Posted by: डॉ. हरदीप संधु | मार्च 23, 2014

काँटे


1 ज्योत्स्ना प्रदीप

उदासी1

सहेजे मैने

तेरे दिये वो काँटे

कभी  ना बाँटे ।

2

मन उर्वरा

बोया बीज प्रेम का

आज है हरा ।

 -0-

2-सविता मिश्र -आगरा

1

माक़ूल नहीं, 

पिशाच हर कही

सँभल नारी ।

2

दोष खुद का

छिद्रान्वेषी मानव

भीड़ बने हैं।

-0-

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Responses

  1. आप दोनों का इस हरे भरे हाइकु परिवार बहुत स्वागत है ,

    उत्कृष्ट हाइकू के लिए बहुत बधाई .

  2. चारों हाइकु बहुत कोमल एवं दिल को छूने वाले हैं! ज्योत्स्ना प्रदीप जी, सविता मिश्र जी …आप दोनों को बधाई !

    सविता मिश्र जी आपका हार्दिक स्वागत है अपने हाइकु परिवार में !:)

    ~सादर
    अनिता ललित

  3. सुन्दर हाइकु…स्वागत है हाइकु परिवार में…बधाई व शुभकामनाएँ !!

  4. सविता मिश्र जी का हाइकु परिवार में हार्दिक स्वागत !
    ज्योत्सना जी, सविता मिश्र जी आप दोनों के बहुत मनभावन हाइकु !

  5. sabhi haiku bahut achhe likhe hain.jyotsna ji va savita ji ap dono ko badhai.
    pushpa mehra.

  6. manju gupta ji ,anita ji,rita ji,krishna ji,pushpa ji aap logo ka shrukriya utsah badhane ke liye…..savita ji ….bahut,,,,,,,,bahut swagat


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