Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | सितम्बर 24, 2014

सकारात्मक सोच की रचनाएँ


                    प्राकृतिक सौन्दर्य और सकारात्मक सोच की रचनाएं भोर आस पास है

        डा. सुरेन्द्र वर्मा
संकलन का नाम ‘भोर आसपास है’ दो उल्लेखनीय बातों की और संकेत करता है. एक तो यह कि अभी रात गयी नहीं है और अन्धकार व्याप्त है, और दूसरे, डरने की फिर भी कोई बात नहीं है, सुबह होने ही वाली है. डा, उर्मिला अग्रवाल इस तरह जहां एक ओर वर्तमान पर अपनी निगाह रखे हैं, वहीं उनका सकारात्मक सोच एक बेहतर भविष्य के प्रति पूरी तरह आशान्वित है.
     डा. अग्रवाल एक प्रतिष्ठित हाइकु-रचनाकार हैं. उनके अबतक तीन संकलन आ चुके हैं और यह चौथा है. हाइकु के अलावा वे अन्य जापानी विधाओं, जैसे ताँका और सेदोका, में भी काव्य रचनाएं करती हैं. इनसे सम्बंधित संकलन भी आ चुके हैं. वे हिन्दी की ख्याति-प्राप्त साहित्यकार हैं. कविताओं के अलावा नाटक, कहानियां, और प्रबंध काव्य भी लिखे हैं, किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि उनके लेखन की मुख्य विधा जापानी काव्य रूप ही हैं.
     अपने इस संकलन ‘भोर आसपास है’ में उर्मिला जी अपनी बात कहते हुए कोई खुशफहमी नहीं पालतीं. स्वांत:-सुखाय या परान्त:-सुखाय लेखन की दार्शनिक घुमावदार उलझनों से बचती हुई वे स्पष्ट करती हैं कि उनकी रचनाएं उनकी अपनी भावनाएं भर हैं. वे उनके अपने विचारों  के अंश हैं. अपनी रचनाओं में इन्हें अभिव्यक्ति प्रदान कर वे “शायद अपने मन की किसी कचोट से मुक्ति पाती’ हैं. कागजों पर उतारे उनके ये शब्द उनकी ‘घनीभूत वेदना की कथा हैं.’ कागज़ पर अपनी पीड़ा उतारने के बाद उनका मन ‘धुले-धुले आकाश सा हो जाता है’ और अपनी सम्पूर्ण प्रभा के साथ उनसे कहता है, ’अँधेरे से मत डरो, मैं तो यहीं हूँ, तुम्हारे आसपास. संकलन का मुख्य स्वर यही सकारात्मक सोच है.
     कोई भी व्यक्ति अन्धेरा नहीं चाहता. सभी को उजाले की दरकार होती है. कवियित्री के मन में भी चांदनी का ही बसेरा है, निशा का नहीं. फिर लोग रात की बात क्यों करते हैं? अरे, चाँद नहीं तो सितारे तो हैं, रोशनी देंगे. शिकायत किस बात की? अगर अन्धेरा है तो दीप तो जला ही सकते हो. सकारात्मक सोच का व्यक्ति तक़दीर के हाथों हार नहीं मानता, लड़ता रहता है. वह सिर्फ रात की बात नहीं करता, उसे तो धूप नहाई ज़िदगी का इंतज़ार है. –
अन्धेरा है तो / डरना कैसा, भोर / आसपास है

