Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | मार्च 24, 2012

प्रीत-मधुर गीत


1

 कुछ न माँगूँ        
बस पल दो पल
ख़ुशी के सिवा ।

2.

कभी ढूँढ़ती
यादों के आँगन में
ख़ुशी अपनी ।

3

बिन बुलाए,
ये गम पता नहीं
क्यों चले आए !

4 .

मैं हूँ पगली 

ढूँढने चली ख़ुशी 

यूँ गली-गली ।

5 .

ख़ुशी तो बैठी 

कहीं दुबककर 

मेरे दिल में ।

6 .

ओ मेरी ख़ुशी !

तुझे काहे का डर

तू आ बाहर ।

7 .

गमों की रात

जब करती कब्जा

वो पल रूठा।

8 .

ग़म के गीत 

एक अकेला मन

कैसे हो जीत !

9 .

दिल ज्यों गाए 

प्रीत-मधुर गीत 

तभी हो जीत ।

10 .

गम का साया 

ख़ुशियों की धूप में 

टिक न पाया ।

–डॉ. हरदीप कौर सन्धु


Responses

  1. waah behatarin .ek se badhkar ek .hardik badhai ….:)

  2. वाह!!!
    बहुत खूबसूरत…

    सादर.

  3. behad khoobsoorat

  4. सभी हाइकु बहुत खूब।

  5. khushi aur gam ki luka chhipi bhare saarthak haiku .sabhi ek se badh kar ek .

  6. सुंदर भाव हैं, हरदीप जी।

    एक प्रश्न- हाइकु के नियमों के अनुसार, सिर्फ़ वर्ण की गिनती- ५-७-५ ही नहीं वरन, हर पंक्ति अपने में संपूर्ण हो ऐसा पढ़ा/सीखा है। इन हाइकु में यूँ प्रतीत होता है जैसे एक लेंबी पंक्ति को तीन भागों में तोड़ कर लिख दिया गया हो। क्या यह सही मायनों में हिन्दी हाइकु माने जायेंगे? आशा है आप इस टिप्पणी को अन्यथा नहीं लेंगी।

  7. मैं हूँ पगली
    ढूँढने चली ख़ुशी
    यूँ गली-गली ।
    5 .
    ख़ुशी तो बैठी
    कहीं दुबककर
    मेरे दिल में ।

    वाह! बहुत सुंदर…बधाई|

  8. विषय एक है , लेकिन हर हाइकु अपने आप में पूर्ण भी है । हाइकु में बहुत से प्रयोग हो रहे हैं ; जैसे हाइकु गीत । हाइकु मुक्तक आदि । समय के साथ विधाएँ कुछ तो करवट लेती ही हैं । साहित्यकार नित नया कुछ करना चाहता है । हिन्दी के बड़े रचनाकार बहुत पहले से ये प्रयोग करते आ रहे हैं । पसन्द अपनी-अपनी । किसी क्षेत्र विशेष वालों के पास ही हाइकु लिखने का लाइसेंस है ,ऐसा भ्रम पालने वाले लोग भी हैं । कुछ खुद को खलीफ़ा मानकर और खुद बरसों से घटिया लिखकर भी औरों को सीख देना का जिम्मा सँभाले हैं; उनके बारे में कुछ कहना अपना समय खराब करना है । जब सौ साल पहली कविता में सैंकड़ों परिवर्तन हो चुके हैं तो हाइकु उससे अछूता कैस एरह सकता है? वैसे हमारा सीधा -सा उद्देश्य है-अच्छे रचकारों को सामने लाना । हिन्दी हाइकु को विवाद-मंच बनाना हमारा उद्देश्य नहीं है । कारण- इस तरह के स्वयंभू रचनाकार? हिन्दी हाइकु की पहले ही काफ़ी दुर्गति कर चुके हैं । उनके पीछे अपनी शक्ति बरबाद न करके स्वस्थ लेखन और अच्छे रचनाकारों को ( वह चाहे किसी भी शहर प्रान्त या देश का हो) सामने लाना ही हमारा उद्देश्य हो । हम और आप जितना लिख रहे हैं ,वह सारा ही मानक हो ,ज़रूरी नहीं । आप शायद 20-25 बरसों से जो अच्छा लिखा गया है, उसके सम्पर्क में नहीं है । आप कम से कम कृष्णा वर्मा ( कैनेडा) के ही हाइकु पढ़िए । हिन्दी हाइकु पर लगभग 157 कवियों के 3241 हाइकु हैं । मेरा सुझाव है कि आप अधिक से अधिक पढ़िए । केवल 1 हाइगा और 10 हाइकु पढ़कर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।

  9. Khoob mehfil mahki hai khushboo se
    Hardeep ji aapko meri dili shubhkamanyein Har prays ke liye jo aap sahitya ke kshetr mein kar rahi hain
    4 .
    मैं हूँ पगली
    ढूँढने चली ख़ुशी
    यूँ गली-गली ।
    **
    Waah Khoob Likha hai…
    चूमें पांखुड़ी
    अलबेला भँवरा
    शर्माए कली
    5 .
    ख़ुशी तो बैठी
    कहीं दुबककर
    मेरे दिल में ।
    aur yeh aapki shaan mein
    क्यों न दुबके
    शातिर ग़म बैठा
    जाल बिछाय
    **

  10. सभी हाइकु बहुत खूबसूरत ….

