Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अक्टूबर 4, 2014

डॉ० सुधा गुप्ता और उनके प्रकृतिपरक हाइकु


4-प्रकृति -हाइकुडॉ० सुधा गुप्ता और उनके प्रकृतिपरक हाइकु

डॉ० सतीशराज पुष्करणा

जापान का हाइकु पहले आध्यात्मिक एवं प्रेम विषयों पर केन्द्रित रहा और बाद में वह प्रकृतिपरक हो गया। भारत में जब हाइकु आया तो प्रकृति को साथ लेकर ही आया किन्तु;शनैः! शनैः! हाइकु प्रकृति मात्र पर ही केन्द्रित न होकर समसामियकता से भी जुड़ गया। हिन्दी के प्रारंभिक हाइकुकारों ने अपने हाइकुओं में अधिकतर प्रकृति को ही अपनी अभिव्यक्ति का केन्द्र बनाया। वैसे प्रारंभिक कवि-कवयित्रियों में डॉ० सुधा गुप्ता पांक्तेय हैं।

        उनके पांक्तेय होने का पता इसी बात से चल जाता है कि अब तक उनके हाइकु संग्रह क्रमशः खुशबू का सफर,लकड़ी का सपना, तरुदेवता, पारखी पुरोहित, कूकी जो पिकी,चाँदी के अरघे में, धूप से गपशप, बाबुना जो आएगी, आ बैठी गीतपरी, अकेला था समय, चुलबुली रात ने, पानी माँगता देश,कोरी माटी के दीये और खोई हरी टेकरी तेरह हाइकु-संग्रह प्रकाश में आ चुके हैं। इसके अतिरिक्त इनके संपादन में सवेरों की दस्तक एवं हिन्दी हाइकु प्रकृति काव्य-कोश हाइकु विधा को विकास देती अतिमहत्त्वपूर्ण पुस्तक से प्रकाश में आकर पर्याप्त ख्याति अर्जित कर चुकी हैं।

        डॉ० सुधा गुप्ता स्वभाव से ही प्रकृति -प्रेमी रही हैं अतः अपने घर में लगे पेड़-पौधें से उन्हें सुबह-शाम मौन संवाद करते देखा जा सकता है। वस्तुतः वह मौन संवाद उनके हाइकुओं में मुखर हुआ है। जी हा!! उनके हाइकु बोलते हैं अपने पाठकों से संवाद करते प्रतीत होते हैं। यही कारण है उनके हाइकु पढ़ते ही हृदय में जा उतरते हैं और स्थायी-स्थान बना लेते हैं।

        डॉ० सुधा ने काव्य की अन्य तमाम विधाओं में भी अपनी सुखद उपस्थिति दर्ज कराई है ;अतः वे खूब जानती एवं समझती हैं कि कवित्व क्या होता है? उनके हाइकुओं में कवित्व बोलता है। उसका कारण है डॉ० सुधा ने हाइकु गढ़े नहीं ,रचे है। रचना दिल से होती है। गढ़ने का कार्य विशुद्ध मैकेनिकल होता है जो सिर्पफ दिमाग से उपजता है। गढ़ी हुई रचनाएँ! कभी दिल में उतर ही नहीं सकती। सुधा जी के रचे कतिपय हाइकु देखें-

