Posted by: हरदीप कौर संधु | मई 5, 2013

उचाट मन


ज्योत्स्ना प्रदीप

1

सपने सारे

कच्ची बेल -से फैले

ले के सहारे ।

2

तुम मेरे हो

लोगों से सुनते हैं

लगा ही नहीं ।

3

जीवन बीता

वो कभी बनी राधा

तो कभी सीता ।

4

हरी तुलसी

हरि से मिलने की

एक पुल -सी ।

5

अनोखा दण्ड

मेघों के अश्रुओं में

नहाती धरा ।

6

मानस-सिन्धु

मंथन करे भाव

हर रोज़ ही ।

7

उचाट मन

बतियाता रहता

मूक नभ से ।

8

हठयोगी -सा

साधना में है लीन

वो नागफनी ।

 9

हिम-सा दर्द

हँसी की मीठी धूप

पिघला गई ।

10

खो गई सारी

वे कागज़ की नावें

सूखा है गाँव ।

11

तपती देह

आषाढ़ से छनकी

जल -स्पर्श -सी

12

बूढ़ा पीपल

भरता है सभी में

जवान साँसें ।


Responses

  1. लाजवाब प्रस्तुति। प्रत्येक हाइकु बहुत भावपूर्ण।
    ज्योत्स्ना प्रदीप जी बहुत-२ बधाई।

  2. Jyotsna ji
    aapke sabhi haiku bahut hi arthpoorn hai.n

    pushpa mehra

  3. बहुत सुन्दर भावपूर्ण हाइकु !
    बधाई … ज्योत्स्ना प्रदीप जी !
    ~सादर!!

  4. bahut bhaav poorn haiku ….
    हिम-सा दर्द
    हँसी की मीठी धूप
    पिघला गई ।……bahut sundar !!bahut badhaaii aapko !!

  5. प्रत्येक हाइकु बहुत भावपूर्ण।
    ज्योत्स्ना प्रदीप जी बहुत-२ बधाई।

  6. उचाट मन

    बतियाता रहता

    मूक नभ से ।
    बहुत सुन्दर…सभी हाइकू के लिए बधाई…|


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