Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जून 14, 2014

बहती जलधारा


सुदर्शन रत्नाकर

1-धूप

1

नहीं ठिकाना

उड़ते पक्षी प्यासे

कड़ी धूप में ।

2

ज्येष्ठ की धूप

जलती है धरती

खोया है रूप ।

3

गर्म हवाएँ

तन को झुलसायें

चैन न आए ।

4

चिलचिलाती

धूप का है क़हर

सूनी डगर ।

5

चुप खड़े हैं

पलाश-अमलतास

रुके ज्यों साँस ।

6

तपती धरा

प्यासे पशु परिन्दे

झुलसें बंदे ।

-0-

2-बहती जलधारा

1

नदी किनारा

बहती जलधारा

फिर न मिली ।

2

धैर्य न खोना

जीवन है संग्राम

व्यर्थ है रोना ।

3

मेरा संकल्प

मेरा जीवन साथी

साथ निभाता ।

4

विघ्न बाधाएँ

नहीं रोकतीं राहें

पग बढ़ाएँ

5

अच्छी लगती

प्यार की अनुभूति

ज़िंदगी देती ।

6

तुम जो मिले

सूरजमुखी खिले

रेगिस्तान में ।

7

परछाइयाँ

पीछा नहीं छोड़तीं

तेरी यादों की ।

8

जलती रही

दीपक की तरह

रोशनी नहीं ।

-0-

 

 

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Responses

  1. मौसम के अनुरूप सुंदर हाइकु। बधाई !

  2. चिलचिलाती
    धूप का है क़हर
    सूनी डगर ।…….और …

    तुम जो मिले
    सूरजमुखी खिले
    रेगिस्तान में ।…जीवन के दोनों भावों को बहुत सुन्दरता से व्यक्त किया आपने !

    हार्दिक बधाई दीदी !

  3. ratnakar didi…garmi par sateek v sunder haiku … tum jo mile ne khaas man moh liya .bahut bahut badhai.

  4. चुप खड़े हैं
    पलाश-अमलतास
    रुके ज्यों साँस ।
    भीषण गर्मी का बड़ा सटीक वर्णन…|

    तुम जो मिले
    सूरजमुखी खिले
    रेगिस्तान में ।
    बहुत सुन्दर…|
    हार्दिक बधाई…|


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