्तुत गद्य का संकेतमात्र भी हो सकता है तथा कभी विरोधाभासी कथन भी लिये  हो सकता है

2- हाइबन में वार्ता / कथ्य का तथा हाइकु का सम्बन्ध ज़रूरी नहीं कि स्पष्ट नजर आ रहा हो।यह हाइकु पाठक को सांकेतिक रूप से उस अकथित  को भी अभिव्यक्त करने की दिशा में ले जा सकता है ,जो हाइबन के कथ्य का  वास्तविक निहितार्थ  है अर्थात् हाइकु दृष्टिकोण  को और गहरा या उसको अलग दिशा भी  प्रदान कर सकता है। ये हाइकु अपने स्वतन्त्र  सत्ता और अर्थ लिये भी हो सकते हैं और हाइबन के कथ्य से पूर्णतया सन्दर्भित भी हो सकते हैं।

सारांश रूप में कहा जाए तो हाइबन नगीने जड़ी अभिमन्त्रित अँगूठी की तरह है। नगीने के बिना अकेली अँगूठी का मूल्य बहुत कम है और अँगूठी के बिना नगीना अँगुली में  पहना नहीं जा सकता ।दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं, समान महत्त्व के भागीदार हैं।

     हिन्दी में हाइबन की कोई परम्परा नहीं । डॉ सुधा गुप्ता जी ने 1980 में पहला हाइबन लिखा । इधर के वर्षों में डॉ हरदीप सन्धु, कमला निखुर्पा , डॉ ज्योत्स्ना शर्मा ,मीनाक्षी धन्वन्तरि और रचना श्रीवास्तव ने सार्थक हाइबन लिखे हैं। डॉ सुधा गुप्ता जी ने 1980 के बाद यदा-कदा जो लेखन आपने किया ,वह डायरी के पन्नों तक सीमित था। मैंने जब चर्चा की तो आपने  अभी तक लिखे हाइबन मुझे भेज दिये। आपके इन हाइबन में जीवन-जगत् का मार्मिक चित्रण,यात्रासंस्मरण के साथ उनका आत्मिक जुड़ाव,मानस-सिन्धु में उठते-गिरते ज्वार भाटे  की उपस्थित , प्रकृति का अनूठा दृश्यांकन-पक्षिगण से लेकर विभिन्न पेड़ पौधों तक उनके हाइबन का कैमरा घूम गया । वातावरण पर आपकी सूक्ष्म दृष्टि देखते ही बनती है।

     इनके हाइबन कर्मयोगी में धूप कातता सूरज, संगदिल मौसम के हाथों मार खाए खेत , पोशाक-की मासूम फ़ाख्ता तड़ातड़ बारिश में अपने लिए सुरक्षित जगह तलाश नहीं कर पाई, भीगती रही।पंछी के पास तो एक पोशाक है-गीली या सूखी ।  बया में जुगनू से घर को रौशन करती बया का उद्यम धूप विभिन्न गतिविधियों से गुलज़ार घरआँगन , काली चिड़िया- का हाइबन बहुत प्रभावी है और हाइकु तो कीमती नगीना-आई चिरैया/टहनी मुस्कुरा दी / उड़ी, उदास।, चैत-फूलों का संसार जो अब निषिद्ध बनकर रह गया , 3-9 मार्च-2011 में रुग्णावस्था पर लिखा हाइबन,व्यक्तिगत सुख-दु:ख  के अँधेरेउजाले ; जिनमें-नीम अँधेरा- में डायरी के फड़फड़ाते पन्ने उदासी घोल जाते हैं। अर्चिका का आचमन (लपके शोले  /कपास की कुटिया / राख की ढेरी।) में निहित सन्ताप और पीड़ा मन  को  मथ देती है

 सफ़र के छाले-जीवन की संघर्ष कथा कह जाते हैं-ये लफ़्ज़ नहीं/ सफ़र के छाले हैं/ दर्द रिसाले।

