Posted by: डॉ. हरदीप संधु | सितम्बर 28, 2014

वर्षा के झोंके


डॉ०भगवतशरण अग्रवाल

[ डॉ भगवतशरण अग्रवाल जी हाइकु के वे शलाका पुरुष हैं जो सबको साथ लेकर चले हैं ।सबकी उन्नति को अपनी उन्नति समझा ।बिना किसी से आर्थिक सहयोग लिये हाइकु भारती के माध्यम से हिन्दी जगत् के हर छोटे बड़े रचनाकार को सामने लाए ।विरोधी विरोध करने में जुटे रहे और डॉ अग्रवाल मुस्कराकर रचनात्मक कार्य करते हुए आगे बढ़ते गए। हाइकु-काव्यकोश को आपने देश विदेश में कई सौ लोगों तक पहुँचाया । समय मिलने पर आज भी आप हिन्दी हाइकु पर नए-पुराने सभी रचनाकारों को पढ़ते हैं और सराहना करते हैं। आज विभिन्न विषयों पर आपके हाइकु दिए जा रहे हैं। आशा है हमारे पाठकों को पसन्द आएँगे।

डॉ हरदीप सन्धु रामेश्वर काम्बोज ]

       

1-पावस

1

पावस रात

पिकनिक मनाते

नाचें जुगनू ।

2

वर्षा के झोंके

बतियाते मेंढक

चाय-पकौड़ी ।

3

कौन-सा राग

टीन की छत पर

बजाती वर्षा ।

4

बूँदें गिरतीं

या खेत लपकते

प्यास बुझाने ।

5     

मेघ तो लौटे

सन्देशे रास्ते में ही

बिखरा आए ।

6     

वर्षा की शाम

दर्द जगाता कोई

गाके माहिया ।

7     

नन्ही बदली

गिरिशृंग पै शीश

चैन से सोई ।

8     

ले गई हवा

सावन के बादल

जलते खेत ।

9

सावन झड़ी

मन-आँगन भरे

फूल औ शूल।

-0-

2-गर्मी

1

नभ को चीर

उड़े पंखी ; सन्नाटा,

दोपहरी लू ।

2

लू से झुलसी

जेठ की दुपहरी

कराहे पंखे ।

3

पिघली हवा

दुपहरी झुलसे

वृक्ष की छाया ।

-0-

3-सर्दी और धूप

1

पसर गई

सरसों फूली शय्या

माघ की धूप ।

2

पूस की रात

ठिठुरती हवाएँ

दस्तक देतीं ।

-0-

4-जीवन

1

देने को दिया

सारा आकाश , पर

पंख काटके ।

2

बूँद में समा

सागर और सूर्य

हवा ले उड़ी ।

3

कभी न जीती ।

मौत से जिन्दगानी  

हार न मानी ।

4

हँसेगा जग

आँसू व्यर्थ जाएँगे

मन में रोना ।

5

तृष्णा सागर

डूबूँ , उतराऊँ मैं

पार न पाऊँ ।

6

रिसते रिश्ते

डंक से चुभें , पर

टूटें न छूटें।

-0-

5-प्रेम  

1

माँगूँ भी तो क्या

सभी तो क्षणिक है

तुम्हें माँग लूँ।

2

उनके बिना

दीवारें हैं, छत है  

घर कहाँ है ?

3

जब भी मिले

कहना कुछ चाहा

कहा और ही ।

4

छिपाए रखना

सुगन्धित श्वासों को

सन्देही जग ।

5

कभी तो मिलो

ख्वाबों के बाहर भी

रूठें , मनाएँ ।

-0-

6-विविध

1

फूली कपास

छोरी का गौना होगा

मैकू को आस ।

2

एक भी फूल

अन्तर में न खिला

कैसे माली हो !

3

हरसिंगार

अन्तिम श्वास तक

गन्ध न त्यागे ।

 

-0-

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Responses

  1. सभी हाइकु बहुत सुंदर

  2. सभी हाइकु बहुत सुन्दर हैं ! आपको हार्दिक बधाई।

  3. हाइकु नहीं सृष्टि, प्रकृति, भाव एवं भावनाओं का समंदर हैं ! सभी हाइकु इतने मनमोहक हैं कि इनमें से चुनना कठिन है। इनके बारे कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा होगा।
    आपकी लेखन को नमन…. आदरणीय भगवतशरण सर जी।

    ~सादर
    अनिता ललित

  4. adarniye bhagvat sharan ji ko sadar naman …..aapki rachnayo ko padhna hamare puny karmo ke phal jaise hai …..aapke lekhan ke prakaash se….hamara man bhi jyotit ..ho utha……aapki lekhni ko shraddha se sarabore naman…..barambaar naman.

  5. प्रेम और प्रकृति दोनों का सौन्दर्य मुखरित होता है आप की इस हाइकु प्रस्तुति | प्रकृति को परखने की कितनी सूक्ष्म दृष्टि है आपके पास . नमन और बधाई | शशि पाधा यू एस ए

  6. डा. भगवतशरण जी अग्रवाल के बारे में भला क्या कहूँ ? उन्हीं की हाइकु भारती ने मुझे हाइकु संसार दिखाया और उसमे बसने का सलीका सिखाया. प्रस्तुत हाइकु उनकी प्रतिभा का मात्र छोटा -सा नमूना भर हैं. – सुरेन्द्र वर्मा.

  7. ये तो जैसे अनमोल मोती हैं सब के सब…बेशकीमती…| किसी एक को सर्वश्रेष्ठ कह पाना बहुत मुश्किल है…| इतने अच्छे हाइकु पढवाने के लिए आपका आभार और आदरणीय भगवतशरण जी को नमन…|

  8. गहराई लिए सभी हाइकु
    बधाई

  9. आद. , आप हिन्दी हाइकु के प्रणेता रहे हैं और मेरे गुरु भी, आज वर्षों बाद आपके हाइकु पढ़कर आनंद की सीमा न रही…
    सुंदर मुक्ता,
    सदृश्य से हाइकु,
    अभिनंदन ||
    -मंजु महिमा भटनागर, अहमदाबाद

  10. कभी तो मिलो
    ख्वाबों के बाहर भी
    रूठें , मनाएँ ।

    बहुत सुंदर।


रचनाओं से सम्बन्धित आपकी सार्थक टिप्पणियों का स्वागत है । ब्लॉग के विषय में कोई जानकारी या सूचना देने या प्राप्त करने के लिए टिप्पणी के स्थान पर पोस्ट न करके इनमें से किसी भी पते पर मेल कर सकते हैं- hindihaiku@ gmail.com अथवा rdkamboj49@gmail.com.

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