Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | नवम्बर 30, 2012

प्रतीक रूप में प्रकृति


डॉ सुधा गुप्ता

1

आकर बैठी

ठूँठ पर चिड़िया

जाने कहाँ से  

2

उगाई मैंने।

गुलाब की फ़सल

हाथ घायल 

3

उदास साँझ

जर्जर बँधी नाव

सूने किनारे 

4

कपोती उड़ी

दीवार से टकरा

घायल हुई 

5

काँटों की खेती

जीवन जोत दिया

चुभे तो रोती 

6

काठ के घोड़े

चलता तन कर

माटी–सवार

7

किंशुक खिला

रंग–मरीचिका है

सुगन्ध कहाँ  !

8

क्या हवा चली

वसन्त बुढ़ा गया

मसली कली 

9

ज़ख्म क्या खाए

फूलों पे भरोसा था

वह भी उठा 

10

जाने को पार

कागज़ की कश्ती में

हुई सवार ।


11

तारा टूटा था

ऊँचाइयों का शौक

ले के डूबा था  

-0-


Responses

  1. तारा टूटा था

    ऊँचाइयों का शौक

    ले के डूबा था ।

    कितना गहरा सच है जीवन दर्शन है ये

    आकर बैठी

    ठूँठ पर चिड़िया

    जाने कहाँ से ।

    सुन्दर प्रतिक आपकी लेखनी सदा हम पर भावों की वर्षा करती रहे यही प्रार्थना है

    सादर

    रचना

  2. सभी हाइकु बहुत सुन्दर।

  3. किंशुक खिला

    रंग–मरीचिका है

    सुगन्ध कहाँ !

    यूँ तो सभी हाइकू बहुत सुन्दर हैं …. लेकिन इसका रंग कुछ जादा गहरा चढ़ा मुझ पर ….. सच ही तो है … पूरा जीवन ही रंगों की मरीचिका है …. पूरा जीवन भागते रहो लक्ष्य के पीछे-पीछे और जब लगे की मंजिल आ गयी … तो पता लगता है सफ़र अभी बाकी है …. सुधा जी तो स्तम्भ हैं हिंदी हाइकू की …. उनके हाइकू पढ़ना सदैव ही प्रेरणादायी होता है ….
    सादर
    मंजु

  4. भाव प्रबल अत्यंत सुंदर हाइकु …..!

    शुभकामनायें ।

  5. उगाई मैंने।

    गुलाब की फ़सल

    हाथ घायल ।
    सभी हाइकु अप्रतिम हैं ही, पर इस वाले में तो जीवन का पूरा फलसफा ही नज़र आ गया |
    आभार इतने अच्छे हाइकु पढवाने के लिए…और आदरणीय सुधा जी को बधाई…|

  6. 1 ज़ख्म क्या खाए
    फूलों पे भरोसा था
    वह भी उठा ।
    2 तारा टूटा था
    ऊँचाइयों का शौक
    ले के डूबा था ।
    आदरनीय सुधा दी, क्‍या जीवन दर्शन, वो भी हाइकु में सिमटा । वाह। सभी हाइकु बहुत ही सुन्‍दर । आभार व बधाई ।

    ले के डूबा था

  7. सुधा दीदी के ये हाइकु, हाइकु के शिल्प के सुन्दर उदहारण हैं। कई लोग जो अनावश्यक रूप से हाइकु को लेकर उल-जलूल फब्तियां कसते रहते हैं, उन्हें ये हाइकु जरूर पढ़ने चाहिए।

  8. आदरणीया सुधा जी के हाइकु बहुत सारगर्भित होते हैं…बहुत सीख भरी होती है…थोड़े थोड़े शब्द बड़े बड़े कथ्य…बहुत कुछ सीखने का मौका मिलता है…सादर बधाई !!

  9. आ० सुधा दी को पढना तो स्वयं में एक अनुभव है। अति सुंदर

  10. “उगाई मैंने।
    गुलाब की फ़सल
    हाथ घायल ।”…. कहते हुए ….जीवन के सार को …हमारे लिए
    दिखाए सदा ….ये कलम आपकी …जीवन राह …..बस इतनी सी चाह के साथ सादर …ज्योत्स्ना


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