  खाली सराय व्यस्तता भरा जीवन जब घोर एकान्त की भेंट चढ़ जाता है तब अवसाद और अधिक जकड़ लेता है । लगता है कोई काफ़िला बेरहम पैरों से रौंदता हुआ आगे बढ़ गया । पाथर पाँख-उच्चकोटि का हाइबन है। पत्थर के पंख बाँधकर भला कौन उड़ पाया है ; जीवन-सागर पार करना तो दूर की बात है।नींद में अनिद्रा की उलझन सबसे बड़ी है- नींद से दोस्ती / कभी फूली न फली/ दुश्मनी रही।

    ये सब दृश्य चित्रण झकझोर कर रख देते हैं तो कभी पाठक को अश्रु-विगलित कर देते हैं। बाह्य प्रकृति के सन्दर्भ में साहित्यकार की निजी अनुभूति का उल्लसित स्वरमहकी सुबह में एवं करुण संवेदना  पुकार और दु:ख चीता है में उभरकर आया है। यात्रा पर आधारित हाइबन यात्रा के उल्लास  नैनीताल( ओक शेड होटल के परिवेश का चित्रण) /कुमायूँ (लोककथाओं में वर्णित  काफल पाको की करुण आवाज़, फ्योंली के फूल की अन्तर्वेदना के साथ नींद में पुकारते पाइन  वृक्ष  ) इनकी यात्रा में मुखर हुए हैं तो  गहन  उदासी खण्डहर मे अनुगूँज बनकर रह जाती है।क्या यह किसी और खण्डहर की दारुण स्थिति हो सकती  है! सांकेतिक रूप से लेखिका ने अभिव्यक्त कर दिया । पाठक वहाँ पहुँचकर उदासी से भर उठता है ।दु:ख चीता की एक छलांग  और हिरनी का अन्त , इस व्याज से सारा सांसारिक दु:ख व्यक्त कर दिया है ।

    इस पुस्तक का दूसरा खण्ड है मौसम बहुरंगी ।इन हाइकु को पढ़कर यही कहा जा सकता है कि डॉ सुधा गुप्ता और प्रकृति पर केन्द्रित इनके हाइकु एक दूसरे के पर्याय हैं। इनका प्रकृति के प्रति अकुण्ठ प्रेम , सूक्ष्म पर्यवेक्षण  ॠतुओं के हर स्पन्दन को वाणी देता है । मौसम के सभी  चित्र बहुत गहरे एवं अनुभूति से सम्पृक्त हैं।इनकी अभिव्यक्ति की सहजता मन मोह लेती है। इनके लिए किसी व्याख्या की आवश्यकता नहीं। हैं।विभिन्न ॠतुओं को चित्रित करते कतिपय उदाहरण द्रष्टव्य हैं

1-जागी जो कली /रामराम सहेली/धूप से बोली ।

2-नीले घाघरे/घटाओं की छोरियाँ/इतरा रहीं।

3-सागर रोया/दहाड़ें मारमार/मेघों ने लूटा

4-यादों के मेघ :/सागर ढो लाए हैं/काले कहार ।

5-आया चल के/डगमग सवेरा/हारा अँधेरा।

6-मेघों के छौने/कुदकड़ी भरते/नभवन में ।

7-मेघों की पीर :/दिखाएँ दिल चीर/आगलकीर ।

8-चाँद जो आया/बल्लियों उछला है/झील का दिल

9-सूरज घूरे/ठिठकी खड़ी हवा/हिले न डोले ।

10-शरद ॠतु  /अलख निरंजन। गाते खंजन ।

11-शीत की मारी/ पेट में घुटने दे /सोई है रात

12-नई तैनाती  / कोहरा कोतवाल/क़हर ढाया!

13-आक्रान्ता शीत/आया नया पैग़ाम/।हो क़त्लेआम ।

14-झील जमी है/शिकारे सहमेसे/खड़े हैं मौन ।

15-बर्फ़ की मार/ठिठुरे हैं पहाड़/काँपते हाड़!

