Posted by: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' | फ़रवरी 22, 2012

भाव-कलश


भाव-कलश:भावों का  अवगाहन

डॉ. हरदीप कौर सन्धु,सिडनी (आस्ट्रेलिया)

 

ताँका जापानी काव्य शैली वाका का ही एक रूप है । दसवीं शती के शुरू में वाका का एक ही रूप ‘ताँका’ ज्यादा प्रचलित था, चोका बहुत कम लिखा जाता था । तब से वाका को ‘ ताँका’ ही माना जाने लगा । 

            यह प्रगीत  काव्य हाइकु से भी पुरातन है । ताँका 1200 साल पुरातन शैली है जबकि हाइकु 300 साल पुराना ।बहुत से बदलावों के बाद ताँका का आज का प्रतिरूप प्रचलित हुआ ; जिसमें क्रमश 5 + 7 +5 + 7 +7 के क्रम कुल इकतीस वर्ण और पाँच पंक्तियाँ होती हैं ।

        ताँका  के दो भाग होते हैं – 5+7+5 को कामि- नो- कू  यानी उच्चतर वाक्यांश तथा 7+7 को ‘ शिमो नो कू ‘ यानी निम्न वाक्यांश कहा जाता है ।आठवीं शती का जापान का सबसे पुरातन काव्य संकलन ‘ मान्योशु ‘ में ताँका शैली में कविताएँ लिखी गईं । 

             इस काव्य शैली का मुख्य लक्षण है कि इसमें भावनाओं का पूर्ण विस्तार सहज व संश्लिष्ट रूप में किया जाता है । शब्दों की पहुँच से परे की सांकेतिक  भाषा का प्रयोग इसे और भी अधिक प्रभावी और अर्थगर्भित बना देता  है । 

           ताँका पढ़ने व लिखने का अभ्यास हमें प्रसन्नता से पूर्णता तक , अन्तर्दृष्टि से व्यापकता तक, उत्तेजनशीलता से आत्मिक प्यार तक ले जाता है । इस अवस्था को पाने के लिए हमें अपने -आप में कुछ बदलाव लाना जरूरी है जैसे कहीं सरसरी दृष्टि डालने से एकटक देखने तक , आभास से अन्वेषण ( खोज) तक , केवल जानने  से परिप्रेक्ष्य के  अवलोकन और विश्लेषण तक । लेखन का जो आधार होता, जो चिन्तन की पृष्ठभूमि  होती है;वही परिप्रेक्ष्य होता है , दृष्टिकोण से थोड़ा व्यापक , मगर सन्दर्भ के ज़्यादा निकट ।

           ताँका अनुभव की कविता है ,जिसमें उपमान योजना  प्रयोग उसे और भी गहन और सम्प्रेषणीय बना देता  है । यह हमें संज्ञा के काव्य से क्रिया के काव्य तक ले जाता है, जहाँ स्पष्ट वाणी से व्यक्त किया जाता है । सरल शब्दों में कहा जाए तो यह धागे से कपड़े तक का, बीज  से पौधे तक , रेखाओं से रंगदार चित्र तक या स्वरों से संगीत तक का सफ़र है ।

         डॉ सुधा गुप्ता जी  ने सन् 2000 में ताँका लिखना शुरू किया था। इनके 56 ताँका ‘बाबुना जो आएगी’(2004) में तथा 61ताँका ‘कोरी माटी के दिये’(2009) संग्रह में छपे।जनवरी 2009 में डॉ उर्मिला अग्रवाल का ताँका संग्रह-‘अश्रु नहायी हँसी’(96 ताँका) तथा 2010 में ‘यायावर मन’ (108 ताँका)प्रकाशित हुआ । इसके बाद 2011 में डॉ सुधा गुप्ता का स्वतन्त्र ताँका संग्रह ‘सात छेद वाली मैं’  आया है । इसमें इनके 153 ताँका संगृहीत हैं । इस क्षेत्र में ये तीनों संग्रह उल्लेखनीय ही नही पठनीय भी हैं। रामेश्वर काम्बोज हिमांशु तथा डॉ. हरदीप कौर सन्धु का ताँका – चोका संग्रह ‘ मिले किनारे’ (2011),) और रेखा रोहतगी का ताँका -हाइकु संग्रह ‘ अथ से इति’ ( 2011) में  प्रकाशित हुए हैं । यह सभी  संकलन उल्लेखनीय ही नहीं पठनीय भी हैं । मनोज सोनकर का संग्रह ‘ ताँका -तरंग ( 2011) भी प्रकाशित हुआ है।‘हिन्दी हाइकु’ ब्लॉग पर पहले से ही ताँका प्रकाशित किए जा रहे हैं ।

