Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 31, 2012

धूप- रेवड़


डॉ सरस्वती माथुर

1

सूर्य सोने की

स्वर्ण किरण ले

सागर घूमे

2

धूप- रेवड़

गड़रिया सूरज

हाँक ले गया

3

पीताम्बरी- सी

साडी पहन कर

संध्या निकली  ।

4

रात ओढ के

सर्दी का गर्म शाल

नभ में सोई  ।

5

जागी भोर तो

भरी नयन-कोर

रवि -लालिमा ।

6

धूप मछली

मछुवारे सा फेंका

सूर्य ने जाल

7

प्यासी थी रेत

भीगी लहरों संग

खार सोखती ।

8

ख़ुशी के फूल

मन – बिरवे  पर

खिले खिले -से

9

नभ -सागर

तारों का  मीन-पुंज

तिरता जाए ।

10

पानी- चलनी

सागर लहरों से

रेत छानती ।

-0-

 


Responses

  1. बहुत खूबसूरत बिंब हैं…बधाई…।

  2. प्यासी थी रेत

    भीगी लहरों संग

    खार सोखती ।

    बहद गहरे भाव ….

    बधाई सरस्वती जी ….!!


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