Posted by: हरदीप कौर संधु | जनवरी 16, 2013

पाहन और प्राण


पाहन और प्राण

डॉ नूतन गैरोला

1

पाहन थी मैं

तो तुम होते  राम

फूँकते प्राण।

2

अमूर्त्त भाव

खंडित हुई मूर्त्ति

भग्न उर में ।

PeruStoneIdolFromLeft (2)3

सुनो पाषाण !

पथराती गई मैं

तुम्हें पूजते ।

4

पत्थर हूँ मैं,

माणिक,पन्ना ,हीरा –

नजर हो तो । 

-0-


Responses

  1. डॉ नूतन डिमरी गैरोला जी, आपको अपने इन मर्म को छूने वाले सभी ” हाइकु ” के लिए बधाई ! ” पाहन थी मैं / तो तुम होते राम / फूँकते प्राण ” आपका यह हाइकु लंबे समय तक स्मृति में अपनी मौजूदगी बनाए रखे तो किं आश्चर्यम ? हार्दिक बधाई …. 17 आखरों में आपने बहुत कुछ कह दिया !

  2. सभी उत्तम हाइकु।

    पाहन थी मैं
    तो तुम होते राम
    फूँकते प्राण।
    लाजवाब।
    नूतन जी बहुत-२ बधाई

  3. बहुत सुन्दर गहरे भाव | बधाई नूतन जी |

  4. बहुत गहरे भाव लिए सुन्दर हाइकु …बहुत बधाई नूतन जी !

  5. बहुत खूबी से पाहन के विभिन्न रूपों को उजागर करते हाईकु ! बहुत सुंदर!
    बधाई नूतन जी!:)
    ~सादर!!!

  6. काविलेतारिफ सारे हाइकु व्यंग्यात्मकता लिए हुए संदेश देते हुए .

  7. वाह बहुत खूब

  8. शिल्प सुंदर है किंतु भाव में नारी की दीनता को स्वीकार करना दिल में टीस दे गया ! कब तक बनी रहेंगी आप पत्‍थर और प्रतीक्षा करेंगी कि चरणस्पर्श कर आपका उद्धार करे !
    स्वयंसिद्धा बनें नारी। चरणों की दासी बन, दया की आकांक्षा क्यों? ह्रदयस्वामिनी बनिए, अर्धांगिनी बनिए सच्चे अर्थों में।

  9. Bahut acchi haiku kavitayen hain ye.

  10. अमूर्त्त भाव

    खंडित हुई मूर्त्ति

    भग्न उर में ।
    patthar ko manak man ke itna sunder likha hai ki kya kahen bahut pyara

  11. आप सभी को मेरा हार्दिक धन्यवाद .. और इस पेज में मुझे पुनः पुनः जगह मिली खुद को धन्य समझ रही हूँ.. आभार! नूतन डिमरी गैरोला.
    nutan.dimri@gmail.com
    . मेरा वेब लिंक http://amritras.blogspot.com

  12. सुनो पाषाण !

    पथराती गई मैं

    तुम्हें पूजते ।
    बहुत बढ़िया…बधाई…|

  13. सुनो पाषाण…..
    भाव पूर्ण हाइकु, बधाई नूतन जी।


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