Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | अक्टूबर 23, 2012

कच्चा है घड़ा


डॉ• निशा जैन

1

कच्चा है घड़ा

उफ़नती यह नदी

उबार लेना ।

2

वक़्त की धार

बहती चली जाए

ओर न छोर

3

ये रिश्ते -नाते

प्यारे– से हैं बन्धन

टूट ही जाते ।

4

बन्द सीपियाँ

उपजे मुक्ताकण

बिखरे दर्द ।

5

आखर -मोती

पिरोती चली जाऊँ

हार न मानूँ ।

6

मन-पिंजरा

अकुलाता है जिया

मन-पंछी जा ।

7

तन ठिठुरा

गुनगुनाती धूप

जी भर हँसी ।

8

आ पहुँची मैं

किस बियाबान में ?

तुम्हें पुकारूँ ।

9

आशा की डोर

हो गई कमज़ोर

गूँगा है शोर ।

10

सिन्दूरी साँझ

नवल परिणीता

देखती राह ।

-0-

(उर्वरा: सम्पादक -डॉ शैल रस्तोगी ,संस्करण -2006  से साभार )

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Responses

  1. कच्चा है घड़ा

    उफ़नती यह नदी

    उबार लेना ।

    बहुत ही सुंदर हाइकु

    सिन्दूरी साँझ

    नवल परिणीता

    देखती राह ।

    वाह !! भावपूर्ण…निशा जी को बहुत बहुत बधाई !!

  2. सिन्दूरी साँझ
    नवल परिणीता
    देखती राह ।
    बहुत प्यारा हाइकु..बधाई

    -0-

  3. आखर -मोती

    पिरोती चली जाऊँ
    हार न मानूँ

    बहुत सुंदर हाइकु हैं बधाई,

    सादर,

    अमिता कौंडल

  4. आखर -मोती
    पिरोती चली जाऊँ
    हार न मानूँ ।….तथा ….
    सिन्दूरी साँझ
    नवल परिणीता
    देखती राह ।….बहुत सुन्दर मनके हैं भावों की माला के …बधाई

  5. आखर -मोती

    पिरोती चली जाऊँ

    हार न मानूँ ।
    बहुत प्यारा…। सभी हाइकु अच्छे हैं…बधाई…।

  6. sabhi haiku prabhavi lage , badhai rachnakar ko


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