Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अप्रैल 29, 2014

कच्ची थी धूप


1-कृष्णा वर्मा

1

नारी अमूल्य

सृष्टि की जननी है

देवों के तुल्य ।

2

नि:स्वार्थ प्रेम

नारी की परिभाषा

जीवन -आशा ।

-0-

2-डॉ सरस्वती माथुर

1

कच्ची थी धूप

आँगन बुहार के

तरु पे चढ़ी l

2

खोल करके

सूरज  की चादर 

धूप  ने ओढ़ीl

3

नव प्रभात

धूप  भँवरों पर

हुआ मोहित l

4

धूप  के रंग

फुलकारी काढ़ते

धरा -चुन्नी पे l

5

प्रेत सी डोले

धरा – आँगन पर  

बौराई  धूप  l

-0-

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Responses

  1. कृष्णा वर्मा जी नारी पर दोनों हाइकु बहुत सुन्दर !
    हार्दिक बधाई आपको।

    ~सादर
    अनिता ललित

    सरस्वती माथुर जी बहुत सुन्दर हाइकु !
    हार्दिक बधाई
    ~सादर
    अनिता ललित

  2. कच्ची थी धूप
    आँगन बुहार के
    तरु पे चढ़ी l
    bahut sunder
    नारी अमूल्य
    सृष्टि की जननी है
    देवों के तुल्य ।
    sahi kaha aapne bahut khoob
    rachana

  3. कच्ची थी धूप
    आँगन बुहार के
    तरु पे चढ़ी l……बहुत खूबसूरत…..बधाई सरस्वती जी !

  4. naari amulya………kachchi thi dhoop……..bahut khoobsurat…..badhai krishnaji v sarswati ji ko

  5. “नारी अमूल्य ” ..और …”कच्ची थी धूप” .बहुत सुन्दर हाइकु
    हार्दिक बधाई कृष्णा जी एवं सरस्वती जी !

  6. बहुत सुन्दर हाइकु…आप दोनों को बधाई…|


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