    ये हाइकु हिन्दी हाइकु के ही नही, हिन्दी काव्य जगत् की अमूल्य निधि हैं।जीवन के सफ़र में छाले हैं तो नित्य-नूतन बदलते मौसम भी हैं ।

जीवन के सफर में छाले हैं, तो नित्य-नूतन बदलते मौसम भी हैं। सफ़र के

छाले हैं संग्रह के माध्यम से हिन्दी में हाइबन पहली बार पुस्तक-रूप में सामने आए हैं। हिंदी हाइकु जगत में डॉ. सुधा गुप्ता का प्रदेय न केवल परिमाण की दृष्टि से प्रचुर मात्रा में है, वरन् सर्वाधिक नवीन प्रयोग करने वाली एक अकेली हाइकुकार हैं; उन्होंने हाइकु-कविता में बारहमासा, षड्ऋतु वर्णन, प्रहेलिका काव्य, यात्रा काव्य, सेन्र्यू, हाइकु कविता, हाइकु गीत,

ताँका, चोका एवं हाइबन रचनाओं के द्वारा समृद्ध तथा नवीनता प्रदान की है।

मेरा विश्वास है कि सहृदय पाठक इस संग्रह को ज़रूर सराहेंगे।

सफ़र के छाले हैं ( हाइबन -हाइकु  संग्रह-डॉ सुधा गुप्ता ,मूल्य 220 रुपये; संस्करण 2014, पृष्ठ;112,अयन प्रकाशन , नई दिल्ली-110030

-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

25 सितम्बर, 2014

 

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Responses

  1. ज्ञानवर्धक सार्थक पोस्ट, आ. सुधा दीदी और काम्बोज भाईसाहब को हार्दिक बधाई

    2014-11-21 22:40 GMT+05:30 “हिन्दी हाइकु(HINDI HAIKU)-‘हाइकु कविताओं की वेब

  2. विविध अनुभूतियों ,भावों को साकार करती आदरणीया डॉ. सुधा गुप्ता दीदी की पुस्तक यदि अनुपम रस गागर है तो आदरणीय भाई कम्बोज जी द्वारा प्रस्तुत पुस्तक की सुन्दर समीक्षा उसकी एक मोहक झलक है | हाइबन पर प्रकाश डालते हुए रुचिर उद्धरण प्रस्तुत कर लेखक ने सहृदय पाठकों की पुस्तक के प्रति जिज्ञासा को और अधिक बढ़ा दिया है |
    इतनी सुन्दर प्रस्तुति के लिए आदरणीया सुधा दीदी तथा काम्बोज भाई जी के प्रति हृदय से बधाई ..सादर नमन के साथ
    ज्योत्स्ना शर्मा

  3. Meri hardik badhai….

  4. आदरणीय सुधा दीदी को हार्दिक बधाई

  5. हिंदी में हाइबन के इस महत्वपूर्ण संग्रह का स्वागत है ! डॉ. सुधा गुप्ता जी हार्दिक बधाई एवं साधुवाद!! सुन्दर सारगर्भित परिचय एवं सूक्ष्म समीक्षा के लिए श्री काम्बोज जी को भी बधाई!!! डॉ. कुंवर दिनेश, शिमला

  6. परम प्रिय सुधा जी की रचनाओं के बारे में क्या लिखूँ ? शब्द ही नहीं मिलते ….सुधा जी हार्दिक बधाई व आपकी लेखनी को नमन !
    भाई कम्बोज जी द्वारा प्रस्तुत पुस्तक की सुन्दर समीक्षा पढ्ना अपने आप में एक अनुभव है …लाजवाब ज्ञानवर्धक समीक्षा के लिए बहुत बहुत बधाई और आभार सच में यह हिन्दी काव्य –जगत् की अमूल्य निधि हैं!
    ‘सफ़र के छाले’-जीवन की संघर्ष कथा कह जाते हैं-‘ये लफ़्ज़ नहीं/ सफ़र के छाले हैं/ दर्द –रिसाले।’…..वाह वाह ….पुन : आपको बधाई स्नेही कंबोज भाई !
    डॉ सरस्वती माथुर

