Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मई 1, 2014

पेट में आग


  डॉ सरस्वती माथुर

1

 जागो श्रमिक

 तुम ही हो निर्माण

 शक्ति के बाण  ।

2

खाली पतीली

 बुझा ठंडा चूल्हा है

पेट में आग ।

 3

ईंटें ढोकर

 इमारतें बनाईं

 तो रोटी खाईl

4

 धूप तपन

श्रमिक का तो बस

यही जीवन  ।

5

फूल सा हूँ मैं

शूलों पर ही सोता

स्वप्न संजोता ।

-0-

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Responses

  1. सभी हाइकु अति सुन्दर। डॉ माथुर को हार्दिक बधाई। देर से ही सही, हमने उस श्रमिक पर भी कलम चलाई, जो करता है इस दुनिया की भलाई। बिना वक़्त गंवाए उसकी शान में आज मैंने भी दो हाइकु लिखे हैं; ये सभी हाइकुकारों को समर्पित हैं :
    1. ” पसीना बहे / सभी कष्टों को सहे / तुझे सलाम। ”
    2. ” दिन ये तेरा / तुझे पता भी नहीं / श्रमिक भाई। ”
    ——————————————————-
    – सुभाष लखेड़ा

  2. बहुत बढ़िया हाइकु सरस्वती जी….बधाई !

  3. ” दिन ये तेरा / तुझे पता भी नहीं / श्रमिक भाई।
    sahi hai unko pata hi nahi hota ynhi ka din hai ye
    bahut khoob badhai
    rachana

  4. उत्कृष्ट हाइकू
    बधाई

  5. बहुत सुन्दर हाइकु…बधाई…|

  6. आईना दिखाते हुए हाइकु …. दिल को छू गए !
    हार्दिक बधाई सरस्वती जी !

    ~सादर
    अनिता ललित

  7. बहुत खूब भाई लखेड़ा जी !

  8. mArmik aur bhAvpradhAn haiku.
    badhAi.
    vinamra pranAm.


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