Posted by: डॉ. हरदीप संधु | फ़रवरी 27, 2013

क्यों घबराऊँ ?


1-वंशस्थ गौतम

1

दु:ख  की नदी

दर्द की धारा लिये

बहती रही ।

2

रहूँ तटस्थ

दु:ख  मिले या सुख

न डिग जाऊँ ।

3

दु:ख  भी तेरे

सुख तो हैं ही तेरे,

क्यों घबराऊँ ?

4

दु:ख  व सुख

नदिया के दो तट

बहता जाऊँ ।

5

दु:ख  ना बुरा,

वरदान प्रभु का

समझो इसे ।

-0-

2-रेनु चन्द्रा
1
चुप रहता
आँसू बन बहता
मन का दु:ख ।
2
दु:ख  में सदा
कोई ना होता साथी
सभी पराये।
3
दु:ख  में भीगा
जब जब तकिया
तुम्हें पुकारूँ।
4
जीवन भर
दु:ख – सुख का नाता
साथ चलता।
5
दु:ख  में डूबे
डूबते चले गए
पार ना हुए
-0-
 
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Responses

  1. दु:ख ना बुरा,

    वरदान प्रभु का

    समझो इसे ।…बहुत सुंदर

    वंशस्थ गौतम जी को बधाई !!

    दु:ख में भीगा
    जब जब तकिया
    तुम्हें पुकारुं।….सुंदर हाइकु

    रेनु चंद्रा जी को बधाई !!

  2. बहुत सुंदर हाइकु रेनु जी ….बधाई ।

  3. बहुत गहरे अर्थ लिए सुन्दर हाइकु …दोनों हाइकुकारों को बहुत बधाई !!

  4. गौतम जी और रेनू चंद्रा जी, आप लिखते रहें – हम पढ़ते रहें और
    आप का साथ देते हुए यही कह सकते हैं : ” दुःख या सुख /
    सिक्के के दो पहलू / रोना – हँसना। ” बधाई स्वीकार करें !

  5. बहुत बढ़िया हाइकु।
    गौतम जी, रेनू चंद्रा जी बधाई।

  6. Dhukh ko bahut achchhe se prstut kiya hai…man dukhi sa ho gaya..

  7. अर्थपूर्ण, भावपूर्ण हाईकु !
    वंशस्थ गौतम जी… सकारात्मक अभिव्यक्ति ! बहुत सुंदर!
    रेनू चंद्रा जी… भीगी-भीगी अभिव्यक्ति… दिल को भिगो गयी! अतिसुंदर!
    ~सादर!!!

  8. दुःख के हाइकु… पढना सुखद लगा. सभी हाइकु बहुत अर्थपूर्ण. सभी को बधाई.


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