Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जनवरी 31, 2014

जगी मन की पीड़ा


कश्मीरी लाल चावला
1
मन उमंग
गहरे सागर की
एक तरंग ।
2
मन -आवाज
उठी जो धडकन
जग लहर ।
3
मन का पंछी
उडे दूर आकाश
नही ठिकाना ।
4
लिखे जो गीत
जगी मन की पीड़ा
बनी है नदी ।
5
जग नाम है
दिल की धड़कन
चले संसार ।
6
मन के फूल
अर्पण जब किए
फैली खुशबू ।
7
चुप का गीत
बेमौसम आवाज
कौन सुनेगा ।
-0-

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