  7. ‘safar ke chhale hain’ ki sameexa ke madhhyam se gyat hua ki sudha didi ka hriday sarovar prakriti ke keval vahya roop ko hi nahin sanjota apitu usamen atmleen ho jata hai.vo to prakriti ke har roop , har bhaw ka sajeev -sajag roop niharta hai.didi dvara rache sangrah ko gahan va kavyatmak sameexa ke madhyam se prakash mein lane hetu kamboj bhai ji ko ,unaki lekhani ko naman . sudha didi ki anupam bhavgamyata va abhivyakti ko
    naman.
    pushpa mehra.

  8. अति सुन्दर प्रस्तुति। आदरणीया डा० सुधा गुप्ता जी के बेजोड़ लेखन तथा हिमांशु भाईसाहब द्वारा प्रस्तुत लाजवाब समीक्षा के लिए हार्दिक बधाई।

  9. हार्दिक बधाई सुधा जी, हाइबन से परिचित करानें के लिये|

  10. सुन्दर समीक्षा के लिए आदरणीय भाई कम्बोज
    हार्दिक बधाई

  11. साहित्य जगत को नवीनतम आयाम से समृद्ध करने के लिए आदरणीय डॉ सुधा गुप्ता जी एवं आदरणीय हिमांशु जी द्वारा विश्लेषणात्मक अनुपम समीक्षा लिखना अत्यंत स्तुत्य है ,,,महती कार्य के लिए दोनों को बहुत -बहुत बधाई व शुभकामनाएँ

  12. सुधा जी के एक एक शब्दों पर पी एच डी की जा सकती है कमल की अभिव्यक्ति होती है आपके लेखन में .आपको जब भी पढ़ती हूँ आपको नमन करती हूँ और खुद को सौभाग्यशाली समझती हूँ की मुझे आपका लिखा पढ़ने को मिल रहा है .भगवन आपको लम्बी ज़िन्दगी दे .
    भैया आपका धन्यवाद की आपने इतने सुन्दर तरीके से हाइबन को समझाया है और इतनी उत्तम समीक्षा लिखी .
    हमें अपना आशीर्वाद देने के लिए आपदोनो का आभार
    सादर
    रचना

  13. बहुत दिनों से हिन्‍दी हाइकु पर आने का समय नहीं मिल पा रहा था। आज अभीजाे पढा तो लगा कि मैं कितना कुछ खो रही हूँ ।सरस्‍वती दी के साथ मैं पूर्णत सहमत हूँं कि —–भाई कम्बोज जी द्वारा प्रस्तुत पुस्तक की सुन्दर समीक्षा पढ्ना अपने आप में एक अनुभव है …लाजवाब ज्ञानवर्धक समीक्षा के लिए बहुत बहुत बधाई और आभार सच में यह हिन्दी काव्य –जगत् की अमूल्य निधि हैं।
    रचना जी आपकी बात भी बहुत उचित है कि————-सुधा जी के एक एक शब्दों पर पी एच डी की जा सकती है।
    जागी जो कली /‘राम–राम सहेली’/धूप से बोली । कमाल की अभिव्‍यक्ति एक एक हाइकु जडे हीरे जवाहरात सा है।

    सुधा दी आप को नमन और हार्दिक बधाई।

  14. सुधा दीदी कों बहुत सारी शुभकामनाएं |

  15. अप्रतिम…!
    आदरणीय सुधा जी की कलम मानो पाठक को मंत्रमुग्ध कर जाती है…| उतना ही सम्मोहित करने वाली यह समीक्षा भी है, आदरणीय काम्बोज जी की…| `गागर में सागर’ की तरह न केवल हम एक सार्थक समीक्षा पढ़ रहे होते हैं, बल्कि एक नई-अनजानी सी विधा को भी अपने अन्दर आत्मसात करते जाते हैं…|
    सुधा जी को हार्दिक बधाई और काम्बोज जी का आभार…इतनी सारगर्भित जानकारी देने के लिए…|


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