        चिड़िया! रानी/चार कनी बाजरा/दो घूँट पानी

        अनूठे रंग/ तितलियाँ उड़तीं/हवा के संग

        आया है दूल्हा/ॠराज वसन्त/फूलों का मौर

        उमंग-भरी/शाखों पे गिलहरी/उड़नपरी

        खिड़की पर/ काँप रही गौरेया/पानी से तर

        कोहरा ओढ़े/ ऊँघते पेड़-पौधे/पौष की भोर

        खेलती फाग/पलाश की फुनगी/चूमती आग

        गुलाब खिला/चहकी बुलबुल/नशे ने छुआ।

इस प्रकार डॉ० सुधा के हज़ारो हाइकु हैं जो उद्धृत होने की क्षमता रखते हैं।

        रामेश्वर काम्बोज हिमांशु एवं डॉ० भावना कुँअर दोनों स्वयं भी श्रेष्ठ हाइकुकार हैं । इन दोनों ने संयुक्त रूप से भी अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य किये हैं। उन्हीं महत्त्वपूर्ण कार्यों में ही डॉ० सुधा गुप्ता के हाइकु में प्रकृति ;रागात्मक मनोभूमि: (संरचण व संचयन) हाइकु विधा को विकास देती इस महत्त्वपूर्ण पुस्तक तीन खंडों में 1. रागात्मक मनोभूमि 2. संचरण और 3. संचयन में विभक्त करके सुधा जी के हाइकुओं में प्रकृति को प्रायः हर पक्ष से देखा-परखा और उसके साथ-न्याय किया है।

        इस पुस्तक में डॉ० भावना कुँअर ने जहाँ मेरे लिए प्रकृति का औचित्य के माध्यम ने डॉ० सुधा के प्रकृति संबंधी कार्य को कुशलता पूर्वक रेखांकित किया है, वहीं रामेश्वर काम्बोज हिमांशु और डॉ० भावना कुँअर ने प्रकृति-चित्रण परम्परा और प्रवाह के माध्यम से उनके मात्र मनोहारी प्रकृति चित्रण को प्रत्यक्ष किया है अपितु उन्होंने अप्रस्तुत योजना/आलंकारिक वर्णन करते हुए उपमा रूपक, हेतुत्प्रेक्षा, श्लेष, अपह्नुति,विशेषण-विपर्यय, प्रतीप, रूपकातिशयोक्ति, अन्योक्ति, के साथ ही प्रकृति के मानवीकरण रूप को उद्ध्रणों सहित रेखांकित करने में सफलता प्राप्त की है। इन दोनों संपादकों ने सुधा जी के हाइकुओं में बिम्ब योजना के अन्तर्गत गहराई में जाकर दृश्य बिम्ब, श्रव्य ध्वनि बिम्ब, स्पर्श बिम्ब, संकेत, सूक्ष्म पर्यवेक्षण, संक्षिप्त सांकेतिकता, प्रातःकालीन चित्र, सागर-तट पर सूर्यास्त तथा प्रकृति के अन्य रूपों पर भी विद्वत्ता से प्रकाश डाला है। इतना ही नहीं इन संपादकों ने अपने इस शोध लेख में रंग-योजना/विविध रंगों का संयोजन, सांस्कृतिक चेतना, प्रतीक योजना का उल्लेख करते हुए परम्परागगत प्रतीकों के उपयोगों को भी उद्ध्रणों के द्वारा रेखांकित करके सुधा जी द्वारा हाइकु में प्रकृति संबंधी कार्य के साथ पूरा-पूरा न्याय किया है।

