Posted by: डॉ. हरदीप संधु | दिसम्बर 18, 2013

ख़ुशबू बाँटो


डॉ सुधेशडा.सुधेश

1

प्यार अब है

सजी बैठक बीच

काग़ज़ी फूल ।

2

अध्यापक है

एक घिसा रिकार्ड,

जो अनसुना ।

3

कली खिली क्या !

भँवरे रसलोभी

पगलाए हैं ।

4

सुख के साथी

प़कट शत्रु पर

न्यौछावर हैं ।

5

चिकने मुखड़े

पल भर के सुख

जी के दुखड़े ।

6

आँख बाज़ की

झपट चील की तो,

कौन बचेगा?

7

जितने ऊँचे,

उतने ही वीराने

खड़े ताड़ ये ।

8

कैसा युग है !

गधे निकल भागे,

घोड़ों से आगे ।

9

कैसे बादल

चोटी पर बरसे

मरु हैं प्यासे ।

10

नई कोंपलें

शीश उठा कहतीं-

‘नित्य खिलना।’

11

खिले सुमन

झर -झर कहते-

‘ख़ुशबू बाँटो।’  

12

सूखा पत्ता भी

कुचले जाने पर,

शोर मचाता ।

13

नव कलियाँ

झर झर कहती

कौन अमर ।

14

 नभ के तारे

रूप देखती मानो

मेरी दो आँखें ।

-0-

परिचय

डॉ सुधेश

 जन्म: 6जून सन  1933 , जगाधरी  ज़िला अम्बाला (हरियाणा ) ,

दिल्ली  में सन 1975 से । अत: दिल्ली वासी ।

प्रकाशन : काव्य कृतियाँ -11

                 – फिर सुबह होगी ही  ,घटनाहीनता के विरुद्ध , तेज़ धूप , जिये गये शब्द , गीतायन ( गीत और ग़ज़लें ) ,बरगद ( खण्डकाव्य ) ,निर्वासन ( खण्ड काव्य ) ,जलती शाम (काव्यसंग़ह) ,सप्तपदी , खण्ड ७(दोहा संग़ह ) ,हादसों के समुन्दर ( ग़ज़लसंग़ह )  , तपती चाँदनी ( काव्यसंग़ह )

आलोचनात्मक पुस्तकें :10

आधुनिक हिन्दी और उर्दू कविता की प्रवृत्तियाँ , साहित्य के विविध आयाम, कविता का सृजन और मूल्यांकन ,साहित्य ,सहज कविता ,स्वरूप और सम्भावनाएँ , भाषा ,साहित्य और संस्कृति ,राष़्ट्रीय एकता के सोपान ,सहज कविता की , चिन्तन अनुचिन्तन ,  हिन्दी की दशा और दिशा  

   विविध प़काशन :

     तीन यात्रा वृत्तान्त ,दो संस्मरण संग़ह,एक उपन्यास,एक व्यंग्यसंग़ह , एक आत्मकथा  प़काशित । कुल 29 पुस्तकें प़काशित । 

प़ाप्त पुरस्कार  , सम्मान   मध्यप़देश साहित्य अकादमी का भारतीय कविता पुरस्कार  2006,     भारत सरकार के सूचना प़सारण मंत्रालय का भारतेन्दु हरिश्चन्द़ पुरस्कार 2000

     लखनऊ के राष्ट़़धर्म प़काशन  का राष्ट़़धर्म गौरव सम्मान  2004,  आगरा की नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा सार्वजनिक अभिनन्दन  2004

 जीवनी – बचपन जगाधरी ,देवबन्द में बीता ।शिक्षा देवबन्द, मुज़फ़्फ़रनगर , देहरादून पाई । एम ए हिन्दी में (नागपुर वि वि )  पीएच डी  आगरा विवि से । उ प्र के तीन कॉलेजों में अध्यापन के बाद दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू वि वि में 23 वर्षों तक

 अध्यापन । प़ोफेसर पद से सेवानिवृत्त । तीन बार विदेश यात्राएँ । अब स्वतन्त्र लेखन ।

314 सरल अपार्टमैन्ट्स ,द्वारका सैक्टर 10,नई दिल्ली 110075

 

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Responses

  1. आँख बाज़ की
    झपट चील की तो,
    कौन बचेगा?

    कैसा युग है !
    गधे निकल भागे,
    घोड़ों से आगे

    वाह ! बहुत ही सुन्दर हाइकू हैं आपके डॉ. सुधेश जी … और ये दो तो सबसे अधिक पसंद आये….. एकदम सही कहा आपने, बाज की आँखों से भला कौन बचा है …… और आज के युग में तो सब कुछ उलटी गंगा ही है …एकदम सही है गधे घोड़ों से आगे निकल रहे हैं … आरक्षण ने सब उलट पुलट कर डाला है …

  2. उत्कृष्ट हाइकु

    आज हिंदी साहित्य के हस्ताक्षर से परिचय हुआ .स्वागत के साथ –

    बधाई .

  3. हाइकु तो सुन्दर हैं ही, परन्तु आद. सुधेश जी का हाइकु के मंच पर आना बहुत अच्छा लगा। हां, दूसरे हाइकु की प्रथम पंक्ति में एक वर्ण कम रह गया है।

  4. डा. सुधेश जी,
    रचनाएं बहुत सुन्दर….
    #2 अैार #5 के पहले लाइन में अक्षर के संख्या नहीं मील रहा है ।

  5. डॉ सुधेश जी को प्रणाम ! अनुभवों से ओत – प्रोत और आधुनिक जीवन का चित्रण करते ये हाइकु अंतर को छू रहे रहे हैं लगता है आप सामने बैठे हुए कुछ कह रहे हैं। ” दौड़ते रहे / दौड़ में न पिछड़े / बिछड़ गए। “

  6. जीवन के विभिन्न अनुभवों को समेटे इन सुन्दर हाइकु के लिए हार्दिक बधाई…और स्वागत भी…|

  7. सभी हाइकु बहुत बढ़िया ! डा० सुधेश जी….स्वागत एवं हार्दिक बधाई !

  8. sudhesh ji aapka hardik swagat ..aapke sabhi haiku bahut LAJAWAB

  9. सभी हाइकु सुन्दर एवं आजकल के हालात का चित्रण हैं!
    बधाई आपको …. आदरणीय डॉ सुधेश जी…आपका हाइकु परिवार में स्वागत है !
    ~सादर
    अनिता ललित

  10. सभी हाइकु एक से बढकर एक भावपूर्ण…

    नव कलियाँ
    झर झर कहती
    कौन अमर ।

    सुधेश जी को सादर प्रणाम!

  11. ् महादोषी जी आभार !सुधार कर दिया गया है ।

  12. Reblogged this on डा सुधेश.


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