Posted by: डॉ. हरदीप संधु | अप्रैल 10, 2014

ऋतुएँ कहें-


8-CIMG05131-सुशीला शिवराण

1

जीवन चक्र

जन्म-यौवन-मृत्यु

मन क्यों व्यग्र !

2

खिज़ा-बहार

लाईं खुशियाँ-ग़म

मन के द्वार।

3

ऋतुएँ कहें-

सुख-दुःख सह के

चलता चल।

4

तरु निर्वस्त्र

पुकारें मधुमास

लाओ रे वस्त्र।

5

पल्लव बोले

रुत पतझर से

विदा हौले से।

6

झरते पात

कह गए शाख से

गा मधुमास।

-0-

2-मीनाक्षी धन्वन्तरि

1

धूसर पेड़

धूल भरी शाखाएँ

पत्तों पे गर्द

2

खुश्क से पत्ते

पैरों तले चीखते

मिटे पल में ।

-0-

23मंजुल भटनागर

1

पतझर -सा

जीवन क्रम बन

झर जाता है

2

कली खिली है

पतझर के बाद

थी आशावाद।

3

मन हो जाता

सूनी शाम अकेला

पतझर सा।

4

देखे   कितने

पतझर सावन

मौन अकेले।

5

बसंत मन

हो जाता पतझर

उड़ते पाखी।

6

द्वार खुले हैं 

पतझड़ पाँव थे 

चल ही दिए ।

7

न लिबास था

ठिठुरते ये तने

मौन खड़े थे।

8

झरते  झर

पतझर पात थे

जीवन गात।

9

बुद्ध सरीखा

महा बोधि तन्हा

प्रतीक्षा रत  

10

बसंत ओढ़

किसलय के  स्वप्न

ऊँघती रात ।

-0-

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Responses

  1. उत्कृष्ट हाइकु
    आप तीनों को बधाई .

  2. khoobsurat haiku…..badhai aap sab ko

  3. उत्कृष्ट हाइकु के लिए आप तीनों को बधाई


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