सभी इंसान / चाहते हैं उजाले / अँधेरे

नहीं                                                                                                                        

क्यों करते हो / सिर्फ रात की बात / भोर की नहीं                                                                                                           

चाँद नहीं तो / सितारे तो हैं, वे भी / रोशनी देंगे                                                         

दीप जलाओ / अगर अन्धेरा है / शिकायत क्यों  
     दृढ संकल्प और रचनात्मक दृष्टि बेशक अपनी जगह है लेकिन आज की परिस्थितियाँ सोचने को मजबूर करती हैं. प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या के चलते आज हमने भाईचारा मानों गिरबी रख दिया है. प्रेम खोखला और केवल दिखावटी बन गया है. अधर्म ही मानो धर्म हो गया है. लोगों को बस खनखनाते सिक्के ही लुभा रहे हैं. अपने बुजुर्गों को उन्हें उनकी तक़दीर पर अकेला छोड़ कर युवक अन्यत्र चले गए हैं. सौन्दर्य बोध कुछ ऐसा डगमगा गया है कि कैकटस के काँटों ने फूलों की जगह ले ली है. –
     गिरबी रखा / हमने भाईचारा / ईर्ष्या के पास
       प्रेम खोखला / नफ़रत का राज / अब जग में                                                         
     पंख निकले / उड़ गए चोंगले / वृद्ध अकेले                                                             
     लुभाते अब / खनखनाते सिक्के / छूटता धर्म                                                           
    कैक्टस बने / दुनिया की पसंद / फूल बेगाने
     लेकिन उर्मिला जी प्रकृति-प्रेमी हैं और उनका मन तो फूलों में ही बसता है. काव्य की उनकी बगिया में शिरीष, पारिजात, अमलतास, मौलश्री, सूरजमुखी, गुलमोहर और हरसिंगार जैसे फूलों के पेड़-पौधे विराजमान हैं. उन्होंने कोई विदेशी फूल नहीं चुना. सभी में भारत का सौन्दर्य और महक है. –
     पांखुरी मेरी / नजाकत से भरी / मैं हूँ शिरीष
             बिना बीज के / खिला तू पारिजात / कैसा विस्मय?                                                     
     प्रेम प्रतीक / बना अमलतास / बिना गंध भी                                                             
    बेसुध करे / मदमाती सुगंध / मौलसिरी की                                                          
     मुरझा गया / सूरजमुखी हुआ / अस्त जो रवि                                                            
     लाल-भभूका / हो रहा अग्निपुत्र / गुलमोहर                                                                 
     श्वेत रंग पे / लालिमा की बहार / हरसिंगार
    फूलों से सम्बंधित न जाने कितने मिथक हैं जो भारतीय मनीषा में अपना घर बनाए हैं. विदुषी डा. अग्रवाल की अनेक हाइकु रचनाओं में इनका सन्दर्भ है. अशोक (पुष्प-वृक्ष) से सम्बंधित एक कथित धारणा यह है कि जब कोई सुन्दर कन्या उसके तने की जड़ पर पदाघात करती है तभी उस पर फूल खिलते हैं. डा. अग्रवाल पूछती हैं, ‘क्यों प्रिय तुम्हें / कुँआरी -पदाघात / बोलो अशोक?’ और खुद ही उत्तर भी दे देती हैं, ‘रूप पुजारी / अशोक तो खिलेगा / कन्या स्पर्श से’. लेकिन ज़ाहिर है इससे अशोक की अपनी अस्मिता, अपनी स्वाधीनता को धक्का तो लगता ही है – ‘अशोक पुष्प / रूपसी पर निर्भर / तेरा खिलना’ . इसी तरह केतकी (एक अन्य पुष्प-वृक्ष) की कथा को स्मरण करते हुए वे उसे याद दिलाती हैं-
 ‘‘एक झूठ ने / तिरस्कृत कराया / केतकी तुझे’’. अथवा, “वर्जना बनी / केतकी की नियति / ब्रह्मा कारण”. अब तो, ‘खुशबू तेरी / लुभाती है साँपों को / सुन केतकी”. ‘गंध न मोहे / किसी देव को, तेरी / ओ, केतकी’. डा. अग्रवाल पारिजात की कथा भी नहीं भूली हैं. ‘बीज न फल / पारिजात तुझमें / इंद्र का शाप’. लेकिन पारिजात के ‘फूल झड़ते / रुक्मणि के आँगन’’. नहीं, केवल फूलों से सम्बंधित मिथक ही नहीं, अन्य पौराणिक मिथकों का भी उर्मिला जी अपनी हाइकु रचनाओं में खूब प्रयोग करती हैं. उदाहरण के लिए, नारी की स्थिति और महत्वाकांक्षा को रेखांकित करते हुए वे कहती हैं-  ‘अहल्या नहीं / बनाना हमें, तारा / अरुंधती-सा’. इसी तरह कृष्ण को याद करते हुए वे कहती हैं, ‘चक्र ही चला / मथुरा में हमेशा / बंसी न बजी’ या फिर, ‘कान्हा के साथ / पवित्र बन गया / श्वेत मौलश्री’ आज हम अनेक भारतीय पौराणिक कथाओं को भूलते जा रहे हैं. उर्मिला जी सचमुच बधाई की पात्र हैं कि उन्होंने भारतीय कथाओं और लगभग विस्मृत हो चुके पुष्प-वृक्षों और पौधों को अपनी हाइकु रचनाओं में स्थान देकर उन्हें पुनर्जीवित किया. साथ ही इससे एक जापानी काव्य-विधा का भारतीयकरण भी हुआ.
