Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 14, 2013

पंजाबी हाइकु और हाइकु -लोक


पंजाबी हाइकु  और हाइकु -लोक
डॉ हरदीप कौर सन्धु

 हाइकु जापानी विधा की दुनिया में सबसे छोटी मानी जाने वाली कविता है । नाज़ुक-सी एवं एक साँस में बोली जाने वाली कविता । 19 वीं शताब्दी के अंत में मासाओका शिकी ने पुराने होकू (hokku )  काव्य को जो हाईकाई / रेंगा (haikai/renga) का शुरू का भाग होता था,  हाइकु में तबदील करके इसको 5 +7 +5 का आधुनिक रूप दिया । 

        अगर किस तथ्य को कुछ लफ्जों में पेश किया जा सकता है तो लम्बी भूमिका बाँधने की ज़रूरत नहीं होती । अनकहा लफ़्ज़ कहे हुए सभी लफ्ज़ों से ज्यादा कीमती होता है । इसी प्रकार से हाइकु  17 स्वरयुक्त ध्वनि इकाइयों =वर्णिक संरचना ( ओन्जि)में निहित काव्य है जो 5 + 7 +5 करके तीन पँक्तियों में  है । इसमें ‘कहे’ से ‘अनकहा’ ज्यादा होता है । जो नहीं कहा गया, पाठक को  उसका खुद सृजन करना है । हाइकु तीज के चाँद की तरह है जो थोड़ा दिखाई देता है और इसका ज्यादा हिस्सा छुपा रहता है । इसे पाठक को  अपनी कल्पना शक्ति से पूर्णिमा का चाँद बनाना होता है । 

          हाइकु समुद्र में तैरते  हिमशैल के समान भी माना जा सकता है । जिसका थोड़ा हिस्सा हमें पानी की सतह के ऊपर दिखाई देता है ;जबकि ज्यादा हिस्सा पानी के नीचे छुपा रहता है । ठीक इसी तरह से हाइकु में  5 + 7 +5  की वर्णिक संरचना  में कुछ हिस्सा दिखाई देता है ;जबकि कवि की संवेदना और अनकहा संदेशा छुपा रहता है । अगर आप हाइकु को ज्यादा भरोगे तो आपके संदेशे के आन्तरिक  भाव अर्थहीन हो जाएँगे । इसीलिए बेहतर यही है कि हाइकु को हिमशैल के समान – थोड़ा कहा और जितना हो सके पानी की सतह के नीचे छुपा हुआ, पाठक की कल्पना शक्ति के अनुसार सर्जन के लिए छोड़ दिया जाए । अगर आपके पास अनकहे को समझने की क्षमता है ,तो आप तीन पँक्तियों में 3 -4 पन्नों वाली कविता से भी ज्यादा आनंद ले सकते हैं । हाइकु एक छोटे बीज जैसा होता है। जैसे नन्हें बीज में वृक्ष का स्वरूप और रहस्य छुपा रहता है ,उसी तरह एक हाइकु उस पल के रहस्य को अभिव्यक्त करता है ; जिसने कभी हाइकुकवि को प्रभावित किया होगा। दिन प्रतिदिन के छोटे-छोटे व्यवहारों को सुन्दर और सार्थक शब्द की लड़ी में पिरोकर, जब हाइकुकवि हमारे आगे परोसता है ,तो हम उस पल से आनन्दित हो , वहाँ रुकने के लिए विवश ज़रूर हो जाते हैं। हाइकु हमारी दृष्टि तथा सोच को कभी अम्बर बना देता है, तो कभी मन के चहचाहते पंछियों को उड़ने के लिए नए एवं नाज़ुक पंख लगा देता है।हाइकु हमारे मन में अपने परिवेश को ध्यानपूर्वक देखने की रुचि पैदा करता है। हम जिंदगी के सूने रास्तों पर अकेले चलते हुए भी कभी अपने आप को अकेला नहीं पाते ; क्योंकि हम सारी कायनात को अपने साथ लिये जो चल रहे होते हैं। कठिन राहों में बिखरी काली रातों में भी हम टिमटिमाते हुए तारे चुनकर अपनी झोली में भरने की कोशिश में लगे रहते हैं। मैं तो बस इतना ही कहूँगी कि हाइकु हर छोटे नुक़्ते को विशालता प्रदान करता हुआ हाथ में आए सूत्र से पूरे ताने बाने तक पहुँचने का हमें रास्ता दिखाता है।

