Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जून 30, 2014

ऊन का गोला


आदित्य प्रसाद सिंह ( स्वर्गीय)

1

ऊन का गोला

जगा, भगा सहसा

अरे शशक !

2

खेत में हवा

चौकड़ियाँ भरते

हरे बछेड़े ।

3

खेत लड़की

हरी-भरी करती

हवा की कंघी

4

बदली जूड़ा

चाँद की कंघी खोंसे

सतपुड़ा रे ।

5

घोड़ा लापता

लू पे चला सवार

केवल कोड़ा ।

6

केश फैलाए

कुपिता दौड़ती रे

धूसर आँधी ।

7

दूब की पाती

निदारी ओस की बूँद

चिड़िया पीती ।

8

सितारों बीच

हँसिया फेंक गई

खेत की साँझ ।

9

चिड़चिड़ाता

तेन्दू का कोयला रे

अकेला बूढ़ा ।

10

चाँदनी झुकी

फूल के ओठों पर

दूध-भरी माँ ।

11

पपिहरा गा

और और बना रे

एकाकी मुझे ।

12

पूस की पूनो

झुग्गियों के पैबन्द

झलके आह !

13

जूठी पत्तल

कुत्तों को भगाता रे

बाल कंकाल ।

14

चुभता आह :

टूटा काँच खिलौना

बच्ची की याद ।

[ साँसों की किताब, दूसरा संकरण : 1997 , 1862 हाइकु( कई भारतीय भाषाओं में)।ये हाइकु वर्तनी के प्रबल विरोधी ( अभद्रता की सीमा तक) तथा हायकू वर्तनी के समर्थक थे ।]

 

 

 

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Responses

  1. haiku kA ujAlA karane vali shakshiyat shraddhey Adity prasAd singh sAhab ko sadAr naman.
    dvay sampAdak ji kA hArdik AbhAr.

  2. आदित्य जी के हाइकु हिंदी साहित्य को नई दिशा दे रहें हैं वे नहीं हैं लेकिन उनकी हाइकु अमानत का खजाना हम सब का व नई पीढ़ी के लिए मार्ग दर्शन का काम करेगी .

    सभी हाइकु उत्कृष्ट हैं .
    आभार् सम्पादक द्वय का जो हम तक साहित्य को पहुंचाते हैं .

  3. आदित्यप्रताप सिंह जी के हायकू पढ़ने का अवसर मिला। आभारी हूँ।


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