Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 1, 2014

मन :एक दर्पण


1-सुभाष लखेड़ा

1

जिया उतना

मैं दूसरों के काम

आया जितना।

2

अपना वही

भटके को जो रास्ता

दिखाए सही

3

मित्रता भली

जो बुरे दिनों में भी

निभती चली।

4

जीवन बीता

मैं बटोरता रहा

फिर भी रीता।

5

बहुत बड़े

हैं खजूर -से खड़े

छाया विहीन।

-0-

2-ज्योत्स्ना प्रदीप

   1

आत्मान्वेषण

कर ना पाया मृग

फैलाये दृग ।

 2

एक दर्पण

उतारे आवरण

हर आयु का ।

 3

अपनी आयु

छुपाई सबसे तो

हँसा आईना ।

   4

एक उदीषा

करती है उज्ज्वल

श्रम का शीशा ।

5

उमर मेरी

दिखता है आईना

विचित्र बात ।

-0-

3-एस० डी० तिवारी

एस डी तिवारी1

सूरज नम्र

दिखने लग पड़ी

प्रातः की ओस

2

शरद् ऋतु में

ओस से लिपट के

शर्माते पुष्प ।

3

पौधों का चारा

दबंगई से खाती

जंगली घास।

-0-

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Responses

  1. बहुत सुन्दर हाइकु….सुभाष जी, ज्योत्स्ना जी, तिवारी जी….बहुत बधाई !

  2. सभी हाइकु बहुत सुन्दर हैं ! ज्योत्स्ना जी और तिवारी जी, आप दोनों को बधाई एवं शुभकामनाएं !

  3. सुन्दर भावपूर्ण बहुत सुन्दर हाइकु …सुभाष जी ,ज्योत्स्ना जी एवं तिवारी जी को हार्दिक बधाई !

  4. सभी के हाइकु बहुत अच्छे लगे…सबको हार्दिक बधाई…|

  5. AAP SABHI KA DIL SE AABHAAR.


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