        इसके अतिरिक्त डॉ० हरदीप कौर सन्धु के लेख प्रकृति के मोहक सौन्दर्य का दस्तावेज़, डॉ० ज्योत्सना शर्मा के लेख,डॉ० सुधा गुप्ता की हाइकु काव्य प्रकृति एक वानस्पतिक दृष्टिकोण तथा इन्हीं का दूसरा लेख पढ़ना तप्त मरुभूमि में ऐसी हरी टेकरी में सुधा जी के हाइकुओं की सुन्दर परख एवं पड़ताल की गयी है। सुधा जी की हाइकु कृतियों पर संपादकों के अतिरिक्त मंजु मिश्रा, सुभाष नीरव, उमेश महादेवी, प्रियंका गुप्ता, कमला निखुर्पा, संगीता स्वरूप, अनिता ललित, ज्योत्स्ना प्रदीप, रचना श्रीवास्तव, जेन्नी शबनम, सीमा स्मृति ,ॠता शेखरमधु, गिरिजा कुलश्रेष्ठ, डॉ० सरस्वती माथुर, रमा द्विवेदी, डॉ० अमिता कौंडल, डॉ० सत्यभूषण वर्मा, डॉ० भगवत शरण अग्रवाल, नलिनीकान्त, डॉ० रमाकान्त श्रीवास्तव, नीलमेन्दु सागर, मोती लाल जोतवाणी, आदित्य प्रताप सिंह, डॉ० शैल रस्तोगी, डॉ० लक्ष्मण प्रसाद नायक, विश्वम्भर अरुण, उर्मिला कौल, डॉ० विश्वदेव शर्मा, राम निवास पंथी, रमेशचन्द्र शर्मा चन्द्र, डॉ० रमेश कुमार त्रिपाठी, डॉ० करुणेश प्रकाश भट्ट,कमल, किशोर गोयका, देवेन्द्रनारायण, दास, पूनम भारद्वाज,आभा पूर्वे, डॉ० रामसनेही लाल शर्मा यायावर, राजेन्द्र पाण्डेय,अजय चरणम्, कमलेश भट्ट कमल, डॉ० स्वर्णकिरण, डॉ० कृष्ण बिहारी सहल, डॉ० सुरेन्द्र वर्मा, डॉ० स्वामी श्यामानन्द सरस्वती, कृष्णमणि, चतुर्वेदी मैत्रेय, शिरीष पै, अनिरुद्ध प्रसाद विमल, पुष्पा रघु, शम्भू शरण द्विवेदी बन्धु, शैल सक्सेना, श्याम खरे, डॉ० महाबीर सिंह, रामबहादुर शर्मा निराश,श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी, प्रदीप कुमार दास दीपक, राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी बन्धु, डॉ० सतीशराज पुष्करणा, डॉ० मिथिलेशकुमारी मिश्र, रमाकान्त, हरिमोहन, डॉ० राजकुमारी शर्मा राज़, डॉ० शिवप्रसाद नैथानी, राधेश्याम बाँका, आनंद शेखर माधवन, राम आसरे, पी एस सकलानी, जगदीश व्योम, डॉ० विद्या बिन्दु सिंह, सौरभ सिंह,, जवाहर इन्दु और अरुण मिश्र की उनके कर्तृत्व को रेखांकित करती मूल्यवान टिप्पणियाँ हैं। ये शोधकर्ताओं को सही दिशा दे पाने में काफी सहायक सिद्ध होंगी। अन्त में सुधा जी के लगभग एक हजार से कुछ अधिक प्रकृति पर हाइकु वर्णक्रमानुसार दिये गये हैं ,जो प्रकृति में प्रकाशित लेखों को सच्चाई के साक्षी बन गये हैं।

        निःसंदेह रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, एवं डॉ० भावना कुँअर ने यह शोधकार्य बहुत ही ईमानदारी एवं परिश्रम के साथ पूरा किया है ,जिसे हाइकु का इतिहास कभी विस्मृत नहीं कर सकेगा।

डॉ० सुधा गुप्ता के हाइकु में प्रकृति (रागात्मक मनोभूमि: संचरण व

संचयन) संपादकद्वय: रामेश्वर काम्बोज हिमांशु एवं डॉ० भावना कुँअर,

प्रकाशक: अयन प्रकाशन, 1/20 मेहरौली, नई दिल्ली-110030, संस्करण:2014, पृष्ठ: 248, मूल्य: रु 500

 

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Responses

  1. बधाई दीदी सुधाजी की अमर कृति के लिए और उन टिप्पणीकारों को जिन्हें इस अनमोल धरोहर में स्थान मिला . क्या ही अच्छा होता मुझे भी इस में शामिल करते ?

    डा . सतीशराज जी को उत्कृष्ट समीक्षा , संपादक हिमांशु जी , डा . भावना कुंवर जी को हिंदी साहित्य जगत में हाइकु के उन्नयन के लिए मेरी हार्दिक बधाई .

