Posted by: डॉ. हरदीप संधु | नवम्बर 28, 2012

उजास ही उजास


डॉ.श्यामानन्द सरस्वती ‘’रौशन’’

1.

बजी घण्टियाँ

गोधूलि के समय

तूने पुकारा ।

 

2.

फैले जग में

उजास ही उजास

करें प्रयास ।

 

3.

आँधियों में भी 

 बुझने नहीं दिया 

 आस का दिया  ।

 

4.

तू ऐसा कर

गन्ध जैसा बिखर

ऐसे सँवर

 

5.

किसने कहा

घर-आँगन त्यागें

त्यागें तृष्णाएँ ।

-0-

[ 27 नवम्बर को विमोचि्त हाइकु संग्रह ” रौशन हूँ मैं” से साभार !इस संग्रह में 1212 हाइकु  दो हाइकु ग़ज़ल,एक हाइकु गीत और  बीस हाइकु रूबाइयाँ हैं। आप आज 92 वर्ष की अवस्था पूरी कर चुके हैं। हाइकु परिवार की कोटिश: शुभकामनाएँ !!]

 

 

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Responses

  1. waah raushan ji , ek se badhkar ek haiuk sakaratmkata ki prerna dete huye hardik badhai aapko

  2. आप सब ज्ञानियों को पढ़ते हुए बहुत कुछ सिखने को मिल रहा है …आभार

  3. गुरु पर्व की शुभकामनाएँ !!

  4. सभी हाइकु बहुत सुन्दर आपको बहुत बधाई।

  5. तू ऐसा कर

    गन्ध जैसा बिखर

    ऐसे सँवर

    ummid bhare sunder haiku
    aapko janmdin ki subhkamnayen
    saader
    rachana

  6. सभी एक से बढकर एक हाइकु ……सुन्दर भावों से भरे ….
    किसने कहा
    घर-आँगन त्यागें
    त्यागें तृष्णाएँ ।…….बहुत सारगर्भित ….!!

  7. किसने कहा

    घर-आँगन त्यागें

    त्यागें तृष्णाएँ

    एकदम सच बात कही ….घर-बार त्यागने से कुछ नहीं होता …. आवश्यकता तो मन को निर्मल करने की है … संत कवि रैदास जी ने कहा है है न … मन चंगा तो कठौती में गंगा …

    सादर
    मंजु


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