      रामेश्वर काम्बोज जी तथा मैंने सितंबर 2011 में ‘ त्रिवेणी ‘ ब्लॉग शुरू किया है। इस ब्लॉग पर हिन्दी साहित्य की तीन विधाओं – हाइगा – ताँका – चोका में साहित्य प्रकाशित किया जा रहा है । इसके  माध्यम से विश्व भर के रचनाकारों को ताँका से जोड़ने का प्रयास किया गया है जिनमें से 28 कवियों के ताँका का चुनाव कर यह        ” भाव कलश” बना । हिन्दी में एक साथ  इतने रचनाकारों   का प्रथम विनम्र प्रयास है । हम सबकी  यह कोशिश रही है  कि सभी के मन -त्रिंजण लगे भावों के मेले से कुछ भाव लेकर एक ऐसा ताँका संकलन प्रस्तुत किया जाए ;जिसे पढ़कर लगे कि ताँका संग्रह हो तो “भाव कलश जैसा ।

 मन -त्रिंजण

लगा भावों का मेला 

हृदय -चर्खा 

रचे संदली ताँका 

 बना भाव -कलश ।

       जहाँ तक विषयवस्तु का सवाल था , उस पर कोई पाबंदी नहीं । किसी ने वर्तमान के सच को उजागर किया तो किसी ने अतीत की झलक पेश की । इस संकलन में रचनाओं की प्राप्ति के अनुसार 29 कवियों के 587 ताँका सँजोए हैं । 

           ज़िन्दगी  में सुख-दुःख , धूप -छाँव की तरह आते जाते रहते हैं। मगर दर्दीले लम्हें हमें ज़्यादा प्रभावित करते हैं । भले ही ये कुछ पलों के हों , हमें ज्यादा लम्बे लगते हैं । इसी लिए तकरीबन सभी ताँकाकारों की दृष्टि ने  इन पलों को ज़िन्दगी  के दर्पण में देखा और अपने -अपने ताँका में रूपायित किया । 

    रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ और डॉ भावना कुँअर ने इस संकलन का सम्पादन किया है । दोनों ने  ताँकाकारों का  मनोबल बढ़ाकर  उनको और अच्छा लिखने की प्रेरणा दी  है । आपका मानना है कि इस जग में बबूल ज्यादा हैं और चन्दन कम है, इसीलिए ओ मेरे मन तू गम न करना –

दु:ख न कर/मेरे पागल मन/यही जीवन/हैं बबूल बहुत /कम यहाँ चन्दन ।

बस एक आसान -सा काम तुझे करना है , नफरत को विदा कर , ताकि ईद का चाँद तेरे मन-आकाश को प्रतिदिन रौशन करता रहे –

ईद का चाँद/हर रोज़ बढ़े ज्यों,/सुख भी बढ़ें/रोज़ गगन चढ़ें/दिल रौशन करें ।

साथ ही जीवन के कटु यथार्थ की ओर इशारा करते हुए शातिर लोगों के शब्दों की मिठास के लेप में छुपे ज़हरीले वार से हमें बचने के लिए सावधान करते हैं – 

शातिर लोग/मीठा जब बोलते/याद रखो कि/ज़हर वे घोलते/मुस्कान बिखेरते

 डॉ0  भावना कुँअर की संवेदना निराली है । अपने गाँव के नीम के पेड़ की निबौंलियों को अपनी यादों के आईने  में देखती है –

नीम का पेड़/बहुत शरमाए/नटखट-सी/निबौंलियाँ उसको/खूब गुदगुगाएँ।

तो उन्हें कहीं आँगन में खेलती धूप में माँ अनाज सुखाती दिखाई देती है ;जिसमें कबूतरी का समावेश उसे मार्मिक बना देता है-

आज फिर माँ/अनाज़ सुखाएगी/वो कबूतरी/पल भर में सब/चट कर जाएगी।

भावना जी के ताँका का हर एक शब्द पाठक के मर्म को छू लेता है । जीवन भर हर एक व्यक्ति किसी न किसी अभाव से  व्यथित रहता है ; सम्भव: यही जीवन का सत्य  है-