  2. Priya Sudhaji is sunder prakrutik pahalu par aapki is kruti ke liye aapko badhai v shubhkamanyein. sampadak Himanshi Ji, dr. Bhavna kunwar ji ne vishesh karya bakhoobi nibhakar ise yah sunder swaroop diya hai…Yah team worl ka nateeja hai jo aur khasamkhas Dr. Satishraj pushkaran ji jo is disha mein behtar margdarshan kar rahe hain….

  3. प्रकति चित्रण में डा. सुधा गुप्ता हाइकु रचनाकारों में अद्वितीय हैं. इस विषय पर केन्द्रित हिमांशु जी और डा. भावना कुंवर द्वारा संपादित पुस्तक अत्यंत महत्त्व पूर्ण इसलिए और भी हो गई है कि इसमें सुधाजी के २००० से अधिक हाइकु एक ही जगह पर सहृदयों को पढ़ने को मिल जाते हैं. प्रशंसात्मक समालोचना तो अपनी जगह है ही. पुष्करणा जी की पुस्तक-समीक्षा संपादित पुस्तक के सर्वश्रेष्ठ पहलुओं को रेखांकित करती है. सुधा जी, सम्पादक द्वै तथा समीक्षक को बहुत बहुत बधाई . – सुरेन्द्र वर्मा .

  4. बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनायें इस अमूल्य कृति के लिए !!

  5. adarniy sudha didi ko hardik badhai .

  6. आप सभी को इस अनुपम कार्य के लिए हार्दिक बधाई एवं बहुत-बहुत शुभकामनाएं !

  7. अत्यंत उत्कृष्ट और उपयोगी कर्तृत्व है संपादक द्वय का, काव्य-विश्लेषकों का इस अनुपम प्रयास हेतु अभिनंदन और हार्दिक बधाई साथ ही आभारी हैं डा. सुधा गुप्ता जी के भी जिन्होंने मात्र प्रकृति पर ही असंख्य हाइकु रचकर एक कीर्तिमान स्थापित किया है. मेरा हृदय-तल से नमन है उनको….

  8. आदरणीया सुधा दीदी के वन्दनीय व्यक्तित्व एवं कृतित्व का अभिनन्दन करती समीक्षात्मक प्रस्तुति बेहद प्रभावी और प्रशंसनीय है | आदरणीया दीदी , पुष्करणा जी तथा सम्पादक द्वय के प्रति सादर नमन …बहुत बहुत बधाई !!

  9. जितने प्रभावशाली और सुन्दर हाइकु हैं, उतनी ही अच्छी समीक्षा है…| आभार और बधाई…|

  10. AADARNIYA SUDHA JII,PUSHKARNA JI,SAMPADAK DVAY KE PRATI SADAR NAMAN….SUDHA JI KI HAR VIDHA KO SHAT -SHAT NAMAN………..AABHAAR….BADHAI DIL SE AAP SABHI KO .

  11. श्रद्धेय रामेश्वर जी काम्बोज ‘हिमांशु’ तथा डा. भावना कुंअर के कुशल सम्पादन में पुस्तक “डा. सुधा गुप्ता के हाइकु में प्रकृति” की डा. सतीशराज पुष्करणा द्वारा लिखित उत्कृष्ट समीक्षा पढ़ कर मन को सुकून मिला | विभिन्न विद्वजनों की डा. गुप्ता पर टिप्पणियों से पुस्तक हाइकु इतिहास में मिल का पत्थर प्रतीत होती है | इस श्रमसाध्य कार्य हेतु आप सभी को हार्दिक बधाई |


रचनाओं से सम्बन्धित आपकी सार्थक टिप्पणियों का स्वागत है । ब्लॉग के विषय में कोई जानकारी या सूचना देने या प्राप्त करने के लिए टिप्पणी के स्थान पर पोस्ट न करके इनमें से किसी भी पते पर मेल कर सकते हैं- hindihaiku@ gmail.com अथवा rdkamboj49@gmail.com.

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