Posted by: हरदीप कौर संधु | जुलाई 19, 2012

हाइकु -गीत


डॉ मिर्ज़ा  हसन नासिर 

सावन आया

जलधर गरजें

नैना बरसें ।

भूखे बेकल

अगणित जन हैं

      कैसे सरसें !

घर में कोई

कब तक ठहरे

      ओले बरसे ।

भीगा मौसम

पर तन सुलगे

      कैसे हरषें !

‘नासिर डूबा

विरह-जलधि में

      आँखें तरसें ।

      -0-

( हाइकु -काव्य में मेरे नवीन प्रयोग से, मई 2012 में प्रकाशित)



Responses

  1. Sundar abhivyakti….

  2. क्या बात है…बहुत खूब…मेरी बधाई…।

  3. सावन आया
    जलधर गरजें
    नैना बरसें ।

    भूखे बेकल
    अगणित जन हैं
    कैसे सरसें !…बहुत सुंदर …

  4. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

  5. “नासिर डूबा
    विरह-जलधि में
    आँखें तरसें ।”
    बहुत खूब !

  6. भीगा मौसम
    पर तन सुलगे
    कैसे हरषें !
    ‘नासिर डूबा
    विरह-जलधि में
    आँखें तरसें ।

    …..बहुत भावपूर्ण …. बधाई


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