 आँसू गठरी/खुलकर बिखरी/हर कोशिश/मैं समेटती जाऊँ/पर बाँध न पाऊँ।

इन पंक्तियों की व्यापकता देशकाल की सीमाओं से परे हर इंसान की नब्ज़ पर हाथ रखती है।

             हिन्दी साहित्य के लिए  मन-प्राण से समर्पित, नवोदितों की प्रेरणा शक्ति, उदारमना वरिष्ठ कवयित्री  सुधा गुप्ता जी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। ताँका लिखने की विधा को आगे लाने में आप निरन्तर प्रयास कर रही हैं । अपनी मार्मिक अनुभूतियों को ताँका में उकेर कर असीम दर्द  का वर्णन  करते हुए कहती हैं कि सिर टिकाकर  रोने के लिए  जीवन में सभी को सहारा नहीं मिलता-

न मिला कोई/काँधा रोने के लिए/बेबस आँसू/ख़ाक़ में गिरते थे/फ़ना होने के लिए ।

 एकाकी जीवन में बेबस आँसू लिये हमें अपनी सलीब ज़िन्दगी  भर ढोनी पड़ती हैं –

ढोनी पड़ती/अपनी सलीब तो/हर किसी को/सिर्फ़ अपने काँधे/कोई बोझा न बाँटे ।

 कहीं कवयित्री शहदीले दिनों की गुलाबी साँझ को यादों में ढूँढ़ रही है-

कहाँ खो  गए /शहदीले वे दिन/साँझ गुलाबी/घोर बियाबान में /भटकती उदासी

          हमारी सबसे कम अवस्था की नन्हीं रचनाकार सुप्रीत कौर सन्धु भले ही अभी 13 वर्ष की है ,मगर उसकी सोच गगन की ऊँचाई से भी कहीं ऊँची छलाँग लगाती है तो ,कहीं सागर सी गहराई लिये हुए है । उसके ताँका पढ़कर कोई उसकी अवस्था का अनुमान नहीं लगा सकता । सुप्रीत ने कहीं पतझर में रंगीन हवा की बात की है-

चली हवाएँ /पतझड़ में पत्ते/उड़ने लगे/रंगीन हुई हवा/चेहरा सहलाए !

तो कहीं अपनी कल्पना में चाँद तराशते हुए हीरों से टिमटिमाते तारे बनाए ।

तारे बिखरे/जब चाँद तराशा /ज्यों हीरे -मोती/टूटकर बिखरे/टिम-टिम करते। 

वह बिन पंखों के दूर गगन में उड़ने की इच्छुक है और मेरी नज़र में वह कामयाब भी हुई है ।

      प्रोफ़ेसर दविंद्र कौर सिद्धू हिन्दी पाठकों के लिए नया नाम है । इनके ताँका माटी की सुगंध लिये रिश्तों की पावन चाँदनी में पगे हैं । सावन  महीने  में लड़कियों को तीजो का चाव है और कहीं अपने माही का इंतजार –

पीपल -पींग /चढ़ी है आसमान /तीजो का चाव /सावन हरषाया /ओ माही लेने तो आ 

 कवयित्री ने किसान के दर्द को अपनी कलम में बाँधते बताया कि फसल बेचकर तो अभी पिछला कर्ज़ ही उतारा है, उसके घर में अभी भी दुखों का संताप दूर नहीं हुआ- 

फसल कटी/ कर्ज़ उतारा गया /हाथ हैं खाली/गोरी गूँथ रही है /दुःख -भूख का आटा

        डॉ . अनीता कपूर ने अतीत के लम्हों को टटोलते कहीं ज़िन्दगी  को कराहते देखा तो कहीं उम्र के नभ में दर्दीला इंद्रधनुष देखा। आपने जीवन के  ज्वलंत सत्य को ताँका में बाँधा है –

बरसी घटा /पानी-पानी हुई मैं/बरसी घटा/उम्र के नभ खिला/दर्दीला इंद्रधनुष।

 कमला निखुर्पा की ताँका पिटारी सबसे अलग रंग लिये हुए है । पहाड़ी नदी की  सुन्दरता को अपने ताँका में उतारते कभी इसे अल्हड़ किशोरी कहा जो प्रेम से तटों को सींचती हुई अठखेलियाँ करती आँखमिचौली खेलती है –

