Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अप्रैल 23, 2014

मन की गाँठें


भावना सक्सैना

1

खिंचें जब भी

अनकही लकीरें

बनें दरारें ।

2

संग विश्वास

अनजान सफर

खिलें बहारें।

3

नई भोर की

किरन सुनहरी

भरे विश्वास ।

4

मन की गाँठें

कितनी भी उलझें

खुलें स्नेह से।

-0-

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Responses

  1. मन की गाँठें
    कितनी भी उलझें
    खुलें स्नेह से।।

    बहुत भावप्रवण हाइकु भावना जी .

  2. sabhi marmik haiku.
    bahinji badhaai.

  3. मन की गाँठें
    कितनी भी उलझें
    खुलें स्नेह से।
    बहुत ही भावपूर्ण हाइकु । हार्दिक बधाई।

  4. हाइकु पसंद करने व मनोबल बढ़ाने के लिए धन्यवाद अनुपमा जी, नवनीत जी और सीमा जी।

  5. खिंचें जब भी
    अनकही लकीरें
    बनें दरारें ।
    हर रिश्ते का सच है ये…बधाई…|

  6. रिश्तों का, विश्वास का सत्य दर्शाते हाइकु ! सभी बहुत सुन्दर !

    हार्दिक बधाई भावना सक्सेना जी !!

    ~सादर
    अनिता ललित


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