Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 24, 2014

फिर जुड़ता नहीं


मंजु मिश्रा

1

टूटा तो टूटा

फिर जुड़ता नहीं

शीशा दिल का ॥

2

चाहे जो करो

बनती नहीं कभी

बिगड़ी बात  ।

3

न जाने कब

चांदनी ने लिखे थे

बेपता ख़त  ।

4

पहुँचे नहीं

जो कभी ख्वाबों तक

ग़ुम ही रहे  ।

5

चुभती रही

कील जैसी  मन में,

अधूरी आस  ।

 -0-

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Responses

  1. बहुत सुन्दर… दिल को छूते हाइकु !
    बधाई मंजू मिश्रा जी !

    ~सादर
    अनिता ललित

  2. sabhi haiku bahut ache likhe hain. manju ji apako bahut badhai.
    pushpa mehra.

  3. अधूरी आस
    गुम हुए ख्वाब
    ग़मगीन हैं ।

    यथार्थ को कहते सुन्दर हाइकू ।

  4. सभी पाठक मित्रों को बहुत बहुत धन्यवाद !
    सादर
    मंजु

  5. चुभती रही
    कील जैसी मन में,
    अधूरी आस । सभी हाइकु भावपूर्ण | यह विशेष | बधाई मंजु जी |

    शशि पाधा

  6. आपकी भाव पूर्ण रचनाएँ मुझे सदा मोह लेती हैं मंजु जी …सभी हाइकु सुन्दर हैं ..लेकिन

    पहुँचे नहीं
    जो कभी ख्वाबों तक
    ग़ुम ही रहे । ……बहुत प्रभावी …बधाई स्वीकारें !!

  7. चुभती रही
    कील जैसी मन में,
    अधूरी आस …..सभी हाइकु भावपूर्ण

  8. chubhti rahi man mein keel …….waah manju ji sabhi haiku bahut hi pyre….badhai

  9. बहुत सुन्दर…मन को छूते हुए हाइकु के लिए हार्दिक बधाई…|


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