Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अगस्त 20, 2014

सो रही सन्ध्या


1-डॉ दयाकृष्ण विजयवर्गीय विजय

1

सरसों नहीं

बैठी उबटन लगा

वसुधा-वधू।

2

फूल गिराए

रखें काँटे सहेज

डाली का प्रेम ।

3

नभ-पलंग

तारक सोड़ ओढ़

सो रही सन्ध्या ।

4

विहँस झेले

गिरा बादल जल

प्रेयसी इला।

5

झील में देख

चाँद की देह पड़ी

निशा रो पड़ी ।

6

कुशल पूछे

वीर बहूटी भेज

मेघ धरा की ।

7

छलिये मेघ

गरजे न बरसे

भूमि तरसे ।

8

ले लो उजास

बालद लाद लाया

रवि बंजारा ।

8

यहाँ तो आग

कहां जा रहे भाग

मेघ नुगरे ।

9

चोर है धूप

चुरा लिये धूप के

मोती अनूप

10

घटा को उढ़ा

सतरंगी चूनर

विहँसी धूप ।

11

आना जी ग्रीष्म !

गुलमोहर कहे

हमारे घर ।

12

गाँव में बाढ़

बहाने लगे बच्चे

कागज़ी नाव ।

13

दामिनी है या

मेघों को चीर कढ़ी

आकाशगंगा ।

14

हरी चूनर

उढ़ाते ही माघ के

हँसी भू देवी ।

15

मिटाती नहीं

बढ़ाती ही दूरियाँ

प्रेम की प्यास ।

16

दूर का पास

पास का लगे दूर

मन से बूझ ।

-0-

-विजय भवन, 228-बी, सिविल लाइन्स , कोटा-324001 (राज)

( जन्म 8 अप्रैल 1929,लगभग 43 पुस्तकें प्रकाशित, ये हाइकु आखर थोड़े अर्थ घने से साभार)


Responses

  1. “मिटाती नहीं / बढ़ाती है दूरियां / प्रेम की प्यास” बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति . श्रद्धेय विजय साहब को प्रणाम.

  2. बहुत सुन्दर भावपूर्ण हाइकु….बधाई ।

  3. sunder, bhaavpurn …vijay ji ..sadar naman ke saath hardik badhai .

  4. झील में देख

    चाँद की देह पड़ी

    निशा रो पड़ी ।
    बहुत खूबसूरत…सभी हाइकु अच्छे लगे…बधाई…|


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