Posted by: डॉ. हरदीप संधु | जनवरी 19, 2014

रूठी है धूप


अनुपमा त्रिपाठी 

1

 छाई है धुंध

ओझल है आकृति

तन ठिठुरे  ।

2

रूठी है धूप

बादलों में छुपी

मनाऊँ कैसे !

3

धुँधलका है 

यादों का डेरा जैसे 

भरमाया है 

4

सुधियाँ मेरी  

धुँधली भले ही हों 

मैं भूलूँ कैसे 

5

धुन्ध ही धुन्ध 

चारों तरफ यूँ छाई 

याद है आई 

6

नहीं दिखता 

क्यों अपना भी साया, 

तूने भुलाया !

7

नहीं दिखता

क्यों  अपना पराया 

कोहरा छाया 

-0-

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Responses

  1. नहीं दिखता
    क्यों अपना पराया
    कोहरा छाया ।

    मौसम पर छाए कोहरे को मन की धुँध से मिलाकर बहुत सार्थक हाइकु रचे हैं अनुपमा जी ने…सादर बधाई!!

  2. बहुत सुन्दर सभी हाइकु ! ठण्ड और धुंध को बड़ी ख़ूबसूरती से उतारा आपने अनुपमा जी..

    ~सादर
    अनिता ललित

  3. बहुत सुन्दर हाइकु !

  4. बहुत सुन्दर…

  5. हृदय से आभार हरदीप जी एवं हिमांशु भैया जी …मेरे हाइकु यहाँ दिये ….!!

  6. कोहरे के कहर की सुन्दर प्रस्तुति …

    रूठी है धूप
    बादलों में छुपी
    मनाऊँ कैसे !….बहुत सुन्दर !!

  7. नहीं दिखता
    क्यों अपना पराया
    कोहरा छाया ।
    बहुत सुन्दर…बधाई…|

  8. नहीं दिखता
    क्यों अपना पराया
    कोहरा छाया ।

    ऐसा ही होता है। गहन अर्थ लिए बहुत सुन्‍दर हाइकु


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