Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अप्रैल 11, 2014

छाई उदासी


1-  सुदर्शन रत्नाकर

1

पतझड़ में

रूठ गई प्रकृति

छाई उदासी ।

2

तुम्हारे बिन

पतझड़ जीवन

रूठा वसंत ।

3

पत्र -विहीन

खड़े हैं पेड़ ऐसे

शापित जैसे।

4

फूल न पत्ते

कैसा यह मौसम

रूखा जीवन ।

5

कैसे आएगा

नहीं पतझड़ हो

नया मौसम ।

6

पतझड़ में

बिछुड़ तरु -पात

फिर न मिले ।

7

रूठी बहारें

प्रकृति शोकाकुल

पतझर में ।

8

सूखे सुमन

भँवरे अलसाए

लौट न आए ।

9

जग की रीत

पतझर के आते

रूठें हैं मीत ।

-0-

2-डा जया नर्गिस‘ 

1

मन-कोयल

गाए पतझर में

राग बहार

2

सब अपने

अन्दर ही बसंत

या पतझर

3

नये पत्तों की

सर-सर से डरे

क्यों पतझर

4

होंठ गुलाब

आँखों में पतझर

तेरा हुनर

5

पतझर में

बहारों की खनक

तुम्ही से बाकी

6

ऋतु खुद को

क्यूं देती है सजाएँ

लाके खिजाएँ

7

पतझर की

सौगातें,ज्यों बसंत

किताबी बातें

8

हो सोलह या

सत्तर,आयु माने

न पतझर

-0-

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Responses

  1. बहुत सुन्दर पतझर के हाइकु !
    जया नर्गिस जी, सुदर्शन रत्नाकर जी…बधाई !

  2. khoobsurat haiku ke liye aap dono ko badhai

  3. जग की रीत
    पतझर के आते
    रूठें हैं मीत ।
    जीवन का सत्य…कड़वा-सा…|

    हो सोलह या
    सत्तर,आयु माने
    न पतझर ।
    एक और सच्चाई…|
    बधाई…|


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