तटों से खेले/ये अक्कड़ -बक्कड़/छूकर भागे,/तरु को ,तिनके को,/आँख मिचौली खेले

कभी  ये बादलों को आईना दिखाती मीलों -मील चलकर थककर चूर हो जाती है ,अलकें बिखर जाती हैं, फिर भी अपने प्रियतम  सागर के पास पहुँच ही जाती है-

पहाड़ी नदी/पहुँची सिंधु-तट/कदम रखे/सँभल- सँभलके/बिखरी हैं अलकें।

      डॉ.  अमिता कौंडल  ने अपने ताँका में बचपन को कागज की किश्ती पे सवार कर हमें सितारों तक की सैर करवाई । वाह रे बचपन तू लौटकर क्यों नहीं आता ? 

ये बचपन/कागज की कश्ती में /जिया हमने /तो कभी सारी रात/ सितारों में बिताई ।

डॉ. उमेश महादोषी ने ज़िन्दगी  की इबारत को पढ़ने में असमर्थ होने का कारण जीवन का पता-ठिकाना खो जाना माना है-

रहा न पता/डाकिया भटकता/वापस हुआ/पत्र वो पढ़ूँ कैसे/लिखा था ज़िन्दगी ने!

   डॉ . उर्मिला अग्रवाल हिन्दी साहित्य में जाना – पहचाना नाम है । भारतीय नारी को सीपी का दर्जा देते हुए वह कहती हैं  कि नारी उम्र भर आँसू पीकर मोती देती है अथवा ज़िन्दगी  को सुखद बनाने वाली नारी ही है –

ज़िंदगी भर/पीती है आँसू और/देती है मोती/सीपी जैसी है नारी/हमारे भारत की

           ऋता शेखर ने अपने साजन का हर आहट पर इंतजार करते हुए उसे चाँद से भी सलोना बताया। वह कहती है कि  रिश्तों की पौध प्यार की खाद से खिलती है और आशा के दीप जलाकर चलने से दुर्गम पथ आसान हो जाता है ।-

रिश्तों की पौध/प्यार की खाद मिली/लहलहाई/घोर तूफ़ान में भी/वो हिल नहीं पाई।

         डॉ0 जेनी शबनम ईश्वर को संग चलने के लिए प्रार्थना करते हुए कहती हैं कि ज़िन्दगी  के दुर्गम पथ पर उसके सहारे के बिना चलना मुश्किल है । ईश्वर ही हमारा भग्य विधाता है , पालनहारा है जो अपने भक्तों कि जरूर सुनता है और उसके सहारे ही मह भव सागर पर कर सकते हैं –

तू साथ नहीं/डगर अँधियारा/अब मैं हारी/तू है पालनहारा/फैला दे उजियारा।
             नीलू गुप्ता ने माँ का गुणगान करते हुए माँ को धूप-छाँव , बहार और प्यार का सागर बताया है । माँ ही दुःख दर्द की औषध है , कभी सहेली बन जाती है । माँ का आँचल मन की तपन से राहत दिलाता है –

माँ का आँचल/ममता भरा हुआ/सुख- सागर /हरे मन तपन /खिले तन-वदन।

          प्रगीत कुँअर ने तेज रफ्तार ज़िन्दगी  में रंग भरने की कोशिश की तो आँसू की धार ने बेरंग कर दिया –

भरे थे रंग/ज़िंदगी के चित्र में/खुशी के संग/बही आँसू की धार/हुए सब बेरंग ।

 इनके ताँका जीवन-संघर्ष की कथा कहते हैं।कहीं वे मेहनत के फल की आस लगाए .जीवनरूपी  ऊँचे  के निर्माण के लिए  नींव की गहराई जरूरी बताते हैं –

ऊँचा भवन/गिरा पल भर में/यूँ एकदम/क्या करें नींव की ही/गहराई जब कम ।

           प्रियंका गुप्ता तारों की छाँव में अकेलेपन को साथी मान ख़ामोशी की आवाज सुनती है । अपनों की बेरुखी उन्हें बेज़ार करती है, दर्द देती है , मगर फिर भी सब कुछ सहते हुए वह घास की तरह  विनम्र बन जीवन बिताने की सलाह देतीं हैं –

