Posted by: डॉ. हरदीप संधु | सितम्बर 13, 2014

तरसता है मन


प्रियंका गुप्ता

1

रहे अकेले

अंधकार में कब

साए हुए हैं ?

2

निकला सूर्य

उजाला था बहुत

साए भी आए ।

3

खोए थे पन्ने

ज़िन्दगी की किताब

अधूरी रही ।

4

दिखती नहीं

आसपास रहती

माँ की दुआएँ ।

5

वक़्त की धार

कभी नहीं बख़्शती

कोई ग़ुनाह ।

6

कब होती है

शीशे की ज़रूरत

बिन दृष्टि के ।

7

नामुकम्मल;

अधूरी हसरतें

दुनिया यही ।

8

जादू था कोई

गेंद थी लाल; बनी

आग का गोला ।

9

कायर सूर्य

अँधेरा जब आता

दुबक जाता ।

10

चिठ्ठी न पत्री

तरसता है मन

डाकिया देख ।

-0-

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Responses

  1. चिठ्ठी न पत्री

    तरसता है मन

    डाकिया देख ।

    सच वह आस तो मन में बनी ही रहती है। सुंदर लेखन। बधाई!

  2. chithi na patri , tarasta hai man , dakiya dekh . bahut sunder panktiyan hain.
    priyanka ji apko badhai .
    pushpa mehra.

  3. प्रभावी प्रस्तुति …”माँ की दुआएँ” और “चिट्ठी न पत्री” बहुत अच्छे हाइकु लगे हार्दिक बधाई !

  4. चिठ्ठी न पत्री
    तरसता है मन
    डाकिया देख ।

    bahut marmik, badhaiyan Priyanka jee.

  5. आप सबका हार्दिक आभार…

  6. कायर सूर्य
    अँधेरा जब आता
    दुबक जाता — वीर सा रवि / घूमता चहुँ और / ऊर्जा का स्त्रोत ( आपके हाइकु की सफलता यह कि एक और हाइकु का जन्म हुआ) सभी हाइकु प्रभावशाली

  7. चिट्ठी न पत्री / तरसता है मन /डाकिया देख । प्रियंका गुप्ता जी यह आज आप के हाइकु छपने के पूरे तीन साल बाद दृष्टि पड़े । इस वाले हाइकु ने पुराना जमाना याद करा दिया ।भले महीने दो महीने बाद पत्र आता था अपने प्यारों का । डाकिये के इन्तजार में पता नहीं कैसे आधा दिन गुजर जाता था ।
    बहुत मन मोहक हाइकु लगे ।बधाइ आप को ।


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