Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 8, 2014

जीवन-चक्र


सीमा स्मृति

1

हुए जो माटी

पुन: खिल हैं जाते

 माटी ही संग ।

2

ओस की बूंद

बदली बन छाई

 झूमे गगन ।

3

 कौन हैं हम

 युगों से हैं, पूछते

अडिग  प्रश्न ।

4

हर लहर

टूटती किनारे पे

 हुई सागर ।

5

चक्र टूटता

प्रारम्भ नया चक्र

 यही जीवन ।

6

मूल हैं  साँसे

जीव रूप अनेक

 साधे न, सधे ।

 

है अनिश्चित

ये जीवनधारा

निश्चित डोर ।

8

अनूठा सत्

 हम हैं बिना डोर

कठपुतली ।

9

साँसे बनी हैं

यूँ सुरों का संगम

सुनों संगीत ।

10 

धारा प्रवाह

बहे जीवन-धारा

रूप अनेक ।  

-0-

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Responses

  1. sabhI bhAvpUrn haiku hai.
    khUb badhAI.

  2. सुंदर हाइकु …बधाई सीमा जी

  3. hue jo mati, punah khil jate hain, mati ke sang jeevan gati batata haikku bahut sargarbhit hai. anya haiku bhi bahut bhavpurn hain.seema ji apako badhai.
    pushpa mehra.

  4. अनूठा सत्‍य
    हम हैं बिना डोर
    कठपुतली ।

    Bahut katu saty…badhai meri or se

  5. hue jo maati…….shshvat saty liye……bahut khoob seemaji…. badhai

  6. ज़िंदगी के अलग-अलग सच…अलग-अलग रंगों को बयान करते हाइकु बहुत अच्छे लगे…बधाई…|


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