         हाइकु लेखन हमारे परिवेश  में होने वाली सादा तथा सरल बातों को प्रस्तुत करने की कला है । हाइकु की कई परतें होती हैं , इसको जितनी बार पढ़ा जाए ,इसके अर्थ और गहरे होते चले जाते हैं। हाइकु आपकी आँखों के सामने घटित होते  किसी क्षण की पकड़ भी करता है । हमारे लिए यह जिंदगी हमेशा सामान्य जैसी रही है । अपने परिवेश में जो कुछ हो रहा है , हम उसे देखकर भी अनदेखा कर देते हैं । मगर एक हाइकु कवि के मन पर ये अमिट छाप छोड़ जाता है । वह इसे हाइकु -काव्य में बाँधकर हमारे लिए पेश करता है । हाइकु का मनोरथ हमें आम जिंदगी से मिलने वाले अमूल्य उपहारों के बारे में जानना तथा उनसे आनंदित होना भी सिखलाना है । 

         हाइकु जापानी भाषा से विश्व की अन्य भाषाओं में गया । भारतीय भाषाओं में हिन्दी ने उसे जापानी व्यवस्था के अनुसार ग्रहण किया है । इसकी शुरुआत गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 1916 में अपनी जापानी यात्रा के बाद लिखे ‘जापानी जात्री’ नामक  सफरनामे में बंगाली भाषा में हाइकु के बारे में जानकारी देकर की थी । आपने बाशो के हाइकु का बंगाली भाषा में अनुवाद भी किया । आपके एकत्र किए हुए होकू आपकी पुस्तक ‘अचनचेत उड़ारियाँ’ में शामिल हैं । हाइकु के क्षेत्र में ‘हिन्दी का प्रथम हाइकु कवि बाल कृष्ण बालदुआ माने जाते है ,जिन्होंने 1947 में अनेक हाइकु लिखे । उदाहरण स्वरूप एक हाइकु देखा जा सकता है-  

बादल देख 

खिल उठे सपने

खुश किसान ।[परिषद् -पत्रिका अंक अप्रैल 2010 -मार्च 2011,पृष्ठ-182 ]

प्रो सत्यभूषण वर्मा ( पूर्व विभागाध्यक्ष , जापानी भाषा विभाग , जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय, नई दिल्ली ) को हिंदी भाषा में हाइकु को स्थापित करने वाला माना जाता है । आपने जापानी हाइकु का हिंदी में अनुवाद ‘जापानी कविताएँ’ 1977 में प्रकाशित किया । 1981 में आपने अन्तर्देशीय  ‘हाइकु पत्रिका’ शुरू की जिसमें हिंदी , पंजाबी तथा अन्य भारतीय भाषायों के हाइकु प्रकाशित होते थे ।एकल संकलन  के रूप में डॉ भगवत शरण अग्रवाल (शाश्वत  क्षितिज-1985)   में और डॉ सुधा गुप्ता (ख़ुशबू का सफ़र-1986)  में आया।

     पंजाबी में हाइकु लेखन की शुरुआत बीसवीं शताब्दी के आरंभ में प्रो पूर्ण सिंह के बाशो , इस्सा तथा बुसोन के होकू का पंजाबी में अनुवाद से हुई । अमृता प्रीतम ने हाइकू का पंजाबी अनुवाद अपनी पत्रिका ‘नागमणी’ में प्रकाशित किया । डॉ वणजारा सिंह बेदी की पत्रिका ‘परंपरा’ के दिसम्बर 1979 अंक में हाइकु तथा पंजाबी माहिया का तुलनात्मक अध्ययन प्रकाशित हुआ । पंजाबी की मैगज़ीन ‘प्रीतलड़ी’ में 1976 – 77 के अंकों में भी हाइकु प्रकाशित होते थे । उदाहरण स्वरूप एक हाइकु देखा जा सकता है-