     डा. उर्मिला अग्रवाल न केवल बौद्धिक स्तर पर परम्परा से शक्ति ग्रहण करती हैं, बल्कि व्यक्तिगत      सुधियों में भी रमने से बाज़ नहीं आतीं. पुरानी प्रेम पगी यादें उनके मानस में जमीं बैठी हैं. यादों के पक्षी उनके मन आकाश पर फड़फड़ाते हैं. ऐसे में वे अपनी रचनाओं में यादों के दरवाज़े न खोलें, यह भला कैसे संभव है?
     जम के बैठीं / प्रेम-पगी सुधियाँ / मन कुटिया                                                                   
    मन आकाश / पंख फड़फड़ाते / यादों के पाखी
     उर्मिला जी का संवेदनशील मन बार बार अपने प्रिय की याद में खो जाता है. तनहाई में उसका स्मरण ही अकेलेपन को मिठास से भरता है. मीठी स्मृतियाँ चन्दन लेप बनकर शीतलता प्रदान करती हैं. –
     तुझसे जीती / तेरी याद से हारी / भूल न पाती                                                       
     ज़िंदगी क्या है / तेरी याद के सिवा / कुछ भी नहीं.  
    तनहाई में / भर जाती मिठास /तुम्हारी याद  
    शीतलता दें / चन्दन-लेप बन / मीठी सुधियाँ
  मुहब्बत भी क्या अजब शै है? यह वो आतिश है जो मन में आग लगाती है और आँखों में पानी भर ले आती है. ये वो रोशनी है जो बिना दिए और बाती के ही उजाला फैलाती है. दिए की बाती को तो फिर भी रोशनी देने के लिए नेह (तेल/प्यार) की ज़रूरत होती है. –
     दिया न बाती / फिर भी फैलाता है / प्यार रोशनी.                                                           
     नेह पीती है / तभी रोशनी देती / दिए की बाती                                                               
    तेरे धोखे ने / नैनों को दिया पानी / मन को आग
     प्रेम और उसकी स्मृति ही नहीं, प्रकृति भी उर्मिला जी के मन को एक सुखद अहसास से भर देती है. शायद भारत ही ऐसा एक देश है जहां प्रकृति के हमें सर्वाधिक रूप देखने को मिलते हैं. मौसम की दृष्टि से यहाँ आधी दर्जन ऋतुएँ बारी-बारी से आती हैं और उर्मिला जी के लिए हर ऋतु हाइकु रचाने का एक बहाना बन जाती है.
 ग्रीष्म उन्हें त्रस्त करती है, बसंत में डालियाँ सजती हैं और फूल खिलखिलाते हैं, वर्षा अपनी बूंदों के साथ अल्हड युवती सी थिरक उठती है. शरद की उजली चांदनी में  पूरी पृथ्वी मुस्कराने लगती है, शिशिर में बर्फ कपास की तरह रुई बनाकर उड़ने लगती है, हेमंत आता है तो धरती पर मानों पत्तों की शय्या बिछ जाती है. —
    ग्रीष्म में छाया / अनमोल तोहफा / वृक्षों ने दिया                                                         
    सजी डालियाँ / खिलखिलाए फूल / आया बसंत                                                            
    बरखा बूँदें  / अल्हड युवती- सी / थिरक उठी                                                                 
    शरद रात / विहंसती जुन्हाई / उजली धरा                                                               
    शिशिर प्रिया / बन गयी कपास / बर्फ बेगानी                                                         
    पत्तों की शैया / धरा पे सज गयी / हेमंत आया
     डा. उर्मिला अग्रवाल अपनी हाइकु रचनाओं में तकनीक की दृष्टि से भी काफी सजग है. रचनाओं को आकर्षक बनाने के लिए वे कभी विरोधाभासों का उपयोग करती हैं तो कभी संवेदनशील बिम्बों को उभारती हैं.
     उसी ने मारा / जिसके जीवन की / दुआ की मैंने                                                               
    कभी कभी तो / लगा देती है आग / इत्ती से बात                                                          
    उषा की लाली / बिखर गयी रोली / नभ की थाली
    ‘भोर आसपास’ में एक से एक सुन्दर हाइकु परोसने के लिए मैं उर्मिला जी को बधाई देता हूँ और कामना करता हूँ कि उनकी कलम से और भी अच्छी रचनाएं सहृदय पाठकों को मिलाती रहें.
         ‘भोर आसपास है’ : (हाइकु-संग्रह) – डा. उर्मिला अग्रवाल ;अयन प्रकाशन, 1/ 20 महरौली   नई दिल्ली-110030; संस्करण:2014 ; मूल्य :200/-; पृष्ठ:100

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Responses

  1. बहुत खुबसुरत

  2. सुन्दर प्रस्तुति !

  3. बहुत सुन्दर ।

  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

  5. बेहतरीन प्रस्तुति 🙂

  6. badhai aapko
    bahut sunder haiku hai aur samiksha bhi utni sunder tarike se likha hai
    badhai
    rachana

  7. बहुत सुन्दर समीक्षा!
    ‘भोर आसपास है’ हाइकु संकलन सचमुच दिल को छूने वाला है !
    डॉ उर्मिला अग्रवाल को ह्रदय से बधाई एवं शुभकामनाएँ।

    इस सुन्दर समीक्षा के लिए डॉ सुरेन्द्र वर्मा जी को हार्दिक बधाई।

    ~सादर
    अनिता ललित

  8. bahut hi khoobsurat prastuti….

  9. sundar kriti ki samyak sameecheen saampratik sameeksha ke prastutikaran ke liye hardik abhivanandan
    saadar- rekha rohatgi

  10. बहुत अच्छी और सार्थक समीक्षा…आभार और बधाई…|


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