  11. me to bas yahi kahungi

    हाइकु विधा
    पाके आपके शब्द
    प्रसन्न हुई
    -०-
    भाव पिरोये
    सागर है उमड़ा
    हाइकु भीगे
    -०-
    हाइकु नदी
    पार लगे कोई ही
    उतरे सभी

    aapko badhai
    rachana

  12. ओ मेरी ख़ुशी !
    तुझे काहे का डर
    तू आ बाहर ….
    behad touchy….sunder prastuti…

  13. सभी हाइकू बहुत सुन्दर और खुशी के हर पहलू को चित्रित करते हुए…

    ख़ुशी तो बैठी
    कहीं दुबककर
    मेरे दिल में

  14. मानोशी जी आपने हिंदी हाइकु में प्रकाशित हाइकुओं पर अपनी राय दी है, राय देने का सभी को हक है। पर मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि आप ने डा0सुधा गुप्ता जी की हाइकु-पुस्तकें पढ़ी हैं? नहीं पढ़ीं तो ज़रूर पढ़ें, आपको मालूम हो जाएगा कि हाइकु क्या है? हाइकु के कितने शेड्स हो सकते हैं? अच्छा हाइकु क्या होता है? वह केवल 5+7+5 की तीन पंक्तियां मात्र ही नहीं है। दूसरी बात, ‘हिंदी हाइकु’ पर जितने भी हाइकु आ रहे हैं, वे किसी फैशन के तहत नहीं लिखे गए हैं… कि चलो, इसमें है क्या, 5+7+5 का नियम निभाते हैं और कुछ भी लिख मारते हैं…इन रचनाकारों ने पहले अच्छे हाइकु पढ़ें, उन्हें गुना और जब लगा कि कविता के इस छोटे से रूप में कोई गहन विचार, भाव या बात को सुन्दर ढंग से अभिव्यक्ति दी जा सकती है, तभी ये रचनाकार हाइकु की ओर उन्मुख हुए। ये एक लम्बी पंक्ति के तीन टुकड़े मात्र नहीं है। भाई रामेश्वर काम्बोज हिमांशु जी और हरदीप जी की पारखी दृष्टि कमजोर हाइकु तो इसमें जाने ही नहीं दे सकती। मैं भी पहले हाइकु को लेकर अच्छी धारणा नहीं रखता था(क्योंकि मैंने अच्छे हाइकु पढ़े ही नहीं थे, जो पढ़ने को उपलब्ध हुए, वे हाइकु के नाम पर कूड़ा थे) लेकिन जब इस विधा को पूर्णतय समर्पित डा0सुधा गुप्ता के हाइकु पढ़े तो जाना कि हाइकु क्या होता है…यह केवल 5+7+5 ही नहीं है, पूरी कविता है…यह कवि की क्षमता पर है कि वह कितनी कुशलता से इस कविता के छोटे रूप में अपनी भावाव्यक्ति कर पाने में सक्षम है। हाइकु में यह जो नई पीढ़ी आई है, वह नि:संदेह हाइकु को लाइटली नहीं ले रही है, इसके प्रति गम्भीर है और कुछ अच्छा ही जोड़ना चाहती है… बहुत से नाम हैं जो हिंदी हाइकु लेखन में सिर्फ़ अपना नाम जोड़ने के लिए नहीं आए हैं, बल्कि इस विधा की शक्ति को पहचान कर इस ओर उन्मुख हुए हैं।

  15. मैं हूँ पगली
    ढूँढने चली ख़ुशी
    यूँ गली-गली ।

    ख़ुशी तो बैठी
    कहीं दुबककर
    मेरे दिल में ।

    बहुत सुंदर भाव हैं सभी हाइकु बहुत ही सुंदर हैं पर यह दो तो मन को छू गए. हार्दिक बधाई,

    सादर,

    अमिता कौंडल

  16. आदरणीय सर,

    जानकारी के लिये धन्यवाद।

    आपका एक हाइकु उदृत कर रही हूँ।

    साँझ की बेला
    पंछी ऋचा सुनाते
    मैं हूँ अकेला!

    इतना सुंदर व संपूर्ण हाइकु, हाइकु लेखन जगत के लिये उदाहरण है।

    सादर,
    मानोशी

  17. बहुत सरस अभिव्यक्ति है आपकी…एक हाइकू आपके लिये …….

    मधुरा गिरा
    भरे रस कलश
    रहे अक्षया…!