बेरोज़गारी 

आज़ादी दे झंडे नू 

लगी सिउंक – (अज्ञात)

डॉ सत्यनन्द जावा ( एक्स डाएरेकटर, संस्था विदेशी भाषाएँ) ने पंजाब की लोक-धारा को हाइकु रूप में पेश किया । आपने पंजाबी, हिंदी ,उर्दू तथा सिन्धी भाषा में हाइकु लिखे । इनके सिवा पंजाबी हाइकु लेखन में मोहन कटयाल, उर्मिला कौल, सत्यपाल चुघ, देवकी अग्रवाल इत्यादि नामों का ज़िक्र मिलता है । 

      2000 के आस -पास कश्मीरी लाल चावला ने मुक्तसर हाइकु ग्रुप बनाया तथा पंजाबी में हाइकु लिखने शुरू किए । 2001 में परमिन्दर सोढी की किताब ‘जपानी हाइकु शायरी’ आई जिसमें आपने जापानी कवियों के हाइकु का पंजाबी में अनुवाद किया । यह अनुवाद तो था मगर हाइकु नहीं । अमरजीत सिंह टिवाणा ने इस किताब से प्रभावित होकर 2007 में पंजाबी हाइकु ब्लॉग बनाकर हाइकु के प्रसार के लिए काम किया । इस प्रभाव के अधीन पंजाबी मे लिखा गया  हाइकु 5 + 7 + 5 छंद वाला अपना स्वरूप खो चुका था । 

    हाइकुछंद के अनुसार सत्रह वर्णिक  5 + 7 + 5 खंडों में लिखे जाने वाले हाइकु रूप के प्रसार के लिए डॉ हरदीप कौर सन्धु के द्वारा 2012 में ‘हाइकु -लोक ‘ वैब पत्रिका शुरू की गई । आज तक यह  36 देशों में पहुँच चुका है और 46 के करीब रचनाकार इससे जुड़ चुके हैं । यह वेब पत्रिका पंजाबी हाइकु ने साथ -साथ जापानी काव्य की अन्य शैलियाँ जैसे हाइगा, ताँका, सेदोका तथा चोका भी प्रकाशित करता है । 26 जून 2012 से लेकर  9 सितम्बर 2014 तक 424 पोस्टों में 1020 हाइकु, 54 हाइगा, 107ताँका,60 सेदोका एवं 17 चोका  एवं 16 हाइबन प्रकाशित हो चुके हैं । पंजाबी हाइकु में छंदनुशासन का पालन करते हुए हिंदी से पंजाबी अनुवाद तथा बाशो -इस्सा के हाइकु अनुवाद भी इस वैब पत्रिका का शृंगार बने हुए हैं । कुछ अनुवाद गुरमुखी और देवनागरी लिपियाँ में प्रकाशित किए गए हैं ताकि दोनों भाषाएँ जानने वाले इनका आनन्द ले  सकें । 

1-बाशो 

the old pond  / frog jumps in / splash

पुराणा टोभा /डडू लाई टपूसी /छप -छपाक ।

( अनुवाद डॉ हरदीप कौर सन्धु )

2-इस्सा –

gimme that moon / cries the crying /child

रो -रो के मन्गे  /औह चन्न मैं लैणा  /बच्चा चिलावे ।

( अनुवाद डॉ हरदीप कौर सन्धु )

हिंदी –

1-डॉ सुधा गुप्ता 

रात होते ही / कोहरे से लिपट / सोया शहर।   

रात हुंदियाँ  / कोहरे ‘च लिपट /सुत्ता शहर ।

( अनुवाद डॉ हरदीप कौर सन्धु )

-0-

2-डॉ भगवतशरण अग्रवाल 

रेत पै बस /लिखूँ मिटाऊँ नाम /और क्या करूँ।

रेत ते बस /लिखां मिटावां नाम /होर की कराँ ।

( अनुवाद डॉ हरदीप कौर सन्धु )