– ठोकर लगे/अपनों की बेरुखी/ मन को डसे/फिर भी चुप सहें/ घास बन के जिए ।

       मंजु मिश्रा ने सृष्टि की कचहरी में  सूर्य , चाँद और सितारे पेश किए जहाँ चाँद ने रिपोर्ट लिखवाते हुए सूर्य को  चोर बताया जो हर सुबह सितारों की गठरी बाँध ले जाता है । मामला जज को ढूँढने का है । गहन अनुभूति के रंग में रँगी एकदम नई कल्पना –

सूरज चोर/फरियादी है चाँद /और चोरी में/गये तारे-सितारे/फ़ैसला करे कौन  ?

           मिथिलेशकुमारी मिश्र ने खाली मन को  शैतानी का घर बताते , खुद को व्यस्त रखते अपने आपको सुधारने का सुझाव दिया है । उनका मानना है कि अगर ऐसा हो जाए तो दुनिया स्वर्ग बन जाए –

खाली जो बैठें/प्राय: बुरा ही सोचें/व्यस्त जो रहे/उसे समय कहाँ/जो बैठ बुरा सोचे।

           मुमताज टी .एच . खान रिश्तों को ख़्वाब बताते  हुए कहा हैं कि ये आँख खोलते ही खो जाते हैं ।इनके टूटने से मन काँच की तरह टूटकर बिखर जाता है –

बन्धन खुला /रिश्तों का है जब से/टूटा है मन/बिखर गया अब/जैसे टूटा दर्पण

            रचना श्रीवास्तव ने जोरदार आवाज़ में शब्दों के बोलने का अहसास करवाया है । शब्दों की फरियाद है कि उनको किताबों में ही बन्द न  रखो, ऐसा करने से दीमक खा जाएगी । इसीलिए किसी  कही गई बात को उपयोग में लाना जरूरी है –

पन्नो में शब्द/बंद रहे सदियों /घुटती साँसें /दीमक -ग्रास बने /बिखरे आधे होके।
        डॉ. रमा द्विवेदी जीवन की एक और सच्चाई को रूपमान करती कहती हैं कि कई बार सात फेरे भी रिश्तों को बचा नहीं पाते क्योंकि लोग किए वचन के अर्थों को समझने की कोशिश ही नहीं करते- 

सात फेरे भी/रिश्ते बचा न पाएँ /व्यर्थ वचन- /प्रणय -अनुबंध /झूठे  सब सम्बन्ध ।

       वरिष्ठ कवि श्री रमाकान्त श्रीवास्तव जी बिन रुके नदिया जैसे चलने का सुझाव देते हुए कहते हैं कि जियो और जीने दो का रास्ता ही जीवन्तता है । आज 91 वर्ष पूरे करने पर भी आपकी ऊर्जा सबको प्रेरित करती है-

नदिया बहे/रुके न पल भर/कहाँ लक्ष्य है ?/ऐसे ही चलना है/हमको बढ़ना है।

            राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी ‘ बन्धु कीचड़ में खिले कमल को देखकर  हमें भी उससे कुछ सीखने  की प्रेरणा देते हैं कि  संघर्ष द्वारा खुद को सँवारना चाहिए-

खिला कमल/कीचड़ में रहके/सौन्दर्य पाया,/संघर्ष द्वारा आप/खुद को सँवारिए ।

          रेखा रोहतगी ने प्रकृति के प्रति अपने  अनूठे  प्यार को पुनरुज्जीवित करती हुई प्रकृति को अपने ही अन्दाज़ में देखती हैं । कहीं वह पीली  चूनर ओढ़े, हरा घाघरा पहने इठला रही है ,कहीं श्यामा तुलसी कैक्टस को बैठक में सजता देख आँगन में सहमे हुए है तो कहीं मछली बन चाँद गगन सागर में तैरता है- रूपक का कलात्मक निर्वाह बखूबी किया गया है-

चन्दा -मछरी /गगन -सागर में /तैरती जाए /सूरज-मछेरे को/देखे तो छुप जाए।

 डॉ.  सतीशराज पुष्करणा जीवन का अनोखा नियम बताते हैं कि जब  दो के बीच तीसरा आ जाए तो बात बिगड़ सकती है –

