Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 7, 2014

ॠतु है रसवन्ती


1-नलिनीकान्त

1

मचल रहा

व्योम में मृगछौना

इन्द्रधनुष ।

-0-

2- नीलमेन्दु सागर

1

सर्द जंगल

फुफकाराती हवा

माघ नागिन ।

2

झूले पवन

ॠतु है रसवन्ती

जागे मदन ।

-0-

3- कमला निखुर्पा

1

नेह की डोर

बँधी चली आई मैं

तुम्हारी ओर ।

-0-

4-अनुपमा त्रिपाठी

1

लावण्यमयी

गहराती – सी साँझ

स्वप्निल मन !!

2

मोम पिघला

बहता चला गया ,

लौ जली रही !!

2

मोम के जैसे

पिघलो और बहो

लौ जली रहे ।

3

ये पारिजात

फिर लाया सौगात

महके मन ।

4

झर -झर के

बिखरा उपवन

खिलता मन ।

5

शीतल हवा

शिशिर का स्वागत

स्पर्श कोमल

-0-

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Responses

  1. मोहक बिम्ब लिए बहुत सरस ,सुन्दर हाइकु हैं सभी हाइकुकारों को बहुत बधाई ..सादर नमन !

  2. मचल रहा
    व्योम में मृगछौना
    इन्द्रधनुष ।

    वाह ! कितना मोहक रूपक है ! बधाई नलिनीकान्त जी ।

    नेह की डोर
    बँधी चली आई मैं
    तुम्हारी ओर ।

    सहज, सरस हाइकु । बधाई कमला निखुर्पा जी।

    ये पारिजात
    फिर लाया सौगात
    महके मन ।

    सुंदर सृजन के लिए बधाई अनुपमा जी !

  3. मचल रहा…नेह की डोर….झर-जर के—–मनमोहक हाइकु ।
    आप सभी को बधाई ।

  4. AAP SABHI HAIKU MAN KO CHOO GAYE…..BADHAI AAP SABHI KO .

  5. सभी हाइकु बहुत सुन्दर है.
    सर्द जंगल
    फुफकारती हवा
    माघ नागिन
    माघ महीने की सर्दी का यथार्थ चित्रण हुआ है.रूपक और मानवीकरण अलंकारों का सुन्दर प्रयोग दर्शनीय है.


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