 

आज का हाइकु जापान की सरहद फाँदकर पूरी दुनिया में फ़ैल चुका है । इस पर आधुनिक रंग चढ़ना स्वाभाविक है । हाइकु चाहे एक साधारण सी बात को दर्शाता है, मगर इसमें अर्थ विस्तार की बहुत सी संभावनाएँ होने के कारण ये बहु -अर्थी बन जाता है । इसके विषय उसकी भाषा के साहित्य एवं काव्य से मिलते होते हैं । पंजाबी हाइकु पंजाब की सभ्यता तथा परम्परा  की बात करता है । पंजाब के गाँव की तस्वीर पंजाबी हाइकु बखूबी चित्रित करता है । भोर की लालिमा के साथ गाँव के गुरुद्वारा से कीर्तन, चिड़ियों की चीं -चीं, मुर्गे की बाँग , बैलों के गले की घंटियाँ तथा चाटी में घूमती मधानी का सुर साफ़ सुनाई देता है । 

1-अमृत वेला /गुरबाणी गूँजती /चिड़ी चूकदी – डॉ हरदीप कौर सन्धु 

2-चिड़ियाँ चीं -चीं /बैल गल टलीयाँ /अमृत वेला – प्रो हरिन्दर कौर सोही 

3-बलदां गले /टलीयाँ खडकण /टुटदी चुप – कश्मीरी लाल चावला 

4-बाहीं चूड़ीयाँ /नढी दूध रिड़के /पीड़े सजदी – प्रो हरिन्दर कौर सोही 

हाइकु प्रकृति की भाषा में बात भी करता है । ऋतु को हाइकु की आत्मा भी माना गया है । बदलती ऋतुएँ हमारे सहज -आस्वाद को प्रभावित करती हैं । पंजाबी हाइकु में जेठ – आषाड़ में पड़ती असह्य गर्मी, प्यासी धरा तथा पक्षियों का जिक्र मिलता है –

1-वगदी लोअ / लोहडियाँ दी तत्ती / घर न बत्ती – वरिन्दरजीत सिंह बराड़ 

2-धरत त्रेही / चूकदी ए पाणी नू / चिड़ी रंगीली – प्रो दविन्दर कौर सिद्धू 

3-जेठ महीना /धूप चिंगआड़ीयाँ /खूब वरीयाँ – रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ 

सावन – भादों में प्यासी धरती पर वर्षा होती है । बदल रहा मौसम हाइकु में बोलता है – पीपल पर पींग, तीज तथा त्रिंजण लगता है । घोसलों में चीं -चीं सुनाई देती है , मोर नृत्य करने लगता है  तथा पक रहे मीठे पकवान की ख़ुशबू आँगन भर देती है । 

1-आवे छटाका /चलदे परनाले /वगदा पाणी – प्रो नितनेम सिंह 

2-लंमीयाँ राताँ /त्रिंजण दीयाँ गलां /तारियाँ दी लो – प्रो दविन्दर कौर सिद्धू 

3-मींह वरदा /सारा दिन नहा के /लहे न चाअ – वरिन्दरजीत सिंह बराड़ 

4-साउण झड़ी /पकाए गुलगुले /महक खिड़ी – डॉ हरदीप कौर सन्धु 

5-मोरां दी पैल /सीतल हवा संग /झूमण सिट्टे – दीपी सैर 

6-दूर दे सुर/किलकारीयाँ संग  /बोहडी पींगाँ – दलवीर गिल्ल 

बसंत ऋतु में फूलों के साथ खुशियाँ खिलती हैं और फसलें पक जाती हैं । सर्दी में बेशुमार पड़ती ठंड में जिंदगी चुप -सी हो जाती है । पंजाबी हाइकु में लोहड़ी, राखी , वैशाखी, दशहरा , दीवाली , ईद तथा बसंत के मेले लगते हैं –