दोनों के बीच/आ गया जो तीसरा/बात बिगड़ी/फिर नहीं सँभली/जीवन में कभी भी।

 दुःख के भीतर ही सुख छुपा है मगर हम देखते ही नहीं बल्कि मृगतृष्णा में खोए भटकने के लिए आगे ही निकल जाते हैं –

दु:ख है छिपा/सुख के भीतर ही/कोई जाने न /मृगतृष्णा में खोए/आगे बढ़ते जाते।

        सुभाष नीरव ने बूढ़े माँ -बाप की लाचारी बयान की है। जब वे अपने ही घर में चुप्पी का संताप भोगते हैं तो और भी अधिक दयनीय हो जाते हैं-

बूढ़े माँ-बाप/अपने ही घर में/भोगते शाप/बेबसी, लाचारी का/अकेले चुपचाप।

सुदर्शन रत्नाकर वरिष्ठ कथाकार और कवयित्री हैं।बचपन के दिनों की मधुरता किसी भी  तरह भुलाए नही बनती –

नहीं भूलते/बचपन के दिन/खेल– तमाशे/बड़े याद आते हैं/यूँ ही रुला जाते हैं।

सुख दु:ख का आपका दर्शन ही जीवन की सच्चाई है। जो सुख की कामना करता है ,उसे इस रहस्य को समझना चाहिए-

दुःख होता है/सुख की परछाई/नियति-खेल/घबरा मत साथी/सुख से होगा मेल

         डॉ.  श्याम सुन्दर दीप्ति शीशे का सच बताते हैं कि इस दुनिया में अकेला यही ही एक शीशा है जो कभी झूठ नहीं बोलता। उसके सामने जाकर  मैं टूट जाता हूँ ।बचपन के महत्त्व को बताते हुए कहते हैं कि यदि जीवन का उल्लास चाहिए तो बचपन की सरलता और उल्लास को बचाए रखना ज़रूरी है-

बचपन को/यूँ ही मत गवाना /सँजो रखना/अपने उल्लास का/मासूम-सा बहाना
         ताँका शैली से मुझे  रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु ‘जी ने कुछ ही समय  पहले जोड़ा,  जिसका परिणाम ‘ मिले -किनारे’ ताँका -चोका संग्रह ( 2011) आपके समक्ष आ चुका है ।इस संकलन में भी मेरे 35 ताँका हैं जिनमें मैंने अपने मनोभाव आंचलिक शब्दों में  पिरोकर  इनकी मिठास और इन (आंचलिक) शब्दों को संरक्षित करने का एक छोटा-सा  प्रयास किया है । इसमें सफलता कहाँ तक मिल पाई , फैसला आप सभी के हाथ है ।-

1-जग -त्रिंजण/रौशन ही रौशन/दीप से दीप/जुड़े पाँत से पाँत/दिल यूँ जुड़ जाएँ।

2-बनाओ तुम /शब्दों की फुलकारी/स्याही की चिंता/कभी मत करना /पास तेरे मैं हूँ न !

3-मन -त्रिंजण/काते प्यार किसी का/वो नहीं जाने /दिल चीर दिखाया /बिखरा रेशा-रेशा

       यह संकलन हमारे त्रिवेणी ब्लॉग के साथ -साथ ताँका शैली की विकास यात्रा में एक छोटा- सा प्रयास है । मुझे विश्वास है , पाठक इस संकलन का हृदय से स्वागत करेंगे और भाव कलश में प्रस्तुत ताँका आपके हृदय को छूने के प्रयास में सफल होंगे । 

-0-

डॉ. हरदीप कौर सन्धु

ई-मेल-hindihaiku@gmail.com

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Responses

  1. भाव कलश संग्रह हमारे सामने मेज पर रखा है और पढ़ने के बाद कह सकती हूँ कि यह संग्रह बिलकुल अपने नाम “भाव कलश” को सार्थक करता है……पुस्तक एक कलश है, जिसने सभी तांका लेखकों के भावों भरे तांके अपने अंदर समेट लिए हैं…….इस सराहनीय कदम के लिए रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी और डॉ भावना कुँवर जी को बधाई और शुभकामनाएँ ….

