Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अप्रैल 23, 2014

रो रही धरा


नवनीत राय रुचिर

(1)

धरा सबकी

काट रहे जंगल

महाविनाश।

2

रो रही धरा

कंकरीट का जाल

न हाथपाँव।

3

धरा विकृत

छलनी होती छाती

पेड़ लगाएँ।

4

हरी हो धरा

सब लगाएँ पेड़

बुझेगी प्यास।

-0-

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Responses

  1. सुंदर सार्थक हाइकु …नवनीत जी .

  2. भाव भरे हाइकु । बधाई

  3. पृथ्वी दिवस पर पृथ्वी की दशा दर्शाते सार्थक हाइकु, बधाई नवनीत जी।

  4. सार्थक सन्देश देते हुए सभी हाइकु !
    आपको बधाई नवनीत राय जी

    ~सादर
    अनिता ललित


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