Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | जनवरी 31, 2014

सूर्य का रथ


ऋता शेखर ‘मधु’

1

जोशीले पग

वतन के रक्षक

रुकें न कभी।

2

रुकें न कभी

धड़कन दिलों की

सूर्य का रथ।

3

सूर्य का रथ

उजालों की सवारी

धरा की आस।

4

धरा की आस

नभ से मिली नमी

उर्वर हुई।

5

उर्वर हुई

सुनहरी बालियाँ

स्वर्ण जेवर।

6

स्वर्ण जेवर

झनके झन झन

वधू-कंगना।

7

वधु कंगना

झूम उठे अँगना

घर की शोभा।

8

घर की शोभा

मर्यादा का बंधन

गृह रक्षित।

9

गृह रक्षित

देहरी पर दादा

अनुशासन।

10

अनुशासन

घर का आभूषण

घर चमके।

11

घर चमके

अमृत वाणी बूँद

सदा अमर।

-0-

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