1-बसंत रुत /चारे पासे ख़ुशबू /तेरा आउणा – डॉ श्याम सुंदर दीप्ति 

2-सरद हवा /विहड़े बैठी कम्बे /खूंजे ‘च बेबे – हरकीरत हीर 

3-चड़दी धुप्प /विहड़े मंजी बैठी /बेबे है चुप – डॉ हरदीप कौर सन्धु 

4-ईद दा दिन/बज़ाराँ ‘च रौणक /ख़ुशी दे मेले – सुप्रीत कौर सन्धु 

5-दीवाली रात /चलाउण पटाके /खिंडे चानण – वरिन्दरजीत सिंह बराड़ 

6-गुरुदवारे /वडेरियाँ दा दीवा /बेबे जगावे – भूपिन्दर सिंह 

7-लोहड़ी रात /मघदीयाँ धूणीयाँ /सुटदे तिल – डॉ हरदीप कौर सन्धु 

8-भैण बनदी /इक प्यारा सा धागा /वीरे दे गुट – सुप्रीत कौर सन्धु 

गाँव में फेरी लगाते रास्ते में उड़ती धूल, बैलगाड़ी पर बैठा बाबा, साथ में बूढ़े पीपल के नीचे ताश खेलते बाबा, गाँव की छोटी दुकान (हट्टी) और भट्ठी, कुँए से पानी भर रही किशोरियाँ, शाम के समय इकट्ठे खेलते बच्चे भी पंजाबी हाइकु में दिखाई देते हैं । यहाँ गेहूँ, मकई , बाजरा तथा कपास खिलती है । यहाँ कौआ, कबूतर, तोते , चिड़िया, ऊल्लू, कोयल तथा गीदड़  अपने स्वरों से वातावरन जीवन्त कर देते हैं । 

1-मिट्टी उड़ावाँ /घर वल आऊँदे /मटैली शाम – दिलजोध सिंह 

2-ताई दी भट्ठी /आऊँदे ने नियाणे /झोली ‘च दाणे -डॉ हरदीप कौर सन्धु 

3-हट्टी ‘ते जाणा /अठ्ठ आने दा सौदा /रूँगा लै खाणा – डॉ हरदीप कौर सन्धु 

4-खेतों चुगदी /सुबक जिही नार / खिड़ी कपाह – डॉ हरदीप कौर सन्धु 

5-पूरणमाशी /कूकदे ने गिदड़ / वेख शिकार – सुप्रीत कौर सन्धु 

6-नित्त उड़ावाँ /बनेरे बैठा काग / बुलीं तेरा नाँ – बजवा सुखविन्दर 

7-उल्लू बोलदे /रात दे चौकीदार /जागदे रहो – कश्मीरी लाल चावला 

8-कोयल बोले /गावे मिठ्ठे तराने /अँबाँ उपर – प्रो नितनेम सिंह 

पंजाबी हाइकु में सामाजिक रीति -रिवाज़ भी जीवत हैं , किसान की समस्याएँ , बदलते वातावरण से लुप्त  होते पक्षियों की चिंता एवं बदल रहे पंजाब का रूप  देखने को मिलता है । प्रवासियों के जीवन की झलक तथा साथ ही उनकी इंतजार में बैठे उनके पुश्तैनी  घर जहाँ बेबे के सन्दूक -चर्खे तथा बापू  के लठ की सरदारी थी । 

