Posted by: हरदीप कौर संधु | अप्रैल 20, 2013

समय के रंग


अरुण रुहेला

मन का पुल 

शब्दों की थी चिंगारी 

जला समूल 

2

लम्बा था कश 

मस्ती में धुआँ पूछे  

जलाया किसे ?

3

सब एक थे 

खुली ज्यों वसीयत 

एक एक थे 

4

पुराना घर 

देखे नए मकान 

रोज टूटते 

5

मैं तो हँसूँगा 

धूप में, चाँदनी में 

जीना  है मुझे 

-0-

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Responses

  1. सब एक थे

    खुली ज्यों वसीयत

    एक -एक थे ।

    waah lajwaab ….!!

  2. bahut gahare bhaav liye bahut sundar haaiku …badhaaii aapko !!

  3. सब एक थे

    खुली ज्यों वसीयत

    एक -एक थे ।…बहुत खूब !!

  4. सब एक थे
    खुली ज्यों वसीयत
    एक -एक थे।….बेहतरीन।

  5. मन का पुल

    शब्दों की थी चिंगारी

    जला समूल

    sundar …. shabdon ki ek chingari sab kuch nasht kar sakti hai …. tabhi to kaha jata hai …. tol-mol ke bol ya pahle baat tatol, fir munh khol ….


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