Posted by: हरदीप कौर संधु | नवम्बर 11, 2012

मेरा ही अक्स


अरुण सिंह रूहेला

1

छू ही आई है 

हिम्मत की तितली 

ऊँचे ख्वाब को ।

2. 

बनके इत्र 

रंग तेरे नाम का 

मुझे सजाए । 

3. 

ढूँढता मुझे 

लम्हों के जंगल में 

मेरा ही अक्स  ।

4

स्वप्न  जो मरे

मरें जीवन भर 

वो जिंदा लाशें 

5

खुशी के बीज 

देती है हरियाली

मन खोल के.. 

6

कच्ची मिट्टी में  

पनपें पक्के रिश्ते 

ऐसे  बीज  बो।

7

म्बा है रास्ता 

धूप तन जलाए  

छाँव क्यों लूटी ?

-0-

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Responses

  1. ढूँढता मुझे

    लम्हों के जंगल में

    मेरा ही अक्स ।
    बहुत बढ़िया…बधाई…।

  2. कच्ची मिट्टी में
    पनपें पक्के रिश्ते
    ऐसे बीज बो।….बहुत सुन्दर ..!!

  3. सभी हाइकु बहुत सुन्दर लगे,विशेषत:

    कच्ची मिट्टी में
    पनपें पक्के रिश्ते
    ऐसे बीज बो।…

    बहुत अच्छे लगे। बधाई।

  4. सभी हाइकू बहुत सुन्दर है , अरुण जी को बधाई

    2012/11/11 “हिन्दी हाइकु(HINDI HAIKU)-‘हाइकु कविताओं की वेब पत्रिका’-2010

  5. उत्साह बढ़ाने के लिए आपका सहृदय आभारी हूँ !

    ~ अरुण


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