  18. मैं हूँ पगली
    ढूँढने चली ख़ुशी
    यूँ गली-गली ।

    ***
    ख़ुशी तो बैठी
    कहीं दुबककर
    मेरे दिल में ।

    बहुत सुंदर और जीवन का यथार्थ प्रस्तुत करते हुए हाइकु….बधाई!
    शुभकामनाओं सहित
    सादर/सप्रेम
    सारिका मुकेश

  19. हिंदी हाइकु वेब – पत्रिका को शुरू हुए लगभग एक वर्ष और आठ महीने होने को आए हैं । सबसे पहले तो मैं सभी दोस्तों का तहे -दिल से धन्यवाद करना चाहती हूँ जो हम से इस समय दौरान जुड़े रहे अपने आत्मीय विचारों से और नित-दिन नए हाइकु लेखन से । जैसा कि रामेश्वर जी ने बताया है कि अब तक हमारे साथ 157 कवि जुड़ चुके हैं और आगे इस परिवार में ऐसे ही और जुड़ते चलेंगे …यही आशा करते हैं हम ।
    हाइकु विधा बहुत पुरानी लेखन विधा है, जो आज के तेज रफ्तार युग में सबसे अधिक पढ़े जाने वाली विधा मालूम पडती है । रामेश्वर जी और सुभाष नीरव जी की बात को मैं आगे बढ़ाती हुई कहना चाहूंगी की हाइकु में कहे से ज्यादा अनकहा होता है । एक गहरा भाव लिए हुए हाइकु को पढ़कर पाठक के मन में अनेक संभावनाएं उत्पन्न हो सकती है उसे समझने के लिए क्यों जो हाइकु की अनेक परतें होती हैं । कहने का भाव है कि पाठक की सोच जहाँ तक पहुँच सकती हो
    ..वही उस हाइकु का सही अर्थ है । मैं एक -दो उदाहरण देना चाहती हूँ-
    मैं हूँ पगली
    ढूँढने चली ख़ुशी
    यूँ गली-गली
    यह पाठक पर निर्भर है कि उसे कौन- सा हाइकु रूप अपने से जोड़ना है
    …..उसकी अपनी सोच शक्ति है , वह इसमें डूबकर कौन से मोती चुनता है
    ………….जैसे
    १. मैं पगली हूँ मैं दीवानी हूँ ….मैं खुशियाँ ढूंढने निकली हूँ गली –
    कूचे में ….लोगों से मिलकर मुझे ख़ुशी मिली !
    २. रे !तू पगली है जो खुशियाँ ढूंढने गली-गली घूम रही हो ?
    ३. इस तेज रफ्तार जमाने में खुशियाँ ढूंढने से ही मिलती हैं, खुशियों के
    अवसर पैदा करने पड़ते हैं ….वगैरा …वगैरा
    कभी ढूँढ़ती
    यादों के आँगन में
    ख़ुशी अपनी ।
    कोई यादों में ख़ुशी ढूंढ़ रहा है …..इसका कोई भी कारण हो सकता है ……
    किसी को ऐसा करके ही ख़ुशी मिलती हो …भाव अपने अतीत को याद करते हो सकता है कि ढूंढने वाले का आज निराशा से भरा हो ….
    जिसका अतीत अच्छा होगा ,उसी को यादों के आँगन से ख़ुशी मिल सकती है । यह हाइकु यह भी बताता है कि खुशियाँ ढूँढने के लिए कहीं जाने की कोई जरूरत नहीं ये आपकी यादों के आँगन में भी मिल सकती है ।
    हाइकु पढ़ना और गुनना एक साधना है ……जहाँ तीन पंक्तियों में पूरी
    कविता का मजा लिया जा सकता है ..बस जरूरत है एक पैनी दृष्टि की और साथ में सकारात्मक सोच की भी ।
    हरदीप

  20. सुंदर और जीवन का यथार्थ प्रस्तुत करते हुए हाइकु….बधाई!

  21. सबसे पहले तो इतने सुन्दर और भावपूर्ण हाइकु के लिए बधाई…।
    आपने बहुत सही लिखा है हरदीप जी…अपने ही हाइकु की तीन अलग-अलग व्याख्या जो आपने प्रस्तुत की है, बहुत अच्छी लगी…। यह हाइकु परिवार दिन दूनी, रात चौगुनी तरक्की करता रहे, यही शुभकामना है…।

  22. हरदीप जी आपने अपने हाइकु के अर्थ की ओर संकेत कर दिया । सजग पाठक उसके भाव से परिचित हो जाएगा । सम्पादकों से यह उम्मीद करना कि वे रचनाओं पर अपनी निजी राय भी दें , समीचीन नहीं लगता । सम्पादक के लिए यह सम्भव नहीं। इस तरह की उम्मीद करना उचित भी नहीं है । हाइकु का क्षेत्र तो बहुत व्यापक हो चुका है ।बहुत से पाठकों की मज़बूरी हो सकती है कि उनकी पहुँच अच्छी रचनाओं और अच्छे रचनाकार तक न हो ।

  23. खूबसूरत भावपूर्ण हाइकु के लिए बधाई।

  24. ग़म के गीत
    एक अकेला मन
    कैसे हो जीत !
    ……………..
    गम का साया
    ख़ुशियों की धूप में
    टिक न पाया ।
    —-अच्छे हाइकु हैं. बधाई!


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