Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 31, 2012

सतरंगा प्रेम -महकी फिज़ाँ



1

लगें रंगीन

काली स्याही में जन्मे 

प्रेम के गीत ।

2

होंठो से बँधी 

दिल की धडकन 

है रसभरी ।

3

चाँदनी पूर्ण 

यौवन का सागर 

प्रिय सम्पूर्ण

 

4.

मैं क्या कहूँ ?

दरिया के पास हूँ 

प्यासा ही रहूँ ?

–अरुण कुमार रुहेला


2-ग्रीष्म ऋतू का प्रारंभ ­ 

1

चैत की रात

 बहती मस्त हवा 

  महकी फिज़ाँ

2

 ग्रीष्म पधारे

 उमस -भरा दिन 

  मोहक रातें

3

उड़ती धूल 

 मुरझा गए फूल 

 प्रचंड गर्मी 

4

भली  लगती 

मलय -सुवासित 

जल -तरंग ।

सुरेश कुमार चौधरी , कोलकाता

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Responses

  1. लगें रंगीन
    काली स्याही में जन्मे
    प्रेम के गीत

    just loved it…. Superb !

  2. लगें रंगीन
    काली स्याही में जन्मे
    प्रेम के गीत ।………..bahut sunder badhai arun kumar ji

    चैत की रात
    बहती मस्त हवा
    महकी फिज़ाँ……………waah suresh ji hardik badhai sabhi hayuk bahut sunder lage

  3. आपके इस आशीर्वाद के लिए बहुत आभारी हूँ ।

  4. हौसला बढ़ाने के लिए धन्यवाद !


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