  2. पुस्तक पढ़ रहा हूँ। और पढ़ पढ़ कर अभिभूत हो रहा हूँ। इतने अच्छे तांके भी लिखे जा सकते हैं…यह हिमांशु जी और डा भावना कुँअर ने बहुत ही दस्तावेज़ी काम कर दिखाया है… आने वाली पीढ़ी जिसे कविता की इस विधा से प्यार होगा, बहुत कुछ सीख-समझ सकती है… बधाई !

  3. ‘भाव-कलश’ की हार्दिक शुभकामनायें। सभी रचनाकारों को श्रद्धेय नमन।

    सादर

  4. एक सहेज कर रखने लायक संग्रह में सशक्त हस्ताक्षरों के साथ मुझे भी स्थान देने के लिए बहुत आभार…। आदरणीय काम्बोज जी की प्रेरणा से मुझ जैसे बहुत से लेखकों ने इस विधा में कदम रखा, सो तहे-दिल से काम्बोज जी का शुक्रिया…। डॉ0 भावना जी को भी मेरी हार्दिक बधाई…!
    हरदीप जी ने अपनी सशक्त कलम से पहली झलक के रूप में बड़ी अच्छी समीक्षा लिखी है…बधाई…।

  5. ‘भाव कलश’ को पुस्तक के रूप में संजोने के लिए काम्बोज भाई और भावना जी को बहुत बधाई. हरदीप जी की समीक्षा बहुत अच्छी लगी. काम्बोज भाई द्वारा मिले प्रोत्साहन और प्रेरणा का प्रतिफल है कि मैं हाइकु और ताँका की इस विधा को समझ पाई और इस पुस्तक में मुझे भी स्थान मिला. ह्रदय से आभार.

  6. तांका संग्रह की समीक्षा अच्छी है, निश्चय ही संग्रह भी अच्छा होगा. आपने बहुत से लोगों को तांका से जोड़ा तो है ही, तांका विधा के प्रति लोगों में समझ भी विकसित की है. त्रिवेणी ब्लॉग इसका प्रमाण है. हार्दिक बधाई.

  7. bahut hi sunder samiksha likhi hai .aapko badhai
    himanshu ji aur bhavna ji ko itna sunder sanklan nikalne ke liye bahut bahut badhai
    rachana

  8. भाव-कलश ‘ तांका संग्रह के प्रकाशित होने पर संपादक-द्वय श्री हिमांशु जी और डा. भावना जी को हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं ….एक संग्रह में उन्नतीस रचनाकारों की रचनाओं को संकलित करना बहुत श्रम साध्य कार्य है …हिमांशु जी और भावना जी ने यह कर दिखाया है …पुन: हार्दिक आभार ! डा. हरदीप कौर जी ने जो विश्लेषात्मक विस्तृत समीक्षा की है वह काबिले तारीफ़ है अत: वे साधुवाद की हकदार हैं | सभी रचनाकारों को बहुत- बहुत बधाई और इस संग्रह में मुझे भी स्थान देने के लिए हिमांशु व भावना जी की ह्रदय से आभारी हूँ | संग्रह पढ़ने की तीव्र आकांक्षा है …आशा है भाव कलश शीघ्र प्राप्त हो जाएगा ….

    डा. रमा द्विवेदी

  9. इतने अप्रतिम प्रयास के लिए हिमांशु जी तथा भावना जी को हार्दिक बधाई।

  10. भावकलश पर तांका पर इतनी विस्तृत जानकारी …बहुत उपयोगी लेख है…और इतने रचयिताओं के एक से एक सुन्दर तांके … हरदीप जी ने बहुत मेहनत की है .. उनकी लेखनी को सलाम …
    एक खास तांका जो मन के उल्लास को बड़ा रहा है..डॉ श्याम सुन्दर’दीप्ति’ जी का ..
    बचपन को/यूँ ही मत गँवाना /सँजो रखना/अपने उल्लास का/मासूम-सा बहाना।

  11. आ० .काम्बोज जी और भावना जी बधाई इतने सुन्दर संकलन के लिए .भाव कलश यथा नाम तथा गुण है .सभी तांका अत्यंत सार गर्भित है .सभी को हार्दिक बधाई ..

  12. ‘भावकलश’ मन को उद्धेलित करने वाले एक संग्रह योग्य पुस्तक है |
    ईस में लिखे समीक्षा नें तो ताँका के राजमार्ग में चलने को स्पष्ट राह दीखता |
    समीक्षाकार एबं सभी ताँकाकारोें को हार्दिक बधाई |


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