1-मंजीयों लाही /बेबे अंतिम साहीं /कम्बण छताँ – हरकीरत हीर 

2-धी माँ नू रोवे /जलेबीयाँ पकण /हसण पुत्त – रणजीत सिंह प्रीत 

3-चिड़ी बनेरे /सस मथ्थे तिउड़ी /नूँह पेट तों – कमल सेखों 

4-निक्की चिड़िये /बह साडे विहड़े /मसां दिसी एँ – श्याम सुंदर अग्रवाल 

5-रुखाँ दी भीड़ /चल रही कुहाड़ी /भालदे मींह – महिन्दरपाल मिन्दा 

6-सावण रुते /मोबाइल फोन ‘ते /लम्बीयाँ गल्लाँ – दिलजोध सिंह 

7-दादी दी बात /टी.वी.ने खोह लई /मिठ्ठी सुगात – हरभजन सिंह खेमकरनी 

8-पुशती घर /डिओड़ी बापू बैठा / मंजे ‘ते खूँडा – जोगिन्दर सिंह थिंद 

9-विदेशी पुत्त /सवेरियाँ दे सुत्ते /रातीं जागण – जनमेजा सिंह जौहल 

प्रकृति के दृश्य हाइकु की पहचान है और ये कुदरत के नज़ारों को देखने का झरोखा भी माना जाता है ।  ऐसे लगता है जैसे अंबर, तारे, चाँद,सूर्य, वृक्ष, फ़ूल, टहनियाँ, घास, ओस की बूँदे , वर्षा तथा हवाओं ने कोई जादू भरा राग छेड़ रखा हो । जापानी हाइकु की तरह पंजाबी हाइकु  शान्त और चुप नहीं है ।इसमें जश्न मनाए जाते हैं, गिद्धा -भंगड़ा के साथ ढोल बजता है-

1-सुच्चे मोती ने /चिट्टे गुलाब उत्ते / त्रेल तुपके – कमल सेखों 

2-फुल्ल खिडिया /टाहणी झुक गई /खुशबू अग्गे – जनमेजा सिंह जौहल 

3-तेज़ बारिश /धोता गया गरदा /रखीं जमिया- दलवीर गिल्ल 

4-चले गभरू /विसाखी नहाउण /मोडे ‘ते डाँगाँ – जोगिन्दर सिंह थिंद 

5-तीयाँ दा पिड़ /मच्चे गिद्धे दी लाट / पैण बोलीयाँ – डॉ हरदीप कौर सन्धु 

पंजाबी हाइकु की रौशनी को पूरी दुनिया में फैलाने के लिए ‘हाइकु -लोक’ एक छोटा सा प्रयास है । इस काव्य विधा को प्रफुल्लित होने के लिए आप सब के प्यार तथा प्रोहत्सान की जरूरत है । 

डॉ हरदीप कौर सन्धु 

(सिडनी -बरनाला )  

http://haikulok.blogspot.com.au 

 

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Responses

  1. सुन्दर सार्थक जानकारी के लिए हार्दिक धन्यवाद आपको |हाइकु ,हिंदी हाइकु ,पंजाबी हाइकु और फिर पंजाब की संस्कृति की मनोहर छटा दिखाई है आपने हरदीप जी …बहुत बहुत बधाई …शुभ कामनाएँ !!

  2. Hardiip bahan ji Haiku ke vishay main jankari dene ke liye aapko hardik dhanyavad. Panjabi haiku ke dvara panjabi sanskriti ko kam se kam shabdon main pirona bhavpurn hai. Haiku jagat ka yah sarahniya karya hai.

    _Pushpa mehra
    i.

  3. bahut sunder tarike se likha gaya lekh jo tamam jankari samere hain aapko bahut bahut badhai
    rachana

  4. वाह बहुत सुन्दर बेहद ज्ञान वर्धक जानकारी , संकलन करने के लिए है , बधाई
    संधू जी

    2013/10/13 “हिन्दी हाइकु(HINDI HAIKU)-‘हाइकु कविताओं की वेब पत्रिका’-2010

  5. बहुत पसंद आई , — हार्दिक शुभकामनाये – शशि पुरवार

    2013/10/15 Shashi Purwar

    > वाह बहुत सुन्दर बेहद ज्ञान वर्धक जानकारी , संकलन करने के लिए है , बधाई
    > संधू जी
    >
    >
    > 2013/10/13 “हिन्दी हाइकु(HINDI HAIKU)-‘हाइकु कविताओं की वेब पत्रिका’-2010
    > से प्रकाशित हो रही है। आपकी हाइकु कविताओं का स्वागत है !” <

  6. बहुत सार्थक और ज्ञानवर्धक जानकारी है…बहुत बधाई और आभार इसे सांझा करने के लिए…|

  7. महत्त्वपूर्ण आलेख…!

    मेरे हाइकुओं का भी पंजाबी में अनुवाद करके… उन्हें शामिल किया, इसके लिए हार्दिक आभारी हूँ…!


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